पासपोर्ट की लाइन, संसद की समिति, सरकार का 'सब ठीक है' — हिंदी बेल्ट का आवेदक कब तक इंतज़ार करे?
भारत की संसदीय विदेश मामलों की समिति (External Affairs Committee) ने पासपोर्ट सेवाओं में देरी, शिकायतों और केंद्रों की हालत पर सरकार से गंभीर सवाल पूछे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, हिंदी बेल्ट के राज्यों में पासपोर्ट जारी होने में नियत समय से कहीं ज़्यादा वक़्त लग रहा है, जबकि सरकार का दावा है कि डिजिटलीकरण से सुधार हुआ है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति (External Affairs Committee) और विदेश मंत्रालय
- क्या: पासपोर्ट सेवा केंद्रों में देरी, शिकायतों और सिस्टम की ख़ामियों की जाँच
- कब: 2026 में समिति की ताज़ा बैठकों में यह मुद्दा उठाया गया
- कहाँ: भारत भर के पासपोर्ट सेवा केंद्र, ख़ासकर हिंदी बेल्ट — उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान
- क्यों: बड़ी संख्या में आवेदकों की शिकायतें — अपॉइंटमेंट में महीनों की देरी, पुलिस वेरिफ़िकेशन में अटकाव, और तत्काल सेवा में भी लंबा इंतज़ार
- कैसे: समिति ने विदेश मंत्रालय और पासपोर्ट सेवा अधिकारियों को बुलाकर सवाल-जवाब किए और सुधार की सिफ़ारिशों पर विचार किया
लखनऊ के एक पासपोर्ट सेवा केंद्र के बाहर सुबह छह बजे की लाइन — बूढ़ी माँ बेटे का हाथ पकड़े खड़ी है, बेटा पहली बार विदेश जाने वाला है, और दोनों के चेहरे पर एक ही डर: आज भी नंबर लगेगा या नहीं। यह दृश्य सिर्फ़ लखनऊ का नहीं, पटना, भोपाल, जयपुर और रांची का भी है। भारत की संसदीय विदेश मामलों की समिति (External Affairs Committee) ने हाल ही में इसी दर्द को संसद के भीतर ला खड़ा किया है — पासपोर्ट सेवाओं में देरी, शिकायतों की बाढ़ और सिस्टम की ख़ामियों पर सरकार से सीधे जवाब माँगे हैं।
लेकिन असली सवाल वह नहीं है जो समिति के एजेंडे में लिखा है। असली सवाल यह है: क्या यह जाँच सच में कोई सिस्टम बदलेगी, या यह एक और 'बैठक-रिपोर्ट-दराज़' का सिलसिला है जिसमें हिंदी बेल्ट का आम आवेदक फिर से ठगा महसूस करे?
समिति ने क्या पूछा — और सरकार क्या बोल रही है?
रिपोर्ट्स के अनुसार, External Affairs Committee ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से कई तीखे सवाल किए। मसलन — पासपोर्ट जारी करने की औसत समय-सीमा 30 दिन बताई जाती है, तो ज़मीन पर 60-90 दिन क्यों लग रहे हैं? तत्काल पासपोर्ट जो तीन दिन में मिलना चाहिए, वह हफ़्तों में क्यों आता है? पुलिस वेरिफ़िकेशन में कहाँ और क्यों अड़चन है?
