150 इंजेक्शन, टूटता शरीर और चुप्पी का दर्द — अनुष्का रंजन की IVF कहानी ने वो सवाल खोला जो क्लीनिक नहीं पूछते?

अनुष्का रंजन ने बताया कि IVF के दौरान उन्हें 150 से अधिक इंजेक्शन लगे, शरीर में भयंकर दर्द हुआ और भावनात्मक रूप से वे बिखर गईं। मेडिकल शोध बताते हैं कि IVF में हार्मोनल ओवरलोड, ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन और गंभीर मानसिक तनाव आम हैं — लेकिन अधिकतर क्लीनिक इन पहलुओं पर पर्याप्त काउंसलिंग नहीं देते।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: अभिनेत्री अनुष्का रंजन, जिन्होंने अपने IVF अनुभव का खुलासा किया (इंडिया टुडे के अनुसार)।
  • क्या: IVF प्रक्रिया के दौरान 150 से अधिक इंजेक्शन, शारीरिक यातना और गहरे भावनात्मक संकट का सार्वजनिक वर्णन।
  • कब: 2026 में, जब अनुष्का ने अपनी फ़र्टिलिटी यात्रा के बारे में खुलकर बात की।
  • कहाँ: भारत — जहाँ ICMR के अनुसार लगभग 27.5 मिलियन कपल इनफ़र्टिलिटी से जूझ रहे हैं।
  • क्यों: क्योंकि IVF को अक्सर विज्ञापनों में आसान और दर्दरहित बताया जाता है, जबकि वास्तविकता बिलकुल अलग है।
  • कैसे: हार्मोनल इंजेक्शन से ओवेरियन स्टिमुलेशन, अल्ट्रासाउंड मॉनिटरिंग, एग रिट्रीवल, एम्ब्रियो ट्रांसफ़र — हर चरण में शारीरिक हस्तक्षेप और भावनात्मक दबाव होता है।

एक सुई। फिर दूसरी। फिर तीसरी। फिर दसवीं। फिर पचासवीं। और जब गिनती 150 पार कर जाए — तो क्या बचता है? सूजा हुआ पेट, नीले पड़ चुके हाथ, और एक ऐसी थकान जो हड्डियों के भीतर तक बैठ जाती है। अभिनेत्री अनुष्का रंजन ने जब अपनी IVF यात्रा का ब्यौरा सार्वजनिक किया, तो उन्होंने सिर्फ़ एक निजी कहानी नहीं सुनाई — उन्होंने उस दरवाज़े को खोल दिया जिसके पीछे लाखों भारतीय महिलाएँ चुपचाप रोती हैं।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, अनुष्का ने बताया कि IVF के दौरान उन्हें 150 से अधिक इंजेक्शन लगवाने पड़े। शरीर में असहनीय दर्द हुआ, वज़न बढ़ा, मूड में भयंकर उतार-चढ़ाव आए, और ऐसे दिन भी आए जब उन्हें लगा कि वे यह सब और नहीं सह सकतीं। लेकिन सबसे गहरा ज़ख़्म शारीरिक नहीं, भावनात्मक था — वह अकेलापन, वह अनिश्चितता, वह सवाल जो हर असफल साइकिल के बाद भीतर से उठता है: "क्या मैं कभी माँ बन पाऊँगी?"

और यही वह बिंदु है जहाँ अनुष्का की कहानी सिर्फ़ एक सेलिब्रिटी का अनुभव नहीं रहती — यह एक सिस्टेमिक समस्या का आईना बन जाती है।

विज्ञापन में 'आसान', असलियत में आग का दरिया

भारत के फ़र्टिलिटी क्लीनिक उद्योग का आकार तेज़ी से बढ़ रहा है। IMARC ग्रुप की एक रिसर्च के अनुसार, भारतीय IVF मार्केट 2025 तक लगभग 1.45 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका था और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने का अनुमान है। क्लीनिक के विज्ञापनों में मुस्कुराते कपल, ख़ुशी से भरे चेहरे और "सपना पूरा होगा" जैसी टैगलाइन दिखती हैं। लेकिन कोई विज्ञापन यह नहीं बताता कि एक IVF साइकिल में औसतन 8 से 14 दिन रोज़ाना हार्मोनल इंजेक्शन लगते हैं, कुछ मामलों में कई साइकिल चलानी पड़ती हैं, और हर बार शरीर को नए सिरे से उसी यातना से गुज़रना होता है।

