IMD का अलर्ट: 2026 में बारिश सामान्य से कम — किसान, थाली और EMI पर क्या असर पड़ेगा?

DD News के अनुसार IMD ने 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून 90-95% (below normal) रहने का अनुमान जताया है। इसका सीधा असर हिंदी बेल्ट की खरीफ़ फ़सलों — धान, सोयाबीन, उड़द — पर पड़ सकता है। ऐतिहासिक डेटा बताता है कि कम बारिश से खाद्य महंगाई बढ़ती है और RBI की दर कटौती में देरी हो सकती है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पूर्वानुमान जारी किया; प्रभावित होंगे हिंदी बेल्ट के करोड़ों किसान और उपभोक्ता।
  • क्या: 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम — कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत की 90-95% रहने का अनुमान, DD News की रिपोर्ट के अनुसार।
  • कब: IMD ने 2026 की मानसून सीज़न (जून-सितंबर) के लिए यह पूर्वानुमान जारी किया।
  • कहाँ: पूरे भारत पर लागू, लेकिन सबसे ज़्यादा असर UP, बिहार, MP, राजस्थान, झारखंड जैसे हिंदी बेल्ट राज्यों पर अपेक्षित।
  • क्यों: DD News के अनुसार वैश्विक समुद्री तापमान पैटर्न और संभावित एल नीनो जैसी परिस्थितियाँ कम वर्षा की वजह बताई गई हैं।
  • कैसे: IMD ने उपग्रह डेटा, समुद्री तापमान मॉडल और दीर्घकालिक सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर 90-95% वर्षा का अनुमान लगाया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • IMD के अनुसार 2026 मानसून में बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) की 90-95% रहेगी — 'below normal' श्रेणी (DD News)।
  • हिंदी बेल्ट के बुंदेलखंड, पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी बिहार, विदर्भ जैसे इलाकों में ज़िलेवार कमी 20-30% तक हो सकती है, जो सूखे जैसे हालात पैदा कर सकती है।
  • RBI के मौद्रिक नीति वक्तव्यों और CPI डेटा के ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, कमज़ोर मानसून वर्षों में खाद्य मुद्रास्फीति 1.5-3 प्रतिशत अंक तक बढ़ी है।
  • भारत की कुल कृषि भूमि का लगभग 45-48% अभी भी असिंचित है और पूरी तरह मानसून पर निर्भर है।
  • WHO की Global Nutrition Report (2024) और UNICEF की State of the World's Children रिपोर्ट्स बताती हैं कि सूखे के वर्षों में ग्रामीण बच्चों में कुपोषण और एनीमिया दर बढ़ जाती है।

90-95% बारिश — सुनने में मामूली, ज़मीन पर भारी

एक आँकड़ा याद रखिए — 90 से 95 प्रतिशत। कागज़ पर यह 'सामान्य से थोड़ा कम' लगता है, जैसे परीक्षा में 95 में से 90 नंबर। लेकिन जब यही आँकड़ा मानसून की बारिश का हो, तो इसका मतलब है कि UP के बुंदेलखंड में किसी किसान का कुआँ समय से पहले सूख सकता है, बिहार में धान की रोपाई हफ़्तों पीछे खिसक सकती है, और दिल्ली-लखनऊ-पटना के किचन में दाल-सब्ज़ी की थाली अचानक 15-20 रुपये महँगी हो सकती है।

DD News की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून का पूर्वानुमान जारी कर दिया है — कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) की मात्र 90 से 95 प्रतिशत रहने का अनुमान है। IMD की आधिकारिक भाषा में इसे 'below normal' कहते हैं। लेकिन 'below normal' की इस सूखी शब्दावली के नीचे एक पूरा तूफ़ान दबा है — खेती का, अर्थव्यवस्था का, और राजनीति का।

