40 करोड़ की फीस, घिसी कहानी — क्या 'धमाल 4' अजय देवगन का ATM है या दर्शकों का?
अजय देवगन ने धमाल 4 के लिए करीब 40 करोड़ रुपये फीस ली है, जबकि 2019 की टोटल धमाल में उनकी फीस 25-30 करोड़ बताई गई थी। सात साल में फीस लगभग डेढ़ गुनी बढ़ी, लेकिन फ्रैंचाइजी की कहानी और VFX क्वालिटी पर सवाल बरकरार हैं।
चालीस करोड़ रुपये। एक अदाकार की फीस — सिर्फ़ एक फ़िल्म के लिए — जो रक़म किसी मझोली हिंदी फ़िल्म का पूरा बजट हो सकती है। और फ़िल्म? धमाल 4 — वही फ्रैंचाइजी जिसकी कहानी पर ख़ुद उसके दर्शक भी अब चुटकुले बनाने लगे हैं। सवाल सीधा है: क्या अजय देवगन ने फ्रैंचाइजी को अपना पर्सनल ATM बना लिया है, या फिर मेकर्स को लगता है कि उनका नाम अकेला ही टिकट खिड़की पर ताला तोड़ सकता है?
TV9 भारतवर्ष की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, अजय देवगन ने धमाल 4 के लिए लगभग 40 करोड़ रुपये की फीस वसूली है। यह आँकड़ा अपने-आप में चौंकाने वाला है, लेकिन इसे असली परिप्रेक्ष्य तब मिलता है जब आप पीछे मुड़कर देखें — 2019 में रिलीज़ हुई टोटल धमाल में उनकी फीस 25 से 30 करोड़ के बीच रिपोर्ट की गई थी। यानी सात साल में, कहानी भले ही वहीं अटकी रही, फीस लगभग डेढ़ गुनी हो गई।
ABP न्यूज़ की रिपोर्ट एक और दिलचस्प तस्वीर पेश करती है — धमाल 4 की पूरी कास्ट में सबसे ज़्यादा फीस अजय देवगन की है, जबकि रितेश देशमुख जैसे बाकी कलाकारों को इससे कहीं कम मिला। फ्रैंचाइजी इकॉनमी का गणित साफ़ है: सुपरस्टार को सबसे बड़ा हिस्सा, बाकी कास्ट और प्रोडक्शन — कहानी, VFX, राइटिंग — उसके बाद जो बचे उसमें मैनेज करो।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री के हलकों में इस फीस स्ट्रक्चर पर जो बात सबसे ज़्यादा घूम रही है, वह यह नहीं कि अजय देवगन ने 40 करोड़ लिए — बल्कि यह कि जब कुल बजट का इतना बड़ा हिस्सा एक स्टार की जेब में चला जाता है, तो VFX और स्क्रिप्ट के लिए बचता ही क्या है? ट्रेड विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि धमाल सीरीज़ का VFX शुरू से ही 'हॉलीवुड इंस्पायर्ड लेकिन कोलकाता बजट' वाला रहा है — और जब स्टार फीस बढ़ती जाती है तो यह खाई और गहरी होती है। एक ट्रेड इनसाइडर के शब्दों में: "प्रोड्यूसर को लगता है कि अजय का नाम ही VFX है — बाक़ी सब सेकेंडरी।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
फ़ैन्स के बीच भी मूड बँटा हुआ है। एक तबक़ा कहता है कि अजय देवगन का ब्रांड ही धमाल फ्रैंचाइजी की गारंटी है — उनकी टाइमिंग, उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस, उनकी 'सीरियस आदमी कॉमेडी में' वाली केमिस्ट्री। दूसरा तबक़ा, ख़ासकर सोशल मीडिया पर, खुलकर पूछ रहा है: 40 करोड़ किस बात के? कहानी वही — ख़ज़ाने की तलाश, भागदौड़, सस्ते VFX वाले सीन, और क्लाइमैक्स में एक बड़ा धमाका। ऑनलाइन घूमता सवाल यही है: क्या दर्शक अब भी इस फ़ॉर्मूले पर भरोसा करेंगे?
फ्रैंचाइजी इकॉनमी — दर्शक ने क्या ख़रीदा, क्या बेचा गया?