BMJ (ब्रिटिश मेडिकल जर्नल) में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा के अनुसार, IVF से गुज़रने वाली महिलाओं में डिप्रेशन और एंग्ज़ाइटी का ख़तरा सामान्य आबादी की तुलना में काफ़ी अधिक होता है। ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम (OHSS) — जिसमें अंडाशय ज़रूरत से ज़्यादा उत्तेजित हो जाते हैं — एक गंभीर और कभी-कभी जानलेवा जटिलता है जो 1 से 5 प्रतिशत मामलों में देखी जाती है। पेट में सूजन, साँस लेने में तकलीफ़, और गंभीर मामलों में किडनी पर असर — यह सब मेडिकल लिटरेचर में दर्ज है, लेकिन पेशेंट काउंसलिंग में अक्सर ग़ायब।

शरीर का दर्द दिखता है, मन का नहीं

The Lancet में प्रकाशित शोध बताता है कि IVF का मनोवैज्ञानिक बोझ अक्सर शारीरिक पीड़ा से भी भारी होता है। हर असफल साइकिल के बाद शोक, आत्म-संदेह और रिश्तों में तनाव बढ़ता जाता है। अनुष्का ने भी इस भावनात्मक उथल-पुथल का ज़िक्र किया — वह दौर जब हार्मोनल बदलावों के कारण मूड इतना अस्थिर हो जाता है कि ख़ुद को पहचानना मुश्किल लगता है।

लेकिन भारत में इस पहलू पर बात करना आज भी लगभग वर्जित है। ICMR (इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च) के अनुमान के अनुसार, भारत में लगभग 27.5 मिलियन कपल इनफ़र्टिलिटी से प्रभावित हैं। इनमें से बड़ी संख्या ART (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी) का सहारा लेती है। लेकिन कितने क्लीनिक IVF शुरू करने से पहले मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग देते हैं? कितने क्लीनिक असफलता के बाद इमोशनल सपोर्ट की व्यवस्था करते हैं? ईमानदार जवाब है — बहुत कम।

पैसा, दबाव और चुप्पी का त्रिकोण

IVF सस्ता नहीं है। भारत में एक साइकिल की लागत 1.5 लाख से 3 लाख रुपये या उससे अधिक हो सकती है — और सफलता दर पहले प्रयास में औसतन 30-35% के आसपास होती है (ESHRE — यूरोपियन सोसाइटी ऑफ़ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी के आँकड़ों के अनुसार, जो वैश्विक बेंचमार्क माना जाता है)। इसका मतलब है कि अधिकतर कपल को कई बार प्रयास करने पड़ते हैं। हर नई साइकिल का अर्थ है — और पैसा, और इंजेक्शन, और उम्मीद, और उसके टूटने का डर।

इसमें जोड़िए परिवार और समाज का दबाव। भारतीय परिवारों में संतान न होना आज भी एक ऐसा विषय है जिस पर फुसफुसाहट होती है, ताने मारे जाते हैं, और दोष अक्सर महिला पर मढ़ दिया जाता है। इस माहौल में IVF करवाना सिर्फ़ एक मेडिकल फ़ैसला नहीं रहता — यह एक भावनात्मक युद्ध बन जाता है जहाँ महिला अकेली लड़ती है।

इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण: असली समस्या इंजेक्शन नहीं, सूचना का अभाव है

अनुष्का रंजन की कहानी इसलिए ज़रूरी नहीं है कि वे एक सेलिब्रिटी हैं — बल्कि इसलिए कि उन्होंने वह बात कही जो लाखों महिलाएँ कहना चाहती हैं लेकिन कह नहीं पातीं। इंडिया हेराल्ड का स्पष्ट आकलन यह है कि भारत के फ़र्टिलिटी उद्योग में सबसे बड़ी कमी तकनीक की नहीं, बल्कि 'इन्फ़ॉर्म्ड कंसेंट' की है — मरीज़ को प्रक्रिया शुरू करने से पहले शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हर पहलू की पूरी, बेलाग जानकारी देने की।