5-10% कम बारिश का ज़मीनी असर

पिछले दो दशकों का डेटा बताता है कि जब भी मानसून LPA से 10% या उससे ज़्यादा कम रहा, खरीफ़ सीज़न की फ़सल उत्पादकता में गिरावट दर्ज हुई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की 'Vision 2050' दस्तावेज़ श्रृंखला और इसके अंतर्गत प्रकाशित जलवायु-कृषि प्रभाव आकलन रिपोर्ट्स में यह पैटर्न बार-बार सामने आया है — इन रिपोर्ट्स के अनुसार कमज़ोर मानसून वर्षों में खरीफ़ उत्पादकता में 8-15% तक गिरावट देखी गई है। 2023 में जब एल नीनो ने मानसून को कमज़ोर किया था, तब उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार दालों की कीमतें लगभग 30% तक उछली थीं और सरकार को आयात ड्यूटी में राहत देनी पड़ी थी।

अब 2026 में वही परिदृश्य फिर दस्तक दे रहा है — और इस बार सवाल यह है कि क्या हम तैयार हैं?

हिंदी बेल्ट: सबसे ज़्यादा ख़तरे में कौन?

भारत की खरीफ़ फ़सलों का एक बहुत बड़ा हिस्सा — धान, सोयाबीन, उड़द, मूँग, ज्वार, बाजरा — हिंदी बेल्ट के राज्यों में उगता है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट (2023-24) के अनुसार, UP अकेला देश के कुल धान उत्पादन में लगभग 13-14% योगदान देता है, MP सोयाबीन का सबसे बड़ा उत्पादक है, और राजस्थान बाजरे का। कृषि जनगणना (2015-16, नवीनतम उपलब्ध) और मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार इन राज्यों की एक बड़ी कमज़ोरी यह है कि सिंचाई कवरेज अभी भी लगभग 52-55% के आसपास है — बाकी खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है।

जब IMD 90-95% बारिश कहता है, तो यह एक राष्ट्रीय औसत है। ज़मीन पर इसका वितरण एकसमान नहीं होता। कुछ ज़िलों में सामान्य बारिश हो सकती है, जबकि बुंदेलखंड, मराठवाड़ा, विदर्भ, पश्चिमी राजस्थान, या दक्षिणी बिहार जैसे इलाकों में 20-30% तक की कमी हो सकती है — जो व्यावहारिक रूप से सूखे जैसे हालात पैदा कर सकती है।

थाली का गणित: दाल, सब्ज़ी और तेल तीनों पर निशाना

कम बारिश का सबसे तेज़ असर तीन चीज़ों पर दिखता है — दालें, सब्ज़ियाँ और तिलहन। DD News की रिपोर्ट और कृषि मंत्रालय के पिछले सीज़न के डेटा को मिलाकर देखें तो तस्वीर साफ़ है: उड़द-मूँग की बुआई में देरी या कमी सीधे दाल की सप्लाई घटाती है। सोयाबीन और मूँगफली प्रभावित हों तो खाद्य तेल और भी महँगा हो सकता है। और सब्ज़ियों का मामला तो और भी नाज़ुक है — टमाटर, प्याज़, और हरी सब्ज़ियाँ पानी की कमी पर सबसे पहले प्रतिक्रिया देती हैं।

RBI के मौद्रिक नीति वक्तव्यों (Monetary Policy Statements) और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी Consumer Price Index (CPI) डेटा के ऐतिहासिक विश्लेषण से पता चलता है कि कमज़ोर मानसून वाले वर्षों में खाद्य मुद्रास्फीति 1.5 से 3 प्रतिशत अंक तक बढ़ जाती है। 2023-24 में MoSPI की CPI रिलीज़ के अनुसार खाद्य मुद्रास्फीति कई महीनों में 8-9% के दायरे में रही थी।

RBI की दुविधा: ब्याज दर कटौती पर ब्रेक?

