मोदी, मेलोनी, ज़ेलेंस्की — ट्रंप 2.0 में जिसने भी हाथ मिलाया, उसी की कलाई मोड़ दी?

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में 'अमेरिका फर्स्ट' नीति ने सहयोगी देशों को सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाई है। भारत पर 26% टैरिफ़, इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी का सार्वजनिक अपमान, और यूक्रेन के ज़ेलेंस्की को धमकाने जैसी घटनाएँ बताती हैं कि ट्रंप की दोस्ती में कोई स्थायित्व नहीं — सिर्फ़ सौदा है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी।
  • क्या: ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल में अपने निकटतम सहयोगी नेताओं — मोदी, मेलोनी, ज़ेलेंस्की — से टैरिफ़, अपमानजनक व्यवहार और एकतरफ़ा शर्तों के ज़रिए रिश्ते बिगाड़े।
  • कब: जनवरी 2025 से जून 2025 तक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले छह महीनों में।
  • कहाँ: वाशिंगटन (व्हाइट हाउस), नई दिल्ली, रोम, कीव — वैश्विक कूटनीतिक मंच।
  • क्यों: 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत ट्रंप हर द्विपक्षीय रिश्ते को लेन-देन (ट्रांज़ैक्शनल) के रूप में देखते हैं — दोस्ती नहीं, सौदा; और सौदे में अमेरिकी शर्तें सर्वोपरि हैं।
  • कैसे: भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ़ लगाकर, मेलोनी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करके, ज़ेलेंस्की को सहायता बंद करने की धमकी देकर, और कनाडा के कार्नी को बातचीत से दूर रखकर।

जनवरी 2025। दुनिया भर के कई नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस वापसी पर राहत की साँस ली थी। नरेंद्र मोदी ने बधाई ट्वीट किया, जॉर्जिया मेलोनी को 'आइडियोलॉजिकल सोलमेट' माना गया, और वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को उम्मीद थी कि ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध ख़त्म करा देंगे। छह महीने बाद — इनमें से कोई भी रिश्ता वैसा नहीं है जैसा माना गया था। हर 'दोस्त' की कलाई एक बार मुड़ चुकी है।

सवाल सीधा है: जब ट्रंप अपने क़रीबी सहयोगियों के साथ ऐसा कर सकते हैं, तो 'दोस्ती' का मतलब क्या बचता है? और ख़ासतौर पर नई दिल्ली के लिए — यह कितना बड़ा अलर्ट है?

टैरिफ़ का हथौड़ा — मोदी की 'बड़े भाई' वाली दोस्ती पर पहला वार

ट्रंप और मोदी की केमिस्ट्री को पूरी दुनिया ने देखा था — 'हाउडी मोदी' से लेकर 'नमस्ते ट्रंप' तक। लेकिन दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ़ थोपा। Oneindia की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने भारतीय टैरिफ़ नीतियों को 'अनुचित' बताते हुए कहा कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर बहुत ज़्यादा शुल्क लगाता है। यह वही ट्रंप थे जिन्होंने पहले कार्यकाल में मोदी को 'मेरे दोस्त' कहा था।

26% की यह दर कोई मामूली संख्या नहीं है। भारत का अमेरिका को होने वाला निर्यात — ख़ासकर IT सेवाएँ, फ़ार्मा और टेक्सटाइल — इस टैरिफ़ से सीधे प्रभावित होता है। रॉयटर्स के अनुसार, भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार 2024 में 120 अरब डॉलर से ऊपर पहुँच चुका था, और टैरिफ़ बढ़ोतरी इस ट्रेजेक्टरी को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।

मोदी सरकार ने तुरंत बातचीत का रास्ता चुना — अमेरिकी रक्षा ख़रीद बढ़ाने और कुछ कृषि उत्पादों पर शुल्क घटाने के संकेत दिए। लेकिन ट्रंप का रवैया साफ़ था: पहले अमेरिकी शर्तें मानो, फिर बात करो।

मेलोनी — 'आइडियोलॉजिकल सोलमेट' का सार्वजनिक अपमान

जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप में ट्रंप की सबसे क़रीबी सहयोगी माना जाता था। दोनों राइट-विंग, दोनों 'राष्ट्र पहले' के पैरोकार। लेकिन Oneindia की रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप ने कथित तौर पर मेलोनी के साथ एक सार्वजनिक मंच पर अपमानजनक व्यवहार किया — उन्हें बीच में टोका, उनकी बातों को नज़रअंदाज़ किया, और यूरोपीय व्यापार नीतियों पर इटली को भी निशाना बनाया।