सरकार की ओर से जवाब वही रटा-रटाया ढर्रा है — डिजिटलीकरण हुआ है, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट सिस्टम है, पासपोर्ट सेवा केंद्रों (PSK) की संख्या बढ़ाई गई है, और 'सब ठीक है'। विदेश मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, भारत में अब 500 से ज़्यादा पासपोर्ट सेवा केंद्र और पोस्ट ऑफ़िस पासपोर्ट सेवा केंद्र (POPSK) हैं। लेकिन आँकड़ों और हक़ीक़त के बीच की खाई वही है जो हिंदी बेल्ट के आवेदक हर सुबह लाइन में खड़े होकर महसूस करते हैं।
हिंदी बेल्ट का पासपोर्ट संकट — आँकड़ों से परे
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान — ये वे राज्य हैं जहाँ पासपोर्ट की माँग सबसे तेज़ी से बढ़ी है। द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन राज्यों में ऑनलाइन अपॉइंटमेंट स्लॉट हफ़्तों-महीनों पहले भर जाते हैं। बिहार में कई ज़िलों में एक ही PSK है जो पाँच-छह ज़िलों की आबादी को सर्व करता है। नतीजा — एक सामान्य पासपोर्ट के लिए आवेदक को पहले अपॉइंटमेंट मिलने में 30-45 दिन, फिर पुलिस वेरिफ़िकेशन में 15-30 दिन और फिर जारी होने में और 15 दिन — कुल मिलाकर दो-तीन महीने।
और यह सब 'सामान्य' स्थिति में। अगर पुलिस वेरिफ़िकेशन में कोई 'अड़चन' आ गई — मसलन पता ग़लत दर्ज हुआ, या थाने में फ़ाइल रुक गई — तो छह महीने भी लग जाते हैं। PTI की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में पासपोर्ट संबंधी शिकायतों में तक़रीबन 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई, जिसमें सबसे ज़्यादा शिकायतें उत्तर प्रदेश और बिहार से आईं।
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पॉलिटिकल पल्स — समिति की जाँच के पीछे कौन-सी गणित है?
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि संसदीय समिति की इस सक्रियता के पीछे सिर्फ़ 'जनसेवा' का जज़्बा नहीं है। पासपोर्ट देरी का मुद्दा हिंदी बेल्ट में एक ऐसा दर्द बिंदु बन गया है जो सीधे मध्यवर्गीय वोटर को छूता है — वही वोटर जो विदेश में नौकरी, पढ़ाई या तीर्थयात्रा के लिए पासपोर्ट बनवा रहा है। विपक्षी सांसदों ने इसे 'सरकारी अकर्मण्यता' का प्रतीक बनाने की कोशिश की है, जबकि सत्तापक्ष इसे 'रिकॉर्ड डिजिटलीकरण' की सफलता कहानी के रूप में पेश करता है।
लेकिन ट्रेड हलकों में चर्चा यह भी है कि TCS जैसी निजी कंपनियों को पासपोर्ट सेवा का ठेका दिए जाने के बावजूद ज़मीनी अनुभव नहीं बदला। समिति के कुछ सदस्यों ने — जो ख़ुद हिंदी बेल्ट के सांसद हैं — अपने क्षेत्र के आवेदकों की शिकायतें बैठक में रखीं। यह वह दबाव है जो चुनावी ज़मीन से आता है, न कि नीति-निर्माण की किसी ऊँची बहस से।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
क्या संसदीय समितियाँ सच में कुछ बदलती हैं?
यहीं इंडिया हेराल्ड का सबसे साफ़ पॉलिटिकल रीड यह है — भारत में संसदीय समितियों की सिफ़ारिशें क़ानूनन बाध्यकारी नहीं हैं। सरकार उन्हें 'नोट' करती है, कभी-कभी 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' दाख़िल करती है, और अक्सर वही सिफ़ारिशें अगली समिति को फिर से दोहरानी पड़ती हैं। PRS Legislative Research के आँकड़ों के अनुसार, संसदीय समितियों की सिफ़ारिशों को पूरी तरह लागू करने की दर ऐतिहासिक रूप से 30-40 प्रतिशत के आसपास रही है। बाक़ी सिफ़ारिशें या तो 'विचाराधीन' रहती हैं या आंशिक रूप से लागू होती हैं।
तो फिर यह जाँच किसके लिए है? सीधा जवाब — यह एक दबाव तंत्र है। समिति की बैठक, मीडिया कवरेज और सवाल-जवाब का रिकॉर्ड सरकार पर एक सार्वजनिक दबाव बनाता है। अगर अगले छह महीने में कोई ठोस सुधार — जैसे PSK की संख्या बढ़ाना, पुलिस वेरिफ़िकेशन का डिजिटलीकरण, या शिकायत निवारण की समय-सीमा तय करना — नहीं दिखता, तो यह जाँच बस एक और संसदीय नाटक बनकर रह जाएगी।
आगे क्या देखें — पासपोर्ट सुधार कहाँ अटका है?