2021 में लागू हुआ ART (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी) विनियमन अधिनियम क्लीनिकों के रजिस्ट्रेशन और बुनियादी मानकों पर ज़ोर देता है — लेकिन काउंसलिंग प्रोटोकॉल और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को अनिवार्य बनाने के मामले में यह क़ानून अभी भी अधूरा है। आने वाले समय में अगर इस क़ानून में संशोधन होता है — और कई विशेषज्ञ इसकी माँग कर रहे हैं — तो सबसे पहले 'प्री-IVF साइकोलॉजिकल असेसमेंट' को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

जब तक ऐसा नहीं होता, अनुष्का जैसी आवाज़ें ही वह काम करती रहेंगी जो सिस्टम को करना चाहिए — सच बताने का।

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आँकड़ों में

  • अनुष्का रंजन को IVF के दौरान 150 से अधिक इंजेक्शन लगे (इंडिया टुडे)।
  • ICMR अनुमान: भारत में लगभग 27.5 मिलियन कपल इनफ़र्टिलिटी से प्रभावित।
  • OHSS (ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम) 1-5% IVF मामलों में होता है (BMJ)।
  • IVF की एक साइकिल भारत में 1.5-3 लाख रुपये या अधिक।
  • पहले प्रयास में IVF सफलता दर औसतन 30-35% (ESHRE)।

मुख्य बातें

  • IVF में एक साइकिल में 8-14 दिन रोज़ हार्मोनल इंजेक्शन लगते हैं; कई साइकिल में यह संख्या 150+ तक पहुँच सकती है — अनुष्का रंजन ने ख़ुद यह अनुभव बताया।
  • BMJ और Lancet के शोध के अनुसार IVF से गुज़रने वाली महिलाओं में डिप्रेशन और एंग्ज़ाइटी का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है, लेकिन अधिकतर भारतीय क्लीनिक मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग नहीं देते।
  • OHSS (ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम) 1-5% मामलों में होता है और जानलेवा हो सकता है — यह जोखिम मरीज़ों को पहले से स्पष्ट बताया जाना चाहिए।
  • भारत का ART अधिनियम 2021 क्लीनिक रजिस्ट्रेशन पर ज़ोर देता है, पर प्री-IVF मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग अभी अनिवार्य नहीं है।
  • पहले प्रयास में IVF सफलता दर औसतन 30-35% — इसका मतलब अधिकतर कपल को कई साइकिल और कई लाख रुपये ख़र्च करने पड़ते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

IVF में कुल कितने इंजेक्शन लगते हैं?

एक साइकिल में आमतौर पर 8-14 दिन रोज़ाना हार्मोनल इंजेक्शन लगते हैं। लेकिन अगर कई साइकिल चलानी पड़ें तो कुल संख्या 100-150 या उससे अधिक हो सकती है, जैसा अनुष्का रंजन के मामले में हुआ।

IVF के शारीरिक साइड इफ़ेक्ट्स क्या हैं?

पेट में सूजन, वज़न बढ़ना, मूड स्विंग्स, सिरदर्द, इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द और नील पड़ना आम हैं। गंभीर मामलों में OHSS (ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम) हो सकता है जिसमें साँस लेने में तकलीफ़ और किडनी पर असर पड़ सकता है।

IVF का मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?

BMJ और Lancet के शोध के अनुसार IVF से गुज़रने वाली महिलाओं में डिप्रेशन, एंग्ज़ाइटी और भावनात्मक थकान का ख़तरा बढ़ जाता है — ख़ासकर असफल साइकिल के बाद।

भारत में IVF की एक साइकिल का ख़र्च कितना है?

भारत में एक IVF साइकिल की लागत लगभग 1.5 लाख से 3 लाख रुपये या उससे अधिक हो सकती है, और पहले प्रयास में सफलता दर 30-35% के आसपास होती है, इसलिए अधिकतर कपल को कई बार प्रयास करने पड़ते हैं।

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