रिधम जानवे की 'हंटर्स मून' — क्या भारतीय सिनेमा को अपना पहला सच्चा वेयरवुल्फ़ ऑटर मिल गया?
रिधम जानवे की 'हंटर्स मून' एक विज़ुअली शानदार शॉर्ट फ़िल्म है जो पूर्णिमा की रात एक शिकारी के भीतर छिपे जानवर को सामने लाती है। India Today की समीक्षा के अनुसार यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा में बॉडी-हॉरर और लाइकेन्थ्रोपी शैली की एक दुर्लभ और प्रभावशाली मिसाल है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: फ़िल्ममेकर रिधम जानवे, जो पहले 'लापता लेडीज़' और अपनी शॉर्ट फ़िल्मों से चर्चित रहे हैं।
- क्या: शॉर्ट फ़िल्म 'हंटर्स मून' — एक वेयरवुल्फ़/लाइकेन्थ्रोपी बॉडी-हॉरर कथा जो पूर्णिमा की रात सेट है।
- कब: 2025-26 में अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल सर्किट पर रिलीज़ और चर्चित।
- कहाँ: भारत; अंतरराष्ट्रीय फ़ेस्टिवल सर्किट जिसमें कान भी शामिल।
- क्यों: भारतीय सिनेमा में वेयरवुल्फ़/बॉडी-हॉरर शैली लगभग अनुपस्थित रही है — यह फ़िल्म उस रिक्तता को भरती है और दिखाती है कि भारतीय फ़िल्ममेकर ग्लोबल हॉरर शिल्प में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
- कैसे: न्यूनतम संवाद, सघन विज़ुअल कथा, प्रैक्टिकल इफ़ेक्ट्स और साउंड डिज़ाइन के ज़रिये जानवे ने बिना बड़े बजट के एक दमदार हॉरर अनुभव रचा है।
एक जंगल। पूर्णिमा की रात। एक शिकारी जो शिकार की तलाश में निकला है — लेकिन असली शिकार उसके भीतर बैठा है, उसकी त्वचा के नीचे कसमसा रहा है, हड्डियों को मोड़ रहा है। रिधम जानवे की शॉर्ट फ़िल्म 'हंटर्स मून' का यही वह पहला दृश्य है जो आपको कुर्सी से चिपका देता है — और जब तक फ़िल्म ख़त्म होती है, आप बदल चुके होते हैं। बिलकुल उस शिकारी की तरह।
India Today ने इस फ़िल्म की समीक्षा में लिखा है कि 'हंटर्स मून' सिर्फ़ एक हॉरर शॉर्ट नहीं बल्कि "shadows under a full moon" — यानी पूर्णिमा की छाया में छिपी इंसानी प्रवृत्ति का एक बेहद सघन, विज़ुअल और मनोवैज्ञानिक अध्ययन है। और यही बात इस फ़िल्म को सिर्फ़ डराने वाली कहानी से कहीं ऊपर उठाती है।
वो शैली जो भारतीय सिनेमा में कभी पनपी ही नहीं
ज़रा सोचिए — हॉलीवुड में 'An American Werewolf in London' (1981) से लेकर 'The Wolfman' (2010) और 'Late Night with the Devil' (2023) तक, वेयरवुल्फ़ और बॉडी-हॉरर की एक पूरी समृद्ध परंपरा है। लेकिन भारतीय सिनेमा में? रामसे ब्रदर्स के ज़माने से लेकर आज तक, हॉरर का मतलब ज़्यादातर भूत-प्रेत, तांत्रिक और चुड़ैलें रहा है। लाइकेन्थ्रोपी — यानी इंसान का जानवर में बदलना — यह शैली भारतीय फ़िल्ममेकरों ने छुई ही नहीं। और इसकी वजह सिर्फ़ बजट नहीं है — बल्कि हमारे यहाँ हॉरर को 'बी-ग्रेड' मानने का वह पुराना पूर्वाग्रह है जो गंभीर निर्देशकों को इस शैली से दूर रखता आया है।
