हिंगोली में 4 भूकंप और ज़मीन से उठती 'दहाड़' — क्या मराठवाड़ा की धरती कोई बड़ी चेतावनी दे रही है?
हिंगोली में चार भूकंपीय झटकों और ज़मीन के भीतर से उठती भयावह गड़गड़ाहट का कारण इंट्राप्लेट टेक्टोनिक स्ट्रेस और डेक्कन ट्रैप बेसाल्ट चट्टानों में सूक्ष्म दरारों का टूटना है। News18 और भूकंप विज्ञान केंद्रों की रिपोर्ट के अनुसार, यह सीधे किसी बड़े विनाशकारी भूकंप का संकेत नहीं, लेकिन मराठवाड़ा का भूकंपीय इतिहास लापरवाही की इजाज़त भी नहीं देता।
कल्पना कीजिए — रात के अँधेरे में, जब हिंगोली के किसान अपनी ज़मीन से कान लगाकर सुनें तो उन्हें अपनी ही धरती से एक 'दहाड़' सुनाई दे। यह किसी फ़िल्म की कहानी नहीं, मराठवाड़ा की ज़मीनी हक़ीक़त है। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, हिंगोली ज़िले में कुछ ही दिनों के भीतर चार बार ज़मीन काँपी और भूगर्भ से ऐसी ख़ौफ़नाक गड़गड़ाहट उठी कि हज़ारों लोग आधी रात को सड़कों पर आ खड़े हुए। सवाल सीधा है — क्या यह किसी बड़ी तबाही की आहट है, या सिर्फ़ धरती का अपना 'करवट बदलना'?
इसका जवाब देने के लिए हमें उस ज़मीन की भाषा समझनी होगी जिस पर मराठवाड़ा बसा है।
डेक्कन ट्रैप — वो 6.5 करोड़ साल पुरानी चट्टान जो आज भी ज़िंदा है
हिंगोली समेत पूरा मराठवाड़ा डेक्कन ट्रैप बेसाल्ट पर टिका है — करोड़ों साल पहले ज्वालामुखी विस्फोटों से बनी लावा की परतें, जो ठंडी होकर कठोर चट्टान बन गईं। Geological Survey of India (GSI) के शोध के अनुसार, ये बेसाल्ट परतें अत्यंत कठोर और भंगुर (brittle) हैं। जब भारतीय टेक्टोनिक प्लेट लगातार उत्तर-पूर्व की ओर सरकती है — लगभग 5 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष, जो भूगर्भीय पैमाने पर तेज़ गति है — तो यह तनाव (स्ट्रेस) इन कठोर चट्टानों में जमा होता रहता है।
एक बिंदु पर यह तनाव चट्टान की सहनशक्ति से ज़्यादा हो जाता है। चट्टान टूटती है — और यह टूटना ही भूकंप है। हिंगोली में जो चार झटके आए, वे इसी प्रक्रिया के नतीजे हैं: इंट्राप्लेट भूकंप, यानी प्लेट की सीमा पर नहीं बल्कि प्लेट के भीतर ही सूक्ष्म फ़ॉल्ट लाइनों पर दबाव का रिलीज़ होना।
वो 'दहाड़' असल में क्या है — इन्फ़्रासाउंड का विज्ञान
ज़मीन के नीचे से आने वाली ये भयावह आवाज़ें जिन्हें स्थानीय लोग 'दहाड़' कह रहे हैं, दरअसल कम-आवृत्ति (low-frequency) ध्वनि तरंगें हैं जिन्हें भूकंप विज्ञान में इन्फ़्रासाउंड या सीस्मिक रंबल कहते हैं। National Centre for Seismology के विशेषज्ञों के अनुसार, जब उथली गहराई (5-10 किलोमीटर) पर चट्टानें टूटती हैं, तो उत्पन्न भूकंपीय तरंगों का एक हिस्सा ध्वनि तरंगों में बदलकर सतह तक पहुँचता है। डेक्कन ट्रैप की कठोर बेसाल्ट इन तरंगों को बहुत कुशलता से ऊपर की ओर पहुँचाती है — मानो एक विशाल स्पीकर हो।
यही कारण है कि जलोढ़ मिट्टी वाले गंगा के मैदानी इलाक़ों में इतनी तीव्रता के भूकंप में कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती, लेकिन बेसाल्ट पर बसे मराठवाड़ा में वही झटका एक भयानक गूँज पैदा करता है। यह चट्टान की संरचना का कमाल है, किसी अलौकिक शक्ति का नहीं।
भूकंपीय ज़ोन-III — ख़तरा कितना बड़ा?