मेलोनी ने चुप रहना चुना — जो अपने आप में एक बयान है। एक ऐसी नेता जो अपने देश में दबंग राजनीति के लिए जानी जाती हैं, अगर ट्रंप के सामने ख़ामोश रहती हैं, तो इसका मतलब है कि शक्ति का असंतुलन कितना गहरा है। यूरोपीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, मेलोनी के भीतरी दायरे में इस घटना को लेकर गंभीर असंतोष बताया जाता है — कुछ सलाहकारों ने कथित रूप से सवाल उठाया कि क्या ट्रंप के साथ इतनी क़रीबी ज़रूरी है।

ज़ेलेंस्की — 'सहायता चाहिए तो शर्तें मानो'

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की हालत सबसे नाज़ुक है। ट्रंप ने उन्हें सीधे-सीधे कहा कि अगर रूस से बातचीत नहीं करोगे तो अमेरिकी सहायता बंद। Oneindia के अनुसार, ट्रंप ने ज़ेलेंस्की को 'ज़िद्दी' तक कहा और यूक्रेन के ख़िलाफ़ कई बार ऐसे बयान दिए जो रूस के नैरेटिव से मेल खाते दिखते हैं।

यह वही ज़ेलेंस्की हैं जिन्होंने ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत की थी। अमेरिकी सहायता पर निर्भरता का मतलब है कि ज़ेलेंस्की के पास ट्रंप को 'ना' कहने की विलासिता नहीं है — और ट्रंप इसे अच्छी तरह जानते हैं।

कनाडा के कार्नी, डेनमार्क का ग्रीनलैंड — कोई सुरक्षित नहीं

सूची यहीं ख़त्म नहीं होती। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी से ट्रंप ने टैरिफ़ युद्ध छेड़ा और बातचीत के दरवाज़े बंद रखे। डेनमार्क पर ग्रीनलैंड ख़रीदने का दबाव, पनामा नहर पर सवाल — ट्रंप 2.0 में कोई सहयोगी ऐसा नहीं है जिसे 'अमेरिका फर्स्ट' का थपेड़ा न लगा हो। Oneindia की टाइमलाइन इस पैटर्न को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।

पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे की असली बात

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि साउथ ब्लॉक में ट्रंप को लेकर एक 'प्लान बी' पर काम चल रहा है। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से ख़बर है कि भारत ट्रंप की हर 'दोस्ती' को अब एक 'ट्रांज़ैक्शन' मानकर चल रहा है — हर गर्मजोशी के पीछे एक बिल आएगा, यह मान लिया गया है। ट्रेड डिप्लोमेसी सर्कल्स में चर्चा है कि मोदी सरकार ने चुपचाप यूरोपीय यूनियन और जापान के साथ बैकचैनल बातचीत तेज़ कर दी है — ताकि अगर ट्रंप का हथौड़ा और ज़ोर से गिरे, तो वैकल्पिक व्यापार व रणनीतिक साझेदारियाँ तैयार हों।

(यह राजनीतिक हलकों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

असली पैटर्न — दोस्ती नहीं, डील

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि ट्रंप 2.0 में 'दोस्ती' शब्द ही ग़लत है — सही शब्द है 'डील'। और डील में भावना नहीं, लेन-देन चलता है। मोदी-ट्रंप, मेलोनी-ट्रंप, ज़ेलेंस्की-ट्रंप — हर रिश्ता एक ही फ़ॉर्मूले पर चलता है: अमेरिका को क्या मिलेगा? अगर जवाब 'पर्याप्त नहीं' है, तो दोस्त भी दुश्मन बन सकता है।

यह कोई नया पैटर्न नहीं है। पहले कार्यकाल में भी ट्रंप ने जर्मनी की मर्केल, फ़्रांस के मैक्रों और यहाँ तक कि ब्रिटेन के बोरिस जॉनसन को भी असहज किया था। लेकिन दूसरे कार्यकाल में फ़र्क़ यह है कि अब ट्रंप को दोबारा चुनाव नहीं लड़ना — उन्हें किसी की परवाह करने की ज़रूरत ही नहीं रही। यह 'अनचेन्ड ट्रंप' हैं — बिना किसी लगाम के।

नई दिल्ली के लिए अलर्ट — क्या तैयारी है?

