नोलन की 'ओडिसी' को ज़ीरो कट, बॉलीवुड को कैंची — CBFC का यह डबल स्टैंडर्ड कब तक?

Raj Harsh

CBFC ने क्रिस्टोफ़र नोलन की 'द ओडिसी' को बिना किसी कट के 'A' सर्टिफिकेट दिया है। बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के अनुसार फ़िल्म ज्यों-की-त्यों पास हुई। यह फ़ैसला बॉलीवुड फ़िल्ममेकर्स के अनुभव से बिलकुल उलट है, जहाँ कट और बदलाव रोज़मर्रा की बात है।

ज़ीरो। शून्य। एक भी कट नहीं। क्रिस्टोफ़र नोलन की 'द ओडिसी' (The Odyssey) — जिसमें युद्ध है, हिंसा है, होमर के महाकाव्य का वह कच्चा यथार्थ है जो कई बार स्क्रीन पर देखकर बेचैन कर दे — उसे CBFC ने 'A' सर्टिफ़िकेट के साथ ज्यों-की-त्यों पास कर दिया। बॉलीवुड हंगामा की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, फ़िल्म में न कोई सीन काटा गया, न कोई डायलॉग बदला गया। अब इसे एक पल के लिए रोककर सोचिए — ठीक उसी CBFC के सामने जब कोई भारतीय फ़िल्ममेकर अपनी फ़िल्म लेकर जाता है, तो क्या होता है?

जवाब हर बॉलीवुड प्रोड्यूसर जानता है। संवाद बदलो, किसिंग सीन काटो, राजनीतिक संकेत हटाओ, और कभी-कभी तो पूरी कहानी की रीढ़ ही तोड़ दो — तब जाकर सर्टिफ़िकेट मिलता है। अनुराग कश्यप से लेकर विशाल भारद्वाज तक, दर्जनों फ़िल्ममेकर्स ने सार्वजनिक रूप से CBFC की कैंची का शिकार होने की बात कही है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, नोलन की यह फ़िल्म हॉलीवुड की उन बड़ी रिलीज़ेज़ में शामिल है जिन्हें भारत में लगभग बिना छेड़छाड़ के पास किया जाता रहा है।

इनसाइड टॉक

इंडस्ट्री के गलियारों में जो बात धीरे-धीरे कही जा रही है, वह सीधी है: CBFC को हॉलीवुड स्टूडियोज़ से डर लगता है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि यूनिवर्सल, वॉर्नर ब्रदर्स या डिज़्नी जैसे स्टूडियोज़ जब अपनी फ़िल्म भारत में रिलीज़ करते हैं, तो उनकी कानूनी टीमें इतनी मज़बूत होती हैं कि CBFC कट माँगने से पहले दस बार सोचता है। वहीं एक स्वतंत्र भारतीय फ़िल्ममेकर के पास न वह कानूनी ताक़त होती है, न वह अंतरराष्ट्रीय दबाव। फ़ैन्स मानते हैं कि यह 'गोरी चमड़ी' का पुराना सम्मोहन है — जो विदेशी है वह 'कला' है, जो देसी है वह 'अश्लील' या 'विवादित'। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इस डबल स्टैंडर्ड की जड़ें सिर्फ़ डर में नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र में भी हैं। हॉलीवुड फ़िल्मों की भारतीय बॉक्स ऑफ़िस हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। 'ओपनहाइमर' ने भारत में ₹100 करोड़ से ऊपर कमाए, 'इंटरस्टेलर' का IMAX री-रन हाउसफ़ुल गया। जब इतना पैसा दांव पर हो, तो सेंसर बोर्ड का रवैया नरम हो जाना कोई रहस्य नहीं। लेकिन ठीक उसी तर्क से — बॉलीवुड भी तो भारतीय बॉक्स ऑफ़िस की रीढ़ है? फिर उसके साथ सौतेला व्यवहार क्यों?

कला की कैंची — असली नुक़सान किसका?