भारत के भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र (Bureau of Indian Standards, IS 1893:2016) के अनुसार हिंगोली ज़ोन-III में आता है, जिसका अर्थ है 'मध्यम क्षति जोखिम' (Moderate Damage Risk Zone)। इसका मतलब यहाँ विनाशकारी भूकंप की संभावना ज़ोन-IV या V (कश्मीर, उत्तर-पूर्व) जितनी नहीं है — लेकिन इतिहास चेतावनी ज़रूर देता है।
30 सितंबर 1993 को मराठवाड़ा के ही लातूर-उस्मानाबाद में 6.2 तीव्रता का भूकंप आया था जिसमें क़रीब 10,000 लोग मारे गए थे — भारत के सबसे घातक इंट्राप्लेट भूकंपों में से एक। GSI की रिपोर्ट के अनुसार, उस भूकंप से पहले भी क्षेत्र में छोटे झटकों और भूगर्भीय आवाज़ों की रिपोर्ट आई थीं, जिन्हें उस समय गंभीरता से नहीं लिया गया।
इसीलिए हिंगोली की वर्तमान भूकंपीय गतिविधि को न तो दहशत का बहाना बनाना सही है, न ही अनदेखा करना। इंडिया हेराल्ड का स्पष्ट आकलन यह है कि छोटे-छोटे झटकों का क्लस्टर अपने आप में किसी बड़े भूकंप का पूर्व-संकेत नहीं होता — भूकंप विज्ञान की मौजूदा तकनीक आज भी भूकंपों की सटीक भविष्यवाणी करने में असमर्थ है — लेकिन यह ज़रूर बताता है कि क्षेत्र की फ़ॉल्ट लाइनें सक्रिय हैं और प्रशासनिक तैयारी ज़रूरी है।
असली ख़तरा — भूकंप नहीं, बेख़बरी
मराठवाड़ा में असल समस्या भूगर्भीय नहीं, प्रशासनिक है। National Disaster Management Authority (NDMA) की गाइडलाइन्स के अनुसार ज़ोन-III के सभी नगरपालिका क्षेत्रों में भूकंप-प्रतिरोधी (seismic-resistant) बिल्डिंग कोड लागू होना चाहिए, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि हिंगोली जैसे छोटे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में अधिकांश निर्माण बिना किसी इंजीनियरिंग मानक के होता है। 1993 के लातूर भूकंप में सबसे ज़्यादा जानें पत्थर और मिट्टी के उन घरों में गईं जो बिना किसी भूकंपीय डिज़ाइन के बने थे।
तीन दशक बाद भी, ग्रामीण महाराष्ट्र में इस दिशा में कितनी प्रगति हुई — यह सवाल किसी भी सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं पूछा जाता। [EMBED-SUGGESTION:tweet]
आगे क्या — नज़र किस पर रखें
आने वाले दिनों में कुछ बातें देखने लायक़ हैं। पहला — क्या National Centre for Seismology हिंगोली में अतिरिक्त पोर्टेबल सीस्मोग्राफ़ लगाता है, जैसा कि 2021 में पालघर भूकंप स्वार्म के दौरान किया गया था। दूसरा — क्या महाराष्ट्र सरकार इस क्षेत्र के लिए कोई विशेष भूकंपीय माइक्रो-ज़ोनेशन अध्ययन शुरू करती है, जो GSI ने 2019 से लंबित रखा है। तीसरा — मॉनसून का मौसम शुरू हो चुका है; बारिश से ज़मीन में पानी का रिसाव (pore-water pressure) बढ़ने से उथली फ़ॉल्ट लाइनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है, जो और झटके ट्रिगर कर सकता है।
हिंगोली की धरती जो कह रही है, उसे सुनना ज़रूरी है — लेकिन सही कान से। दहशत का कान नहीं, विज्ञान का। असली सवाल यह नहीं कि 'क्या बड़ा भूकंप आएगा' — असली सवाल यह है कि अगर आया, तो क्या हम तैयार हैं? और उस सवाल का जवाब, ज़मीन के नीचे से नहीं, ज़मीन के ऊपर बैठी सरकारों से आना चाहिए।
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मुख्य बातें
- हिंगोली में चार भूकंपीय झटके इंट्राप्लेट टेक्टोनिक स्ट्रेस का नतीजा हैं — प्लेट सीमा के भूकंपों से अलग, मगर कम ख़तरनाक नहीं; 1993 का लातूर भूकंप (6.2 तीव्रता, ~10,000 मौतें) इसी श्रेणी का था।
- ज़मीन से उठने वाली 'दहाड़' वैज्ञानिक रूप से कम-आवृत्ति ध्वनि तरंगें (इन्फ़्रासाउंड) हैं जो डेक्कन ट्रैप बेसाल्ट की कठोर संरचना से प्रवर्धित होकर सतह तक पहुँचती हैं — अलौकिक नहीं, पूरी तरह भूवैज्ञानिक।
- भूकंपों की सटीक भविष्यवाणी आज भी विज्ञान के वश में नहीं है, लेकिन असली जोखिम भूकंप-प्रतिरोधी निर्माण मानकों की अनुपालना न होना है — NDMA की गाइडलाइन्स ज़मीन पर लागू नहीं हो रहीं।
- मॉनसून में बारिश से pore-water pressure बढ़ने पर उथली फ़ॉल्ट लाइनों पर और झटकों की संभावना बढ़ सकती है — National Centre for Seismology की निगरानी अहम होगी।
आँकड़ों में
- भारतीय प्लेट की गति लगभग 5 सेंटीमीटर/वर्ष उत्तर-पूर्व — भूगर्भीय पैमाने पर तेज़ (GSI)
- 1993 का लातूर भूकंप: 6.2 तीव्रता, लगभग 10,000 मौतें — भारत का सबसे घातक इंट्राप्लेट भूकंप (GSI)
- हिंगोली भूकंपीय ज़ोन-III (BIS IS 1893:2016) — मध्यम क्षति जोखिम वाला क्षेत्र