रिधम जानवे उस दीवार में पहली सेंध लगा रहे हैं। India Today के अनुसार 'हंटर्स मून' में जानवे ने जानबूझकर डायलॉग को न्यूनतम रखा है — फ़िल्म की ताक़त उसकी तस्वीरों, आवाज़ों और शारीरिक रूपांतरण के दृश्यों में है। कैमरा शिकारी के चेहरे पर इतना क़रीब जाता है कि दर्शक खुद महसूस करता है कि कुछ बदल रहा है — धीरे-धीरे, दर्दनाक ढंग से, अपरिवर्तनीय रूप से।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री हलकों में चर्चा है कि जानवे की यह शॉर्ट फ़िल्म असल में एक फ़ीचर-लेंथ प्रोजेक्ट की पायलट है। ट्रेड सूत्रों के मुताबिक़ कम-से-कम दो बड़े OTT प्लेटफ़ॉर्म ने जानवे से संपर्क किया है — और बात सिर्फ़ इस शॉर्ट को स्ट्रीम करने की नहीं, बल्कि इसे फ़ुल-लेंथ फ़ीचर या लिमिटेड सीरीज़ में बदलने की है। फ़ेस्टिवल सर्किट पर भी फुसफुसाहट है कि कान में इस फ़िल्म की स्क्रीनिंग के बाद कुछ यूरोपीय को-प्रोडक्शन हाउसेज़ ने दिलचस्पी दिखाई है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
फ़ैन्स और फ़िल्म बफ़्स के बीच भी बज़ अलग क़िस्म का है। सोशल मीडिया पर लोग जानवे की तुलना जॉर्डन पील और अरी एस्टर जैसे निर्देशकों से कर रहे हैं — भले ही यह तुलना अभी ज़ल्दबाज़ी हो, लेकिन यह बताती है कि दर्शकों को भारत से ऐसी फ़िल्में चाहिए जो ग्लोबल हॉरर की भाषा बोलें, सिर्फ़ 'स्त्री' और 'भूल भुलैया' वाले कॉमेडी-हॉरर फ़ॉर्मूले में अटकी न रहें।
रिधम जानवे — वो नाम जो आपको याद रखना चाहिए
जानवे का नाम पहले भी उन लोगों को पता होगा जो भारतीय इंडिपेंडेंट सिनेमा फ़ॉलो करते हैं। इनका काम 'लापता लेडीज़' जैसी फ़िल्मों से भी जुड़ा रहा है, लेकिन 'हंटर्स मून' पूरी तरह उनकी अपनी आवाज़ है — कच्ची, बेचैन, बिना किसी समझौते वाली। India Today के अनुसार जानवे ने इस फ़िल्म में प्रैक्टिकल इफ़ेक्ट्स पर भरोसा किया है, CGI पर नहीं — और यही बात फ़िल्म को एक ऑर्गेनिक, त्वचा के नीचे उतरने वाला अनुभव बनाती है। जब शिकारी का शरीर बदलता है, तो वह डिजिटल नहीं दिखता — वह असली, दर्दभरा, लगभग सहानुभूतिपूर्ण लगता है।
और यही जानवे का सबसे बड़ा दांव है: उन्होंने वेयरवुल्फ़ को सिर्फ़ डरावना राक्षस नहीं बनाया, बल्कि एक ऐसा रूपक बनाया है जो इंसान के भीतर के उस हिस्से की बात करता है जिसे हम सभ्यता के नाम पर दबाकर रखते हैं। पूर्णिमा यहाँ सिर्फ़ प्लॉट डिवाइस नहीं — वह वो लम्हा है जब मुखौटा गिरता है।
भारतीय हॉरर का अगला मोड़ — या सिर्फ़ फ़ेस्टिवल का चमत्कार?
