जनरल धीरज सेठ — 31वें सेनाध्यक्ष की कुर्सी, LAC का बफ़र ज़ोन और अग्निपथ का सुलगता अंगारा — किस मोर्चे पर पहला दाँव चलेंगे?
जनरल धीरज सेठ ने 30 जून 2025 को भारत के 31वें सेनाध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया। इंडिया टुडे और द हिंदू के अनुसार वे मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री पृष्ठभूमि से आए हैं। उनके सामने LAC बफ़र ज़ोन, अग्निपथ, ड्रोन युद्ध और रक्षा बजट की चार बड़ी चुनौतियाँ हैं जो सेना के भविष्य की दिशा तय करेंगी।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: जनरल धीरज सेठ — भारतीय सेना के 31वें सेनाध्यक्ष, जिन्होंने जनरल उपेंद्र द्विवेदी का स्थान लिया (स्रोत: द हिंदू, NDTV)।
- क्या: जनरल सेठ ने भारतीय सेना प्रमुख (COAS) का पदभार सँभाला, साथ ही चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी भी उन्हें मिली (स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स)।
- कब: 30 जून 2025 को औपचारिक गार्ड ऑफ़ ऑनर के साथ पदभार ग्रहण (स्रोत: टेलंगाना टुडे, NDTV)।
- कहाँ: नई दिल्ली, साउथ ब्लॉक — सेना मुख्यालय (स्रोत: NDTV)।
- क्यों: जनरल उपेंद्र द्विवेदी की सेवानिवृत्ति के बाद सीनियॉरिटी सिद्धांत के तहत नियुक्ति (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- कैसे: सेवानिवृत्त होने वाले COAS से औपचारिक बैटन हैंडओवर और गार्ड ऑफ़ ऑनर के ज़रिए चार्ज लिया (स्रोत: NDTV, द हिंदू)।
एक आदमी कुर्सी पर बैठता है — और कुर्सी उसे चार तरफ़ से घेर लेती है। जनरल धीरज सेठ ने 30 जून 2025 को भारत के 31वें सेनाध्यक्ष का पदभार सँभाला, लेकिन जो गार्ड ऑफ़ ऑनर उन्हें साउथ ब्लॉक में मिला, वह सलामी कम और एक चेतावनी ज़्यादा थी। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार जनरल उपेंद्र द्विवेदी की सेवानिवृत्ति के बाद सेठ ने बैटन सँभाला। लेकिन इस बैटन के साथ जो फ़ाइलें आई हैं, वे भारतीय सेना के सबसे जटिल दौर की गवाह हैं।
सवाल सीधा है: जनरल सेठ कौन हैं, किस मिट्टी से आए हैं, और सबसे अहम — वे किस मोर्चे पर पहला दाँव चलेंगे?
कौन हैं जनरल धीरज सेठ — मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री का दांव
इंडिया टुडे और द हिंदू की रिपोर्ट्स के मुताबिक जनरल धीरज सेठ मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री बैकग्राउंड से आते हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार उनकी नियुक्ति में सीनियॉरिटी सिद्धांत का पालन किया गया — कोई सुपरसीशन नहीं हुई। यह बात छोटी लगती है, लेकिन इसकी सियासी गूँज गहरी है। मोदी सरकार के कार्यकाल में CDS जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति के वक़्त सुपरसीशन का मुद्दा उठा था — इस बार सरकार ने वह विवाद टाला।
मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री का मतलब समझिए: टैंक, बख़्तरबंद गाड़ियाँ, तेज़ गति से ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की क्षमता। यह वही शाखा है जो पश्चिमी रेगिस्तान में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ और लद्दाख़ की ऊँचाइयों पर चीन के सामने सबसे पहले तैनात होती है। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार सेठ ने चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (COSC) के चेयरमैन की ज़िम्मेदारी भी ली है — यानी तीनों सेनाओं के बीच तालमेल का बोझ भी उन्हीं के कंधों पर है।
मोर्चा एक: LAC पर बफ़र ज़ोन — अधूरी डील का ज़हर
2020 में गलवान घाटी में ख़ून बहा, उसके बाद से LAC पर भारत-चीन के बीच जो बफ़र ज़ोन बने हैं, वे शांति की गारंटी कम और विवाद को फ़्रीज़ करने का बंदोबस्त ज़्यादा हैं। कई रिपोर्ट्स के अनुसार डेपसांग और डेमचोक जैसे इलाक़ों में अभी भी पूर्ण वापसी नहीं हुई है। जनरल द्विवेदी के कार्यकाल में कुछ डिसइंगेजमेंट हुआ, लेकिन असल सवाल अनसुलझा रहा: क्या भारत ने ज़मीन गँवाई और उसे 'बफ़र' का नाम दे दिया?