यहीं कहानी एक और मोड़ लेती है। 2026 की शुरुआत से बाज़ार को उम्मीद थी कि RBI ब्याज दरों में और कटौती करेगा — लेकिन अगर खाद्य महंगाई फिर उछलती है, तो रिज़र्व बैंक के पास दर कटौती की गुंजाइश सिकुड़ सकती है। RBI गवर्नर ने पिछली मौद्रिक नीति समीक्षा में खाद्य कीमतों को 'अनिश्चितता का सबसे बड़ा स्रोत' बताया था। कम मानसून उस अनिश्चितता को हकीकत में बदल सकता है — और इसका मतलब है EMI में राहत की उम्मीद लगाए बैठे मध्यवर्गीय परिवारों को और इंतज़ार करना पड़ सकता है।

MSP और खरीद: राजनीति का मौसम

कम उत्पादन वाले साल में MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की राजनीति और तीखी हो जाती है। एक तरफ़ किसान माँगता है कि सरकार ज़्यादा दाम पर ज़्यादा खरीदे, दूसरी तरफ़ सरकार का खाद्य सब्सिडी बिल पहले ही बजट पर दबाव बना रहा है। 2023 में केंद्र सरकार ने एल नीनो की आशंका को देखते हुए कुछ अग्रिम कदम उठाए थे — बफ़र स्टॉक बढ़ाना, दालों का आयात उदार करना, और राज्यों को सिंचाई फंड जारी करना।

सवाल यह है: 2026 के लिए क्या ऐसी कोई तैयारी शुरू हुई है? इंडिया हेराल्ड ने इस संबंध में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय से टिप्पणी माँगी है; इस रिपोर्ट के प्रकाशन (जुलाई 2025) तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी बयानों और प्रेस विज्ञप्तियों में भी अभी तक 2026 मानसून के लिए किसी विशिष्ट 'बिलो नॉर्मल रेडीनेस प्लान' की घोषणा नहीं दिखती।

इंडिया हेराल्ड का आकलन

इंडिया हेराल्ड का आकलन यह है कि 2026 मानसून का असली ख़तरा सिर्फ़ कम बारिश नहीं — बल्कि उस कम बारिश के लिए अग्रिम तैयारी का स्पष्ट न दिखना हो सकता है। 2023 में सरकार ने 'एल नीनो रेडीनेस' का बड़ा अभियान चलाया था, लेकिन इस बार — कम से कम सार्वजनिक डोमेन में — वैसी तत्परता अभी दिखाई नहीं दे रही। जब तक जून-जुलाई में बारिश का असली चित्र सामने नहीं आता, कई राज्य सरकारें 'wait and watch' मोड में रह सकती हैं — और यह अंतराल चिंताजनक है।

जून-जुलाई में किन बेल्ट्स पर नज़र रखें?

IMD का पूर्वानुमान एक मोटा राष्ट्रीय अनुमान है। असली तस्वीर जून के दूसरे और जुलाई के पहले हफ़्ते में साफ़ होगी, जब IMD अपना ज़ोनल और ज़िलेवार अपडेट जारी करेगा। कृषि-मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इन क्षेत्रों पर सबसे ज़्यादा निगरानी ज़रूरी है:

  • बुंदेलखंड (UP-MP) — पहले से ही पानी की कमी वाला ज़ोन, कम बारिश सूखे में बदल सकती है।
  • पश्चिमी राजस्थान — बाजरा और ग्वार की बुआई ख़तरे में आ सकती है।
  • दक्षिणी बिहार और झारखंड — धान की रोपाई में देरी का सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है।
  • विदर्भ-मराठवाड़ा — सोयाबीन और कपास दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

सिंचाई का सच और आपदा निधि का हाल

भारत में कुल कृषि भूमि का लगभग 52-55% ही सिंचित है — शेष भूमि पूरी तरह बारिश पर निर्भर है (कृषि जनगणना 2015-16 और कृषि मंत्रालय के बाद के अनुमान)। केंद्र की 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)' पिछले कई वर्षों से चल रही है, लेकिन कृषि मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्टों और CAG की ऑडिट रिपोर्टों के अनुसार इसकी प्रगति कई राज्यों में लक्ष्य से पीछे रही है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) और राज्य आपदा कोषों की स्थिति भी महत्वपूर्ण है — अगर सूखा घोषित होता है तो राहत के लिए ये कोष पर्याप्त हैं या नहीं, यह सवाल अभी से पूछा जाना चाहिए।

