आपातकाल के 50 साल — BJP और Congress दोनों जो 'भूलना' चाहती हैं, वही असली सबक़ क्यों है?

आपातकाल की 50वीं बरसी पर BJP ने Congress को 'तानाशाही का प्रतीक' बताया है। लेकिन दोनों पार्टियाँ इतिहास का चयनात्मक इस्तेमाल कर रही हैं — BJP अपने कार्यकाल में अनुच्छेद 370 हटाने, राज्यपाल शक्तियों के विस्तार और राजद्रोह कानून जैसे विवादों पर चुप है, जबकि Congress 1975 की ज़िम्मेदारी से बचती रही है।

पचास साल। आधी सदी। एक लोकतंत्र के लिए इतना वक़्त काफ़ी होना चाहिए कि वह अपनी सबसे बड़ी ग़लती को ठीक से समझ ले — लेकिन भारत में 25 जून 1975 की रात अभी भी एक आईना नहीं, हथियार है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर BJP ने Congress पर ज़बरदस्त हमला बोला है और नागरिकों से कहा है कि वे 'उस दौर की सच्चाई याद रखें'। लेकिन सवाल यह है: किसकी सच्चाई?

दिल्ली में BJP प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि आपातकाल की याद को ज़िंदा रखना हर नागरिक का कर्तव्य है।

तिरुवनंतपुरम से केरल BJP अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने संविधान और मौलिक अधिकारों का हवाला दिया, तो हैदराबाद से तेलंगाना BJP अध्यक्ष रामचंदर राव ने आपातकाल को 'भारतीय लोकतंत्र का काला दिन' बताया।

यह तीन अलग-अलग शहरों, तीन अलग-अलग राज्यों से एक ही स्क्रिप्ट है — और इसमें कोई संयोग नहीं है। BJP के लिए आपातकाल 2025 का सबसे सस्ता और सबसे कारगर राजनीतिक गोला-बारूद है: Congress को नैतिक रूप से कटघरे में खड़ा करना, बिना अपनी किसी नीति पर सवाल उठने दिए।

दोनों की 'चुनिंदा याददाश्त' — लोकतंत्र की असली बीमारी

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय विश्लेषण के अनुसार, 'आपातकाल की चेतावनी पचास साल बाद भी उतनी ही प्रासंगिक है।' लेकिन यह प्रासंगिकता एकतरफ़ा नहीं है। जब BJP 1975 की इंदिरा गांधी को याद करती है, तो वह 2019 में अनुच्छेद 370 के अचानक निरसन, राज्यसभा में बिना पर्याप्त बहस के पारित विवादास्पिक विधेयकों, और विपक्षी राज्यों में राज्यपालों की विवादास्पद भूमिका पर ख़ामोश रहती है। जब Congress अपना बचाव करती है, तो वह 21 महीने की उस रात को 'एक ग़लती' बताकर आगे बढ़ जाती है — बिना यह स्वीकार किए कि उस दौर में प्रेस सेंसरशिप, नसबंदी अभियान, और हज़ारों राजनीतिक बंदियों की गिरफ़्तारी सिस्टम-स्तर की तानाशाही थी, कोई 'एक ग़लती' नहीं।

यहीं पर 2025 का राजनीतिक संदर्भ इस बरसी को पिछली सभी बरसियों से अलग बनाता है। पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में कार्यपालिका की शक्ति का जो केंद्रीकरण हुआ है — चाहे वह अध्यादेशों के बढ़ते इस्तेमाल में दिखे, चाहे राजद्रोह क़ानून (धारा 124A, अब BNSS के तहत पुनर्परिभाषित) पर सुप्रीम कोर्ट की चिंताओं में, चाहे चुनी हुई राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच बढ़ते टकराव में — यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहाँ आपातकाल सिर्फ़ इतिहास नहीं, एक ज़िंदा सवाल है।

गणित समझिए — यह 'स्मृति-युद्ध' क्यों?

BJP का गणित साफ़ है। 2024 के आम चुनावों में 240 सीटों पर सिमटने के बाद पार्टी को Congress के ख़िलाफ़ एक ऐसे नैतिक मुद्दे की ज़रूरत है जो बिना किसी आर्थिक या नीतिगत सवाल के Congress को बैकफ़ुट पर रखे। आपातकाल वह मुद्दा है जिस पर Congress का बचाव सबसे कमज़ोर है — क्योंकि वह अपराध वास्तविक था। लेकिन BJP का यह दाँव एक और काम करता है: यह 'लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन' की पूरी बहस को 1975 के फ़्रेम में बंद कर देता है, जिससे 2020 के CAA विरोध, 2019 के कश्मीर लॉकडाउन, या विपक्षी नेताओं पर ED-CBI की कार्रवाइयों जैसे मुद्दे चर्चा से बाहर हो जाते हैं।

Congress का गणित भी उतना ही स्वार्थी है। पार्टी इस बरसी पर या तो चुप रहती है या 'आगे देखो' की भाषा बोलती है — जबकि एक ईमानदार, पूर्ण स्वीकारोक्ति उसे नैतिक बढ़त दे सकती थी। राहुल गांधी ने पिछले वर्षों में संविधान की किताब लहराकर जो 'संविधान बचाओ' अभियान चलाया, उसकी विश्वसनीयता तभी बनती जब Congress ने खुलकर कहा: 'हमने 1975 में संविधान को कुचला था — इसीलिए हम जानते हैं कि ख़तरा कैसा दिखता है।' वह बात कभी नहीं आई।