जनरल सेठ के लिए यह सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील फ़ाइल है। अगर वे चीन के साथ और ढील देते हैं, तो विपक्ष "सरेंडर" का नारा लगाएगा। अगर सख़्ती करते हैं, तो सरकार की "शांति चाहिए" की बड़ी कूटनीतिक लाइन ख़तरे में आती है।
मोर्चा दो: अग्निपथ — सेना के भीतर का सुलगता अंगारा
अग्निपथ योजना को लेकर बाहर भले ही बहस थम गई हो, लेकिन सेना के भीतर एक ख़ामोश बेचैनी क़ायम है। सेना की रैंक फ़ाइल में यह सवाल घूम रहा है: चार साल में भर्ती होकर जाने वाला अग्निवीर क्या उसी तरह लड़ सकता है जैसे 15-17 साल की सर्विस वाला जवान? टेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के अनुसार सेठ ने पदभार ग्रहण करते हुए "सेना के आधुनिकीकरण" को प्राथमिकता बताया — लेकिन अग्निपथ पर सीधे कुछ नहीं कहा।
यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है। कोई भी सेनाध्यक्ष सरकार की फ़्लैगशिप स्कीम की खुली आलोचना नहीं कर सकता — लेकिन अगर मैदान में इस योजना से ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित होती है, तो उसकी ज़िम्मेदारी COAS की मेज़ पर ही आएगी।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में जो बात सबसे ज़्यादा चल रही है, वह यह: मोदी सरकार ने सीनियॉरिटी क्यों बचाई? कुछ रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस समय किसी भी विवाद से बचने की ज़रूरत थी — ख़ासतौर पर जब पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से ड्रोन की नई चुनौती बढ़ रही है और LAC पर चीन से बातचीत नाज़ुक दौर में है। इंडस्ट्री की बात यह है कि सेठ को "सेफ़ हैंड्स" माना जा रहा है — कोई ऐसा शख़्स जो नाव हिलाएगा नहीं, पर ज़रूरत पड़ी तो तूफ़ान में उसे संभाल सकता है। हालाँकि, यह भी फुसफुसाहट है कि CDS के पद पर अभी जो अनिश्चितता है, उसने COAS की भूमिका को और भारी बना दिया है — क्योंकि COSC की कमान भी सेठ के पास है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और रक्षा हलकों की अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
मोर्चा तीन: पश्चिमी सीमा पर ड्रोन — युद्ध का बदलता व्याकरण
पाकिस्तान की तरफ़ से ड्रोन के ज़रिए हथियार और नशीले पदार्थ गिराने की घटनाएँ पंजाब और राजस्थान बॉर्डर पर बढ़ी हैं। लेकिन असली चिंता यह है कि यूक्रेन-रूस युद्ध ने दुनिया को दिखा दिया — सस्ते ड्रोन महँगे टैंकों को तबाह कर सकते हैं। जनरल सेठ मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री के आदमी हैं — उन्हें ठीक उसी हथियार से जूझना है जो उनकी विशेषज्ञता को चुनौती देता है। एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी में भारतीय सेना अभी विकसित हो रही है, और यह दौड़ तेज़ करनी होगी।
मोर्चा चार: रक्षा बजट की कैंची — जेब ख़ाली, ज़रूरतें भारी
भारत का रक्षा बजट GDP के दो प्रतिशत से नीचे रहा है — जबकि चीन का सैन्य ख़र्च भारत से चार गुना से भी ज़्यादा है। नई तोपें, लड़ाकू विमान, और पनडुब्बियाँ — सब चाहिए, पर पैसा सीमित। जनरल सेठ को वित्त मंत्रालय से हर अतिरिक्त रुपया छीनना होगा, और साथ ही "मेक इन इंडिया" के तहत स्वदेशी हथियारों पर निर्भरता भी बढ़ानी होगी — जिनकी डिलीवरी अक्सर तय समय से पीछे चलती है।
इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि जनरल सेठ की असली परीक्षा किसी एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि इन चारों को एक साथ सँभालने में है। LAC पर कूटनीतिक संतुलन, अग्निपथ पर राजनीतिक चुप्पी के बावजूद ऑपरेशनल तैयारी, ड्रोन युग में पारंपरिक सेना का कायाकल्प, और बिना पर्याप्त बजट के यह सब करना — यही वह चतुर्भुज है जो 31वें सेनाध्यक्ष की विरासत तय करेगा।
आगे की राह — नज़र किस पर रखें
आने वाले तीन महीने निर्णायक होंगे। अगर जनरल सेठ LAC पर चीन के साथ कमांडर-स्तरीय बातचीत को आगे बढ़ाते हैं, तो समझिए कि सरकार की लाइन "शांति पहले" ज़ारी रहेगी। अगर अग्निपथ की शर्तों में कोई ट्वीक आता है — भले ही नाम बदले बिना — तो जानिए कि सेना ने भीतर से दबाव बनाया। और अगर एंटी-ड्रोन ख़रीद की कोई बड़ी डील सामने आती है, तो यह सेठ का पहला ठोस फ़ैसला होगा।
31वें सेनाध्यक्ष के पास वक़्त कम है — उनका कार्यकाल कब तक है, यह तो तारीख़ तय करेगी, लेकिन विरासत तारीख़ नहीं, फ़ैसले तय करते हैं। सवाल यह नहीं कि जनरल सेठ कितने दिन कुर्सी पर रहेंगे — सवाल यह है कि जब उठेंगे तो कुर्सी का वज़न बढ़ा होगा या घटा?
आँकड़ों में
- भारत का रक्षा बजट GDP के 2% से नीचे रहा है, जबकि चीन का सैन्य ख़र्च भारत से लगभग चार गुना अधिक है।
- जनरल धीरज सेठ भारतीय सेना के 31वें सेनाध्यक्ष हैं — सीनियॉरिटी सिद्धांत के आधार पर नियुक्त।
- 2020 गलवान संघर्ष के बाद बने बफ़र ज़ोन अभी पूरी तरह रिज़ॉल्व नहीं हुए हैं।
मुख्य बातें
- जनरल धीरज सेठ मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री बैकग्राउंड से हैं और सीनियॉरिटी के आधार पर 31वें सेनाध्यक्ष बने — कोई सुपरसीशन नहीं हुई।
- LAC पर चीन के साथ बफ़र ज़ोन की डील अधूरी है — डेपसांग-डेमचोक अभी भी अनसुलझे हैं, और यह सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील फ़ाइल है।
- अग्निपथ पर सेना के भीतर ख़ामोश बेचैनी जारी है — सेनाध्यक्ष खुलकर बोल नहीं सकते, लेकिन ऑपरेशनल असर उन्हीं की ज़िम्मेदारी होगी।
- ड्रोन युद्ध का बदलता स्वरूप मैकेनाइज़्ड फ़ोर्स के लिए सीधी चुनौती है — एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी में तेज़ निवेश ज़रूरी।
- रक्षा बजट GDP के 2% से नीचे है जबकि चीन का सैन्य ख़र्च भारत से चार गुना से अधिक — यह असमानता हर योजना पर भारी पड़ती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जनरल धीरज सेठ कौन हैं?
जनरल धीरज सेठ भारतीय सेना के 31वें सेनाध्यक्ष हैं। वे मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री पृष्ठभूमि से आते हैं और सीनियॉरिटी के आधार पर जनरल उपेंद्र द्विवेदी के बाद यह पद सँभाला (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया, द हिंदू)।
क्या जनरल सेठ की नियुक्ति में सुपरसीशन हुई?
नहीं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार सीनियॉरिटी सिद्धांत का पालन किया गया और कोई सुपरसीशन नहीं हुई।
31वें सेनाध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ कौन-सी हैं?
प्रमुख चुनौतियों में LAC पर चीन के साथ अधूरा बफ़र ज़ोन समझौता, अग्निपथ योजना को लेकर सेना के भीतर की चिंता, पश्चिमी सीमा पर ड्रोन ख़तरा और GDP के 2% से कम रक्षा बजट शामिल हैं।
जनरल सेठ ने COSC की ज़िम्मेदारी भी ली है — इसका क्या मतलब है?
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार जनरल सेठ चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (COSC) के चेयरमैन भी हैं, जिसका मतलब है कि तीनों सेनाओं — थल, वायु और नौसेना — के बीच तालमेल की ज़िम्मेदारी भी उन पर है।