यहीं पर इंडिया हेराल्ड की पढ़ाई कुछ और कहती है। 'हंटर्स मून' की असली परीक्षा फ़ेस्टिवल तालियों में नहीं बल्कि इसमें है कि क्या यह भारतीय हॉरर सिनेमा की दिशा बदल सकती है। पिछले पाँच सालों में 'तुम्बाड' (2018) ने दिखाया कि दर्शक गंभीर, विज़ुअली समृद्ध भारतीय हॉरर के भूखे हैं — उस फ़िल्म ने ₹13 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की थी, जो उसके बजट से कई गुना थी। लेकिन 'तुम्बाड' के बाद उस शैली में कोई सार्थक उत्तराधिकारी नहीं आया। 'हंटर्स मून' वह ख़ाली जगह भर सकती है — बशर्ते इसे फ़ीचर-लेंथ में बदलने का मौक़ा मिले और कोई स्टूडियो इसे 'मास अपील' के नाम पर कॉमेडी-हॉरर में न बदल दे।
आने वाले महीनों में देखने लायक़ बात यह होगी कि क्या जानवे अपनी शर्तों पर फ़ीचर बना पाते हैं या OTT का दबाव उन्हें 'सुरक्षित' रास्ते पर ले जाता है। अगर 'हंटर्स मून' का फ़ीचर वर्ज़न उसी कच्ची, बेचैन ऊर्जा के साथ आता है, तो यह 2026-27 की सबसे ज़रूरी भारतीय फ़िल्म हो सकती है। लेकिन अगर इसे पतला किया गया, तो यह सिर्फ़ एक और "ओह, वो फ़ेस्टिवल फ़िल्म" बनकर रह जाएगी — और भारतीय सिनेमा एक बार फिर उस साहसी मोड़ से चूक जाएगा जो 'तुम्बाड' ने दिखाया था पर कोई पकड़ नहीं पाया।
एक पूर्णिमा की रात, एक शिकारी बदला — सवाल यह है कि क्या भारतीय सिनेमा भी बदलने को तैयार है, या वह अब भी उसी जंगल में उन्हीं पुराने भूतों के पीछे भटकता रहेगा?
आरोप और दावे यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं; जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, ये अप्रमाणित माने जाएँ।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
आँकड़ों में
- 'तुम्बाड' (2018) ने ₹13 करोड़ से ज़्यादा कमाई की थी — अपने बजट से कई गुना — जो दर्शकों की गंभीर भारतीय हॉरर की भूख का सबूत है।
- India Today के अनुसार 'हंटर्स मून' में डायलॉग न्यूनतम हैं और फ़िल्म की ताक़त पूरी तरह विज़ुअल और साउंड डिज़ाइन पर टिकी है।
मुख्य बातें
- रिधम जानवे की 'हंटर्स मून' भारतीय सिनेमा की पहली गंभीर वेयरवुल्फ़/बॉडी-हॉरर फ़िल्मों में से एक है — India Today के अनुसार यह विज़ुअल स्टोरीटेलिंग का मास्टरक्लास है।
- भारतीय हॉरर सिनेमा में लाइकेन्थ्रोपी शैली लगभग अनुपस्थित रही है — 'तुम्बाड' (2018, ₹13 करोड़+ कमाई) के बाद गंभीर हॉरर का कोई बड़ा उत्तराधिकारी नहीं आया।
- ट्रेड हलकों में चर्चा है कि OTT प्लेटफ़ॉर्म्स जानवे से फ़ीचर-लेंथ वर्ज़न के लिए बातचीत कर रहे हैं — लेकिन असली सवाल यह है कि क्या फ़िल्म अपनी कच्ची ऊर्जा बचा पाएगी।
- जानवे ने प्रैक्टिकल इफ़ेक्ट्स पर भरोसा किया है, CGI पर नहीं — और यही फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
रिधम जानवे कौन हैं और 'हंटर्स मून' क्या है?
रिधम जानवे एक भारतीय इंडिपेंडेंट फ़िल्ममेकर हैं जो 'लापता लेडीज़' से भी जुड़े रहे हैं। 'हंटर्स मून' उनकी शॉर्ट फ़िल्म है जो वेयरवुल्फ़/बॉडी-हॉरर शैली में बनी है और अंतरराष्ट्रीय फ़ेस्टिवल सर्किट पर चर्चित हुई है।
'हंटर्स मून' भारतीय सिनेमा के लिए क्यों ख़ास है?
भारतीय सिनेमा में लाइकेन्थ्रोपी (इंसान का जानवर में बदलना) शैली लगभग अनछुई रही है। 'हंटर्स मून' इस शैली में पहली गंभीर भारतीय फ़िल्मों में से एक है और 'तुम्बाड' के बाद गंभीर हॉरर की ख़ाली जगह भरने की संभावना रखती है।
क्या 'हंटर्स मून' की फ़ीचर फ़िल्म बनेगी?
ट्रेड हलकों में चर्चा है कि OTT प्लेटफ़ॉर्म्स जानवे से फ़ीचर-लेंथ या लिमिटेड सीरीज़ वर्ज़न के लिए बात कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।