21 महीने का घाव, 50 साल का हथियार

1975 में आपातकाल 21 महीने चला। उन 21 महीनों में क़रीब एक लाख लोगों को MISA (Maintenance of Internal Security Act) और DIR (Defence of India Rules) के तहत गिरफ़्तार किया गया — यह आँकड़ा शाह आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है। प्रेस पर सेंसरशिप लगी, अदालतों ने ADM जबलपुर केस (1976) में नागरिकों के जीवन के अधिकार तक को निलंबित माना। यह कोई 'मामूली भूल' नहीं थी — यह एक संस्थागत पतन था।

लेकिन अगर आज का कोई नागरिक सिर्फ़ BJP की प्रेस कॉन्फ़्रेंस सुनकर अपनी राय बनाता है, तो उसे लगेगा कि लोकतांत्रिक अधिकारों का ख़तरा सिर्फ़ Congress से आता है। और अगर वह सिर्फ़ Congress का पक्ष सुनता है, तो उसे लगेगा कि 1975 एक 'पुरानी बात' है जिसका आज से कोई लेना-देना नहीं। दोनों ग़लत हैं।

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने ठीक लिखा है कि आपातकाल की चेतावनी आज भी उतनी ही ज़रूरी है — लेकिन वह चेतावनी किसी एक पार्टी के लिए नहीं, हर उस सत्ता के लिए है जो संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करती है। चाहे वह 1975 की इंदिरा गांधी हों, या 2025 में कोई भी सरकार जो विपक्ष, न्यायपालिका, या प्रेस की स्वतंत्रता को सिकोड़ती है।

असली सबक़ वह है जो कोई नहीं बोलता

आपातकाल का सबसे बड़ा सबक़ यह नहीं है कि 'Congress ने तानाशाही की थी।' वह सबक़ यह है कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थाएँ — अदालतें, चुनाव आयोग, प्रेस — इतनी नाज़ुक हैं कि एक निर्णय, एक रात में, उन्हें ध्वस्त किया जा सकता है। और यह ताक़त सिर्फ़ Congress के पास नहीं थी — वह हर उस सरकार के पास है जिसके हाथ में बहुमत और इच्छाशक्ति दोनों हों।

जब BJP 'सच्चाई याद रखने' की अपील करती है, तो वह सही है — लेकिन पूरी सच्चाई याद रखना दोनों पार्टियों के लिए असुविधाजनक है। पूरी सच्चाई यह है कि 1975 का आपातकाल एक व्यक्ति की तानाशाही नहीं, एक सिस्टम की विफलता थी — और वह सिस्टम आज भी उतना ही कमज़ोर है। जिस दिन कोई पार्टी यह कहने की हिम्मत करेगी, उस दिन आपातकाल की बरसी सचमुच एक सबक़ बनेगी, सिर्फ़ एक हथियार नहीं।

Key Takeaways

  • इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, BJP ने आपातकाल की 50वीं बरसी पर दिल्ली, केरल, तेलंगाना समेत देशभर में Congress पर हमला बोला और नागरिकों से 'सच्चाई याद रखने' की अपील की।
  • द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के विश्लेषण के अनुसार, आपातकाल की चेतावनी 50 साल बाद भी उतनी ही प्रासंगिक है — यह किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं।
  • शाह आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 1975-77 के आपातकाल में MISA और DIR के तहत लगभग एक लाख लोग गिरफ़्तार किए गए थे।
  • BJP का राजनीतिक गणित: 2024 में 240 सीटों पर सिमटने के बाद Congress को नैतिक बैकफ़ुट पर रखने के लिए आपातकाल सबसे सस्ता हथियार है।
  • दोनों पार्टियाँ 'चयनात्मक स्मृति' का इस्तेमाल कर रही हैं — BJP अनुच्छेद 370 और राज्यपाल विवादों पर चुप है, Congress पूर्ण स्वीकारोक्ति से बचती रही है।

Frequently Asked Questions

आपातकाल कब और क्यों लगाया गया था?

25 जून 1975 की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की। इसका तात्कालिक कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा उनका चुनाव रद्द किया जाना और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बढ़ता विपक्षी आंदोलन था। यह 21 महीने (मार्च 1977 तक) चला।

आपातकाल में कितने लोग गिरफ़्तार हुए थे?

शाह आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, MISA (Maintenance of Internal Security Act) और DIR (Defence of India Rules) के तहत लगभग एक लाख लोगों को गिरफ़्तार किया गया था।

2025 में BJP आपातकाल को क्यों उठा रही है?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, BJP ने 50वीं बरसी पर देशभर में Congress को 'तानाशाही का प्रतीक' बताया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2024 में 240 सीटों पर सिमटने के बाद BJP को Congress को नैतिक रूप से कमज़ोर करने के लिए आपातकाल एक प्रभावी मुद्दा है।

क्या आपातकाल जैसा कुछ दोबारा हो सकता है?

संवैधानिक रूप से 44वें संशोधन (1978) ने आपातकाल लगाने की प्रक्रिया को कठिन बनाया — अब कैबिनेट की लिखित सिफ़ारिश ज़रूरी है और संसद की मंज़ूरी एक महीने में लेनी होती है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि कार्यपालिका की बढ़ती शक्ति, कमज़ोर विपक्ष, और संस्थागत स्वायत्तता पर दबाव आपातकाल-जैसी स्थितियाँ बिना औपचारिक घोषणा के भी पैदा कर सकते हैं।

Find Out More:

Related Articles: