36 राज्य, 36 फायर रूल, हज़ारों ज़िंदगियाँ दाँव पर — SC में याचिका पूछ रही है कि अगली आग बुझाएगा कौन?

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई है जो भारत के सभी 36 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों में एक समान फायर सेफ्टी नियम लागू करने की माँग करती है। याचिका का तर्क है कि अलग-अलग नियमों की वजह से हर साल हज़ारों लोग आग की त्रासदियों में मारे जाते हैं जिन्हें रोका जा सकता था।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: एडवोकेट ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया में जनहित याचिका दायर की है, जिसमें केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को पक्षकार बनाया गया है।
  • क्या: याचिका में माँग है कि पूरे भारत में एक यूनिफॉर्म फायर सेफ्टी कोड बनाया जाए जो राज्यों के अलग-अलग, असंगत नियमों की जगह ले।
  • कब: 2025 में हुई कई बड़ी अग्निकांड त्रासदियों के बाद यह याचिका 2026 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है।
  • कहाँ: सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया, नई दिल्ली — लेकिन इसका असर सभी 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों पर पड़ेगा।
  • क्यों: क्योंकि राज्यों के बीच फायर सेफ्टी नियमों में भारी विसंगति है — कुछ राज्यों में NOC अनिवार्य है, कुछ में नहीं — जिससे हर साल हज़ारों लोग टाली जा सकने वाली आग में मरते हैं।
  • कैसे: याचिका सुप्रीम कोर्ट से निर्देश माँगती है कि केंद्र सरकार नेशनल बिल्डिंग कोड के फायर सेफ्टी प्रावधानों को सभी राज्यों पर बाध्यकारी बनाए और एक राष्ट्रीय फायर सर्विसेज़ एक्ट लाए।

एक आँकड़ा याद रखिए: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक़ भारत में हर साल औसतन 17,000 से ज़्यादा लोग आग की चपेट में आकर जान गँवाते हैं। यह संख्या कई मध्यम आकार के शहरों की पूरी आबादी से ज़्यादा है। अब एक और तथ्य जोड़ लीजिए — इस देश में 28 राज्य और 8 केंद्रशासित प्रदेश हैं, और लगभग हर एक के पास फायर सेफ्टी के अपने अलग नियम हैं। कुछ के पास तो ठीकठाक क़ानून हैं पर अमल शून्य है, और कुछ के पास क़ानून भी नाम के लिए हैं। यह कोई बयानबाज़ी नहीं — यही वह ज़मीनी सच है जिसने आख़िरकार एक वकील को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर किया।

तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जो देश भर में यूनिफॉर्म फायर सेफ्टी रूल्स लागू करने की माँग करती है। याचिकाकर्ता का तर्क सीधा और धारदार है: जब GST के ज़रिए पूरे देश में एक टैक्स व्यवस्था लागू हो सकती है, जब मोटर व्हीकल एक्ट केंद्रीय स्तर पर बन सकता है, तो फिर जब बात ज़िंदगी और मौत की है — आग से सुरक्षा की — तो 36 अलग-अलग नियम क्यों?

वह घातक खाई जो नक्शे पर नहीं दिखती

भारत का नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) फायर सेफ्टी के काफ़ी विस्तृत प्रावधान देता है — स्प्रिंकलर सिस्टम से लेकर फायर एस्केप की चौड़ाई तक। लेकिन पेंच यह है कि NBC एक 'एडवाइज़री' दस्तावेज़ है, बाध्यकारी क़ानून नहीं। राज्यों पर इसे अपनाने की कोई क़ानूनी बाध्यता नहीं है। कुछ राज्यों ने इसके कुछ हिस्से अपने बिल्डिंग बाय-लॉज़ में शामिल किए, कुछ ने पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। नतीजा? दिल्ली में एक कमर्शियल बिल्डिंग को जिन फायर सेफ्टी मानकों से गुज़रना पड़ता है, लखनऊ या पटना की उसी तरह की बिल्डिंग को शायद उनमें से आधे भी नहीं।

हिंदी बेल्ट के शहरों की हालत तो और चिंताजनक है। ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) और विभिन्न CAG रिपोर्ट्स के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में कमर्शियल और रेज़िडेंशियल बिल्डिंग्स बिना वैध फायर NOC के चल रही हैं। लखनऊ में 2019 के एक सर्वे में शहर की अधिकांश बहुमंज़िला इमारतों के पास वैध फायर सेफ्टी सर्टिफ़िकेट नहीं पाया गया था — और तब से स्थिति में नाटकीय बदलाव का कोई सबूत सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। पटना में तो कई अस्पतालों और स्कूलों में भी बुनियादी फायर एक्सटिंग्विशर तक मौजूद नहीं होते। जयपुर और भोपाल में पुरानी वाली शहर की संकरी गलियों में खड़ी इमारतों तक फायर ब्रिगेड की गाड़ी पहुँच ही नहीं सकती — और इसके बावजूद इन्हें ऑक्युपेंसी सर्टिफ़िकेट मिल जाता है।

नियम हैं, लेकिन 'किसके' नियम?

फायर सेफ्टी संविधान की राज्य सूची का विषय है — यानी इस पर क़ानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है। यही वह संवैधानिक गाँठ है जिसे यह याचिका खोलने की कोशिश कर रही है। तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक़ याचिका में तर्क दिया गया है कि जब नागरिकों का जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21) एक मौलिक अधिकार है और यह पूरे देश में एक समान है, तो उस अधिकार की रक्षा करने वाले फायर सेफ्टी नियम भी एक समान होने चाहिए।

यह तर्क क़ानूनी रूप से दिलचस्प है क्योंकि पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के विस्तार में कई बार हस्तक्षेप किया है — चाहे वह पर्यावरण का मामला हो, सड़क सुरक्षा हो या बंधुआ मज़दूरी। अगर कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है और केंद्र को निर्देश देता है कि वह एक राष्ट्रीय फायर सर्विसेज़ एक्ट बनाए, तो यह केंद्र-राज्य संबंधों में एक बड़ा मोड़ होगा।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में इस याचिका को लेकर एक ख़ामोश बेचैनी है, और इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं। फायर सेफ्टी नियमों को सख़्त बनाने का मतलब है — रियल एस्टेट लॉबी से टकराव। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार — हर जगह बिल्डर-नेता गठजोड़ एक खुला रहस्य है। कमर्शियल बिल्डिंग्स को बिना NOC चलने देना कोई 'लापरवाही' नहीं, बल्कि कई बार यह एक सोचा-समझा सियासी समझौता है जहाँ बिल्डर चंदा देता है और प्रशासन आँखें मूँदता है। (यह इंडस्ट्री की खुली चर्चा और विश्लेषकों का आकलन है, पुष्ट आरोप नहीं।)

दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में भी बड़ी त्रासदियों के बाद 'क्रैकडाउन' होता है, कुछ हफ़्ते सीलिंग चलती है, फिर सब सामान्य। राज्य सरकारें जानती हैं कि सख़्त फायर सेफ्टी नियम लागू करने का मतलब है लाखों छोटे व्यापारियों और दुकानदारों को नोटिस देना — और यह वोट बैंक का सवाल बन जाता है। इसीलिए कोई राज्य सरकार ख़ुद आगे बढ़कर सख़्ती नहीं करती — और इसीलिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि इस याचिका का असली महत्व क़ानूनी से ज़्यादा राजनीतिक है। अगर सुप्रीम कोर्ट इसे गंभीरता से लेता है और केंद्र से जवाब माँगता है, तो सत्तारूढ़ सरकार एक मुश्किल चौराहे पर खड़ी होगी: यूनिफॉर्म रूल बनाओ तो राज्यों के अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ का आरोप, न बनाओ तो अगली त्रासदी पर जवाबदेही। विपक्षी दल इसे 'केंद्र की उदासीनता' के रूप में पेश करने का मौक़ा नहीं छोड़ेंगे, ख़ासकर जब 2027 के यूपी चुनाव क़रीब हैं और लखनऊ-कानपुर जैसे शहरों में अग्निकांड की याद ताज़ा है।

कोर्ट का दख़ल क्यों? — जवाब असहज है

यह सवाल बार-बार उठता है: आख़िर हर बात में कोर्ट ही क्यों? जवाब शर्मनाक रूप से सीधा है — क्योंकि विधायिका और कार्यपालिका ने यह काम किया नहीं। भारत में एक 'फायर सर्विसेज़ एक्ट' की माँग दशकों पुरानी है। स्टैंडिंग फायर एडवाइज़री काउंसिल ने कई बार इसकी सिफ़ारिश की। 2012 में तत्कालीन होम सेक्रेटरी ने एक मॉडल फायर सर्विसेज़ बिल का मसौदा तैयार कराया था — वह फ़ाइलों में दफ़्न है। गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर आज भी 'मॉडल बिल' सिफ़ारिश के तौर पर पड़ा है, लेकिन किसी सरकार ने — न यूपीए ने, न एनडीए ने — इसे संसद में पेश करने की हिम्मत नहीं दिखाई। वजह? राज्यों से टकराव का डर, और रियल एस्टेट सेक्टर की लॉबीइंग।

तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट बताती है कि याचिकाकर्ता ने इस लंबी विफलता का पूरा इतिहास कोर्ट के सामने रखा है और तर्क दिया है कि अब न्यायपालिका का हस्तक्षेप इसलिए नहीं कि वह विधायिका की जगह लेना चाहती है, बल्कि इसलिए कि विधायिका ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई ही नहीं।

अगर यूनिफॉर्म रूल आ गए तो क्या बदलेगा?

बहुत कुछ — कम से कम काग़ज़ पर। एक यूनिफॉर्म फायर सेफ्टी कोड का मतलब होगा कि चाहे बिल्डिंग पटना में हो या पुणे में, उसे एक ही स्तर के फायर सेफ्टी इंफ्रास्ट्रक्चर — स्प्रिंकलर, फायर अलार्म, इमरजेंसी एग्ज़िट, फायर एस्केप — से लैस होना पड़ेगा। फायर NOC बिना ऑक्युपेंसी सर्टिफ़िकेट नहीं मिलेगा, और NOC की शर्तें राज्य-दर-राज्य नहीं बदलेंगी। सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि ज़िम्मेदारी तय होगी — अभी जब आग लगती है तो म्युनिसिपल बॉडी कहती है 'फायर विभाग देखे', फायर विभाग कहता है 'बिल्डिंग परमिशन हमारे दायरे में नहीं', और बिल्डर कहता है 'हमने तो नियमों के मुताबिक़ बनाया'। इस ज़िम्मेदारी की पिंग-पॉंग में हर बार ज़िंदगियाँ जाती हैं।

लेकिन — और यह 'लेकिन' बड़ा है — क़ानून बनाना और लागू करना दो बिलकुल अलग बातें हैं। भारत में पहले से ढेरों सुरक्षा क़ानून हैं जो काग़ज़ पर शानदार हैं और ज़मीन पर बेमानी। RERA आया, लेकिन रियल एस्टेट में धोखाधड़ी ख़त्म हुई? बिल्डिंग कॉलैप्स बंद हुए? असली सवाल यह नहीं कि नया क़ानून क्या कहेगा — असली सवाल यह है कि उसे लागू कौन करेगा, और क्या राज्य सरकारें अपने बिल्डर-मित्रों को चुनौती देने को तैयार होंगी।

आगे क्या होगा — और किस पर नज़र रखें

अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर नोटिस जारी करता है, तो पहला संकेत यह होगा कि कोर्ट इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहा है। इसके बाद देखिए कि केंद्र सरकार क्या रुख़ अपनाती है — क्या वह राज्यों के अधिकार का हवाला देकर पल्ला झाड़ती है, या 'कोऑपरेटिव फ़ेडरलिज़्म' के नाम पर बीच का रास्ता निकालती है? राज्य सरकारों का जवाब भी अहम होगा — ख़ासकर उन राज्यों का जहाँ हाल में बड़े अग्निकांड हुए हैं।

बड़ा सवाल यह है: क्या यह याचिका उस राष्ट्रीय फायर सर्विसेज़ एक्ट को फ़ाइलों से बाहर निकाल पाएगी जो दशकों से धूल खा रहा है? इतिहास बताता है कि भारत में बड़े सुरक्षा सुधार तभी आते हैं जब या तो कोई भयानक त्रासदी होती है या कोर्ट डंडा दिखाता है — और अक्सर दोनों एक साथ। उपहार सिनेमा हो या राजकोट गेमिंग ज़ोन — हर बार कोर्ट ने हस्तक्षेप किया, कुछ महीने सख़्ती चली, फिर सब पुराने ढर्रे पर लौट आया।

इस बार अगर सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ निर्देश देने पर नहीं रुकता बल्कि अनुपालन की मॉनिटरिंग के लिए कोई तंत्र बनाता है — जैसा उसने वायु प्रदूषण या वन संरक्षण में किया — तभी शायद फ़र्क़ पड़ेगा। वरना यह याचिका भी उसी लंबी सूची में जुड़ जाएगी जहाँ 'अच्छी नीयत, बुरा अमल' के तमाम उदाहरण पहले से सजे हैं।

अंत में एक असहज सच: भारत में आग से मरने वालों की बहुसंख्या ग़रीब तबक़े से आती है — वो लोग जो तंग, अनियमित, बिना सुरक्षा वाली इमारतों में रहने या काम करने को मजबूर हैं। फायर सेफ्टी का सवाल सिर्फ़ 'नियम बनाम लापरवाही' का नहीं — यह 'किसकी ज़िंदगी की क़ीमत कितनी' का सवाल है। और जब तक यह सवाल सिर्फ़ अदालत में उठता रहेगा, संसद में नहीं — तब तक जवाब हमेशा अधूरा रहेगा।

आँकड़ों में

  • NCRB के मुताबिक़ भारत में हर साल 17,000+ लोग आग से जान गँवाते हैं
  • भारत में 36 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश — हर एक के अपने अलग फायर सेफ्टी नियम
  • गृह मंत्रालय का मॉडल फायर सर्विसेज़ बिल 2012 से तैयार पर संसद में कभी पेश नहीं हुआ
  • नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) एक एडवाइज़री दस्तावेज़ है — राज्यों पर अपनाने की कोई बाध्यता नहीं

मुख्य बातें

  • भारत में 28 राज्य और 8 केंद्रशासित प्रदेश, सबके फायर सेफ्टी नियम अलग — नेशनल बिल्डिंग कोड सिर्फ़ एडवाइज़री है, बाध्यकारी नहीं।
  • NCRB के अनुसार हर साल 17,000+ लोग आग से मरते हैं — बहुसंख्या ग़रीब तबक़े से।
  • गृह मंत्रालय का मॉडल फायर सर्विसेज़ बिल 2012 से फ़ाइलों में धूल खा रहा है — किसी सरकार ने संसद में पेश नहीं किया।
  • याचिका का तर्क: अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) पूरे देश में समान है तो फायर सेफ्टी नियम भी समान होने चाहिए।
  • अगर कोर्ट नोटिस जारी करता है तो केंद्र-राज्य टकराव और रियल एस्टेट लॉबी की प्रतिक्रिया — दोनों अहम होंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में यूनिफॉर्म फायर सेफ्टी नियम क्यों नहीं हैं?

फायर सेफ्टी संविधान की राज्य सूची का विषय है, इसलिए हर राज्य अपने नियम बनाता है। नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) फायर सेफ्टी गाइडलाइन्स देता है, लेकिन यह सिर्फ़ एडवाइज़री है — राज्यों पर इसे अपनाने की क़ानूनी बाध्यता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में क्या माँग की गई है?

तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में माँग है कि केंद्र सरकार पूरे भारत में एक यूनिफॉर्म फायर सेफ्टी कोड बनाए और एक राष्ट्रीय फायर सर्विसेज़ एक्ट लाए, ताकि सभी राज्यों में एक समान मानक लागू हों।

भारत में हर साल आग से कितने लोग मरते हैं?

NCRB के आँकड़ों के अनुसार भारत में हर साल औसतन 17,000 से अधिक लोग आग की घटनाओं में जान गँवाते हैं, जिनमें बहुसंख्या आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े से होती है।

मॉडल फायर सर्विसेज़ बिल क्या है और यह क्यों नहीं बना?

2012 में गृह मंत्रालय ने एक मॉडल फायर सर्विसेज़ बिल का मसौदा तैयार कराया था, लेकिन राज्यों से संभावित टकराव और रियल एस्टेट सेक्टर की लॉबीइंग के कारण इसे किसी भी सरकार ने संसद में पेश नहीं किया।

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