स्वास्थ्य का कोण: कम बारिश मतलब सिर्फ़ फ़सल का नुकसान नहीं

एक पहलू जो अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है — कम और अनियमित बारिश का सीधा असर ग्रामीण भारत के पोषण और स्वास्थ्य पर पड़ता है। WHO की Global Nutrition Report 2024 और UNICEF की State of the World's Children 2024 रिपोर्ट दोनों स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि सूखे और जलवायु-प्रेरित खाद्य असुरक्षा के वर्षों में ग्रामीण बच्चों में कुपोषण (stunting, wasting) और एनीमिया की दर बढ़ जाती है, क्योंकि परिवार की आय गिरती है और खाद्य विविधता सिकुड़ती है।

भारत के संदर्भ में, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) — जो इस समय सबसे हालिया पूर्ण प्रकाशित संस्करण है — के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 35.5% बच्चे stunted और 19.3% wasted हैं। (NFHS-6 का फ़ील्डवर्क चल रहा बताया गया है, लेकिन इसके पूर्ण आँकड़े इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।) एक कमज़ोर मानसून इस पहले से धीमी प्रगति को और पीछे धकेल सकता है।

इसके अलावा, जल संकट का मतलब है पीने के पानी की गुणवत्ता में गिरावट — WHO के Guidelines on Drinking-water Quality (4th Edition, 2022) और UNICEF-WHO Joint Monitoring Programme (JMP) की रिपोर्ट्स के अनुसार, जल स्रोतों में कमी के दौरान असुरक्षित पानी का उपयोग बढ़ता है, जिससे डायरिया, टाइफ़ॉइड और अन्य जलजनित बीमारियों का ख़तरा बढ़ता है, ख़ासकर बच्चों और बुज़ुर्गों में।

असली सवाल: तैयारी कहाँ है?

IMD ने अपना काम कर दिया — चेतावनी दे दी। अब गेंद सरकारों के पाले में है। केंद्र सरकार ने 2023 में जो 'एल नीनो एक्शन प्लान' बनाया था, क्या 2026 के लिए वैसा ही कोई रोडमैप तैयार है? राज्यों ने अपने सिंचाई बजट बढ़ाए हैं या नहीं? बफ़र स्टॉक पर्याप्त है? दालों और तिलहन के आयात पर अग्रिम फ़ैसले लिए गए हैं?

पारदर्शिता नोट: इंडिया हेराल्ड ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय और खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग से 2026 मानसून तैयारी पर टिप्पणी माँगी है। इस रिपोर्ट के प्रकाशन (जुलाई 2025) तक किसी भी मंत्रालय से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है। प्रतिक्रिया मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।

ये सवाल सिर्फ़ नीति-निर्माताओं के नहीं हैं। ये हर उस परिवार के हैं जो बाज़ार जाकर एक किलो अरहर की दाल ख़रीदता है, हर उस किसान के हैं जो जून में खेत जोतकर आसमान की ओर देखता है, और हर उस RBI बैठक के हैं जहाँ तय होता है कि आपकी EMI कम होगी या नहीं।

90-95 प्रतिशत — यह सिर्फ़ एक मौसम विज्ञान का आँकड़ा नहीं है। यह एक अर्थव्यवस्था, एक राजनीति, और 140 करोड़ लोगों की थाली का भविष्य है। सवाल यह नहीं कि बारिश कम होगी या नहीं — IMD ने बता दिया कि होगी। सवाल यह है: जब कम हो, तब हम खड़े कहाँ मिलेंगे — तैयार, या फिर एक बार हड़बड़ी में?

आँकड़ों में

  • IMD 2026 मानसून पूर्वानुमान: वर्षा LPA की 90-95% — below normal (DD News)
  • ICAR Vision 2050 श्रृंखला: कमज़ोर मानसून वर्षों में खरीफ़ उत्पादकता में 8-15% गिरावट
  • कृषि जनगणना 2015-16: भारत की कुल कृषि भूमि का ~52-55% सिंचित
  • 2023 एल नीनो प्रभाव: दालों की कीमतें ~30% तक उछलीं (उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय)
  • कृषि मंत्रालय वार्षिक रिपोर्ट 2023-24: UP का धान उत्पादन में ~13-14% योगदान
  • NFHS-5 (2019-21): 5 वर्ष से कम आयु के 35.5% बच्चे stunted, 19.3% wasted

मुख्य बातें

  • IMD के अनुसार 2026 मानसून में बारिश दीर्घकालिक औसत की 90-95% रहेगी — 'below normal' श्रेणी (DD News)।
  • बुंदेलखंड, पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी बिहार, विदर्भ जैसे इलाकों में ज़िलेवार कमी 20-30% तक संभव, जो सूखे जैसे हालात पैदा कर सकती है।
  • RBI मौद्रिक नीति वक्तव्यों और MoSPI CPI डेटा के अनुसार, कमज़ोर मानसून वर्षों में खाद्य मुद्रास्फीति 1.5-3 प्रतिशत अंक तक बढ़ी है।
  • कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार भारत की कुल कृषि भूमि का ~52-55% ही सिंचित है; शेष पूरी तरह मानसून-निर्भर।
  • WHO Global Nutrition Report 2024 और UNICEF State of the World's Children 2024 के अनुसार सूखे के वर्षों में ग्रामीण बच्चों में कुपोषण और एनीमिया दर बढ़ जाती है।
  • इंडिया हेराल्ड ने कृषि, जल शक्ति और खाद्य वितरण मंत्रालयों से तैयारी पर टिप्पणी माँगी; प्रकाशन तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में IMD का मानसून पूर्वानुमान क्या है?

DD News के अनुसार IMD ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून में बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) की 90-95% रहने का अनुमान जताया है, जो 'below normal' (सामान्य से कम) श्रेणी में आता है।

कम बारिश से किन राज्यों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ सकता है?

बुंदेलखंड (UP-MP), पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी बिहार, झारखंड और विदर्भ-मराठवाड़ा जैसे इलाकों पर सबसे ज़्यादा असर अपेक्षित है, क्योंकि यहाँ सिंचाई कवरेज कम है और खेती मानसून पर अत्यधिक निर्भर है।

कम मानसून का महंगाई और RBI ब्याज दर पर क्या असर हो सकता है?

RBI के मौद्रिक नीति वक्तव्यों और MoSPI के CPI डेटा के ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, कमज़ोर मानसून वाले साल में खाद्य मुद्रास्फीति 1.5-3 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है। इससे RBI के लिए ब्याज दर कटौती की गुंजाइश सीमित हो सकती है, जिसका सीधा असर EMI पर पड़ सकता है।

कम बारिश से स्वास्थ्य और पोषण पर क्या असर पड़ता है?

WHO की Global Nutrition Report 2024 और UNICEF की State of the World's Children 2024 के अनुसार, सूखे के वर्षों में ग्रामीण बच्चों में कुपोषण और एनीमिया की दर बढ़ जाती है। WHO-UNICEF JMP रिपोर्ट्स बताती हैं कि जल स्रोतों में कमी से असुरक्षित पानी का उपयोग बढ़ता है, जिससे डायरिया और टाइफ़ॉइड जैसी जलजनित बीमारियों का ख़तरा बढ़ता है।

सरकार ने 2026 मानसून के लिए क्या तैयारी की है?

2023 में सरकार ने एल नीनो के लिए बफ़र स्टॉक, आयात उदारीकरण और सिंचाई फंड जैसे अग्रिम कदम उठाए थे। 2026 के लिए इंडिया हेराल्ड ने कृषि, जल शक्ति और खाद्य वितरण मंत्रालयों से टिप्पणी माँगी; प्रकाशन (जुलाई 2025) तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या सार्वजनिक घोषणा प्राप्त नहीं हुई है।

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