असली नुक़सान दर्शक का है। जब CBFC किसी भारतीय फ़िल्म में से दो-चार मिनट काट देता है, तो जो कहानी निर्देशक ने सोची थी, वह कटी-फटी हालत में दर्शक तक पहुँचती है। कई बार फ़िल्म की लय टूट जाती है, किरदारों की प्रेरणा ग़ायब हो जाती है, और दर्शक को लगता है कि कहानी में कुछ 'मिसिंग' है। वहीं नोलन की फ़िल्म — पूरी, अखंड, वैसी जैसी बनाई गई थी — भारतीय स्क्रीन पर उतरेगी। दर्शक दोनों देखेगा, और तुलना ख़ुद कर लेगा।

इंडिया हेराल्ड का सीधा रीड यह है कि CBFC का यह ज़ीरो-कट फ़ैसला नोलन की 'कलात्मक श्रेष्ठता' का प्रमाणपत्र कम, भारतीय सिस्टम की संरचनात्मक कमज़ोरी का आईना ज़्यादा है। जब तक CBFC के पास स्पष्ट, लिखित, समान रूप से लागू होने वाले मानदंड नहीं होंगे — जो हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों पर एक जैसे लागू हों — तब तक यह 'डबल स्टैंडर्ड' का आरोप बार-बार उठता रहेगा। और उठना भी चाहिए।

आगे क्या होगा?

देखने वाली बात यह है कि 'द ओडिसी' की भारतीय रिलीज़ के बाद बॉक्स ऑफ़िस नंबर्स कैसे आते हैं। अगर फ़िल्म ₹100 करोड़ पार करती है — जो नोलन के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए संभव है — तो यह CBFC के लिए और भी मुश्किल सवाल खड़ा करेगा: अगर बिना कट वाली फ़िल्म से न समाज बिगड़ा, न कोई विवाद हुआ, तो बॉलीवुड फ़िल्मों में कट की ज़रूरत ही क्या थी? उधर, भारतीय फ़िल्ममेकर्स का एक धड़ा पहले से ही सेंसरशिप सुधार की माँग कर रहा है। अगर सरकार 2026 में सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों को गंभीरता से लेती है, तो शायद यह बहस सिर्फ़ ट्विटर तक सीमित न रहे।

फ़िलहाल सच यह है कि एक अमेरिकी फ़िल्ममेकर की फ़िल्म भारत में पूरी दिखाई जाएगी, और एक भारतीय फ़िल्ममेकर अपनी ही ज़मीन पर अपनी कहानी पूरी नहीं दिखा सकता। यह विडंबना नहीं, यह नीतिगत विफलता है। और सवाल अब भी वही है — यह 'डबल स्टैंडर्ड' कब तक?

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मुख्य बातें

  • CBFC ने क्रिस्टोफ़र नोलन की 'द ओडिसी' को बिना एक भी कट 'A' सर्टिफ़िकेट दिया — बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के अनुसार।
  • बॉलीवुड फ़िल्ममेकर्स को अक्सर संवाद बदलने, सीन काटने और सेंसर बोर्ड की शर्तें मानने पर मजबूर किया जाता है — यह असमान बर्ताव संरचनात्मक है।
  • हॉलीवुड स्टूडियोज़ की कानूनी ताक़त और अंतरराष्ट्रीय दबाव CBFC के नरम रवैये की एक बड़ी वजह मानी जाती है।
  • असली नुक़सान दर्शक का है — कटी-फटी फ़िल्म से कहानी की लय और किरदारों की प्रेरणा ख़त्म हो जाती है।
  • जब तक CBFC के मानदंड हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों पर समान रूप से लागू नहीं होते, डबल स्टैंडर्ड का आरोप बना रहेगा।

आँकड़ों में

  • CBFC ने 'द ओडिसी' में ज़ीरो कट दिए — बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के अनुसार।
  • नोलन की 'ओपनहाइमर' ने भारत में ₹100 करोड़ से ऊपर की कमाई की थी।

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