थोड़ा पीछे चलें। पहली धमाल 2007 में आई थी — तब अजय देवगन इस फ्रैंचाइजी में नहीं थे। फ़िल्म ने मामूली बजट में अच्छा कमाया और एक फ्रैंचाइजी की नींव रखी। डबल धमाल (2011) में नुस्खा वही रहा, कमाई बढ़ी। फिर आई टोटल धमाल (2019) — अजय देवगन की एंट्री हुई, फ़िल्म ने बॉक्स-ऑफ़िस पर 200 करोड़ से ज़्यादा कमाए। गणित सीधा था: बड़ा नाम = बड़ी ओपनिंग = फ्रैंचाइजी को नया जीवन।
लेकिन इंडिया हेराल्ड की नज़र उस कोण पर है जो बाकी रिपोर्ट्स से छूट गया — टोटल धमाल की 200 करोड़+ कमाई ने एक ख़तरनाक सबक़ दिया: कहानी कमज़ोर हो, VFX हँसी का पात्र हो, समीक्षक कूड़ा कहें — लेकिन अगर फ्रैंचाइजी नोस्टैल्जिया और सुपरस्टार का नाम है, तो दर्शक फिर भी आएगा। यही 'सेफ ATM' मॉडल है। प्रोड्यूसर के लिए रिस्क कम, स्टार के लिए गारंटीड पेमेंट, और दर्शक? दर्शक को मिलता है वही पुराना खाना नई प्लेट में।
अब सवाल 2026 का है। ओटीटी ने दर्शक की समझ बदल दी है। वेब सीरीज़ से ट्रेंड कंटेंट-ड्रिवन हो गया है, जहाँ कहानी और लेखन स्टार से ज़्यादा मायने रखते हैं। ऐसे माहौल में एक 40 करोड़ फीस वाली, फ़ॉर्मूला-आधारित कॉमेडी फ्रैंचाइजी का दांव पहले से ज़्यादा जोखिम भरा है। अगर धमाल 4 चली, तो यह मॉडल अमर हो जाएगा। अगर नहीं चली, तो यह बॉलीवुड के उस दौर का एपिटाफ़ बन सकती है जहाँ स्टार-फ़ीस ने कंटेंट को खा लिया।
आगे क्या — दर्शक का फ़ैसला
देखने वाली बात यह होगी कि धमाल 4 का ओपनिंग वीकेंड क्या करता है। अगर फ़िल्म 150-200 करोड़ का लाइफ़टाइम कलेक्शन भी करती है, तो प्रोड्यूसर का गणित सही साबित होगा — 40 करोड़ की फीस 'वसूल' मानी जाएगी। लेकिन अगर दर्शक ने इस बार ओटीटी का इंतज़ार करने का मन बना लिया — जैसा कि हाल की कई बड़ी कॉमेडी फ़िल्मों के साथ हुआ — तो 40 करोड़ की फीस ख़बर नहीं, केस स्टडी बन जाएगी। ट्रेड हलकों में फुसफुसाहट यह भी है कि अगर यह फ़ॉर्मूला एक बार और काम कर गया, तो धमाल 5 की बात शुरू होने में देर नहीं लगेगी — फीस और ऊपर, कहानी और वहीं।
आख़िर में बात इतनी-सी है: अजय देवगन एक स्मार्ट बिज़नेसमैन हैं — 40 करोड़ इसलिए मिलते हैं क्योंकि मार्केट देने को तैयार है। असली सवाल मेकर्स और दर्शकों से है। मेकर्स: क्या इतनी फीस देने के बाद कहानी और प्रोडक्शन वैल्यू के लिए कुछ बचा? दर्शक: क्या आप अभी भी वही 15 साल पुरानी रेसिपी पर 300-500 रुपये का टिकट ख़र्च करेंगे — या अब आपने अपना पैसा कहीं और लगाना सीख लिया है?
यह रिपोर्ट पत्रकारीय है, निवेश या वित्तीय सलाह नहीं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- अजय देवगन की फीस टोटल धमाल (2019) की 25-30 करोड़ से बढ़कर धमाल 4 में 40 करोड़ हो गई — सात साल में लगभग डेढ़ गुनी।
- धमाल 4 में सबसे बड़ा हिस्सा अजय देवगन का है — बाकी कास्ट जैसे रितेश देशमुख को काफ़ी कम मिला, ABP न्यूज़ के अनुसार।
- फ्रैंचाइजी इकॉनमी का असली ख़तरा: स्टार-फीस बजट का बड़ा हिस्सा खा जाती है, जिससे VFX, राइटिंग और प्रोडक्शन वैल्यू पर समझौता होता है।
- टोटल धमाल ने 200 करोड़+ कमाए थे — इसी सफलता ने 'कमज़ोर कहानी, बड़ा नाम' वाले फ़ॉर्मूले को और मज़बूत किया।
- 2026 में ओटीटी-शिक्षित दर्शक इस फ़ॉर्मूले को स्वीकारेगा या नकारेगा — यही धमाल 4 की असली परीक्षा है।
आँकड़ों में
- अजय देवगन की धमाल 4 फीस: ~40 करोड़ रुपये (TV9 भारतवर्ष)
- टोटल धमाल (2019) में अजय देवगन की फीस: 25-30 करोड़ रुपये (TV9 भारतवर्ष)
- टोटल धमाल बॉक्स-ऑफ़िस कलेक्शन: 200 करोड़+ (ट्रेड रिपोर्ट्स)
- फीस में उछाल: सात साल में लगभग 50-60% की बढ़ोतरी