भारत के लिए सबसे बड़ा सबक़ यह है: ट्रंप के साथ 'पर्सनल रैपो' पर्याप्त नहीं है। मोदी-ट्रंप की जो भी व्यक्तिगत केमिस्ट्री हो, जब 'अमेरिका फर्स्ट' का हिसाब-किताब खुलता है, तो हर देश एक एंट्री है बैलेंस शीट में — दोस्त नहीं। 26% टैरिफ़ इसका सबूत है।

आने वाले महीनों में तीन चीज़ें देखने लायक़ हैं। पहला — क्या भारत H-1B वीज़ा और रक्षा ख़रीद पर ट्रंप की शर्तें मानता है या कोई बीच का रास्ता निकालता है। दूसरा — क्या मेलोनी जैसे यूरोपीय नेता ट्रंप से नाराज़ होकर भारत के क़रीब आते हैं, जिससे एक नया कूटनीतिक गठबंधन बने। और तीसरा — क्या ट्रंप का 'अनचेन्ड' व्यवहार अमेरिका के भीतर ही राजनीतिक दबाव पैदा करता है जो उनकी विदेश नीति को नरम करे।

एक बात तय है — ट्रंप 2.0 में किसी भी देश के लिए 'दोस्ती' एक स्थायी स्थिति नहीं है। यह एक रोज़ाना नवीनीकृत होने वाला कॉन्ट्रैक्ट है जिसमें शर्तें सिर्फ़ एक पक्ष तय करता है। मोदी से लेकर मेलोनी तक — सबने यह सबक़ सीखा है। सवाल बस इतना है: क्या नई दिल्ली इस सबक़ को सिर्फ़ समझ रही है, या उस पर अमल भी कर रही है?

आँकड़ों में

  • भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ़ — ट्रंप 2.0 का सबसे ठोस आर्थिक दबाव।
  • भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार 2024 में 120 अरब डॉलर से ऊपर (रॉयटर्स के अनुसार)।
  • ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले 6 महीनों में कम से कम 5 प्रमुख सहयोगी देशों से रिश्ते बिगड़े।

मुख्य बातें

  • ट्रंप 2.0 में भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ़ लगा — यह 'दोस्ती' के बावजूद सबसे बड़ा आर्थिक वार है।
  • मेलोनी को 'आइडियोलॉजिकल सोलमेट' माना गया था, लेकिन ट्रंप ने कथित तौर पर सार्वजनिक मंच पर उन्हें अपमानित किया — यूरोप में इस पर गंभीर असंतोष बताया जाता है।
  • ज़ेलेंस्की, कार्नी, डेनमार्क — कोई सहयोगी 'अमेरिका फर्स्ट' की मार से बचा नहीं है।
  • ट्रंप का दूसरा कार्यकाल 'अनचेन्ड' है — दोबारा चुनाव की चिंता नहीं, इसलिए कूटनीतिक शिष्टाचार की परवाह भी नहीं।
  • नई दिल्ली के लिए अलर्ट: व्यक्तिगत केमिस्ट्री पर भरोसा ख़तरनाक है, संस्थागत और बहुपक्षीय तैयारी ज़रूरी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ट्रंप ने मोदी से रिश्ते क्यों बिगाड़े?

ट्रंप ने भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ़ लगाया, भारतीय शुल्क नीतियों को 'अनुचित' बताया। 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत हर रिश्ते को लेन-देन की तरह देखा जा रहा है, व्यक्तिगत दोस्ती को कोई छूट नहीं।

ट्रंप और मेलोनी के बीच क्या हुआ?

मेलोनी को ट्रंप की सबसे क़रीबी यूरोपीय सहयोगी माना जाता था, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रंप ने कथित तौर पर सार्वजनिक मंच पर उन्हें अपमानित किया — बीच में टोका, बातों को नज़रअंदाज़ किया और यूरोपीय व्यापार नीतियों पर इटली को भी निशाना बनाया।

क्या ट्रंप 2.0 में कोई सहयोगी सुरक्षित है?

मौजूदा पैटर्न के हिसाब से कोई सहयोगी सुरक्षित नहीं दिखता। मोदी, मेलोनी, ज़ेलेंस्की, कार्नी, डेनमार्क — सब पर 'अमेरिका फर्स्ट' का दबाव है। ट्रंप को दोबारा चुनाव नहीं लड़ना, इसलिए कूटनीतिक संयम की ज़रूरत नहीं।

भारत ट्रंप के रवैये से निपटने के लिए क्या कर रहा है?

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भारत ने EU और जापान के साथ बैकचैनल बातचीत तेज़ की है। रक्षा ख़रीद बढ़ाने और कुछ कृषि शुल्क घटाने के संकेत भी दिए गए हैं, लेकिन ट्रंप की शर्तें पूरी तरह मानने को भारत तैयार नहीं दिखता।

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