अगर ज़मीन पर कुछ बदलना है, तो तीन चीज़ें बदलनी होंगी। पहली — पुलिस वेरिफ़िकेशन। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो अभी भी काफ़ी हद तक मैन्युअल है, राज्य पुलिस पर निर्भर है, और जहाँ केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण सीमित है। दूसरी — PSK और POPSK का विस्तार। हिंदी बेल्ट में प्रति केंद्र आवेदकों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है। जब तक यह अनुपात नहीं सुधरता, अपॉइंटमेंट की भीड़ कम नहीं होगी। तीसरी — शिकायत निवारण में जवाबदेही। अभी कोई बाध्यकारी समय-सीमा नहीं है कि शिकायत दर्ज होने के कितने दिन में उसका समाधान होगा।
समिति अगर इन तीनों बिंदुओं पर ठोस, समयबद्ध सिफ़ारिशें देती है और उनकी अनुपालन रिपोर्ट सार्वजनिक करती है, तो शायद कुछ हिले। वरना, अगली बार जब कोई बिहार या यूपी का नौजवान पासपोर्ट के लिए सुबह चार बजे लाइन में खड़ा होगा, उसे न समिति याद होगी, न सिफ़ारिश — बस वही इंतज़ार।
आँकड़ों में
- 2024-25 में पासपोर्ट संबंधी शिकायतों में तक़रीबन 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी — सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार से (PTI)
- भारत में 500+ पासपोर्ट सेवा केंद्र और POPSK हैं, फिर भी हिंदी बेल्ट में प्रति केंद्र आवेदक अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफ़ी ज़्यादा (विदेश मंत्रालय)
- संसदीय समितियों की सिफ़ारिशों का पूर्ण अनुपालन दर — लगभग 30-40 प्रतिशत (PRS Legislative Research)
मुख्य बातें
- भारत की संसदीय विदेश मामलों की समिति ने पासपोर्ट सेवाओं में देरी और शिकायतों पर सरकार से गंभीर सवाल पूछे हैं, लेकिन समिति की सिफ़ारिशें क़ानूनन बाध्यकारी नहीं हैं।
- हिंदी बेल्ट — ख़ासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश — में पासपोर्ट जारी होने में सामान्य 30 दिन की जगह 60-90 दिन या उससे ज़्यादा लग रहे हैं।
- पुलिस वेरिफ़िकेशन का मैन्युअल होना, PSK प्रति आवेदक अनुपात का बिगड़ा होना, और शिकायत निवारण में बाध्यकारी समय-सीमा का अभाव — ये तीन मूल अड़चनें हैं।
- PRS Legislative Research के अनुसार, संसदीय समितियों की सिफ़ारिशों के पूर्ण अनुपालन की दर ऐतिहासिक रूप से 30-40 प्रतिशत के आसपास रही है।
- यह मुद्दा सिर्फ़ प्रशासनिक नहीं, चुनावी भी है — हिंदी बेल्ट का मध्यवर्गीय वोटर पासपोर्ट देरी को सरकारी अकर्मण्यता का प्रतीक मान रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत में पासपोर्ट बनने में कितना समय लगता है?
सरकारी मानक के अनुसार सामान्य पासपोर्ट 30 दिन में और तत्काल पासपोर्ट 1-3 दिन में जारी होना चाहिए। लेकिन हिंदी बेल्ट के कई राज्यों में अपॉइंटमेंट और पुलिस वेरिफ़िकेशन मिलाकर 60-90 दिन या उससे ज़्यादा लग रहे हैं।
संसदीय समिति की सिफ़ारिशें क्या बाध्यकारी होती हैं?
नहीं, भारत में संसदीय समितियों की सिफ़ारिशें क़ानूनन बाध्यकारी नहीं हैं। सरकार उन पर 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' देती है, लेकिन पूर्ण अनुपालन की दर ऐतिहासिक रूप से 30-40 प्रतिशत के आसपास रही है।
पासपोर्ट में देरी की सबसे बड़ी वजह क्या है?
पुलिस वेरिफ़िकेशन की मैन्युअल और राज्य-स्तरीय प्रक्रिया सबसे बड़ी अड़चन है। इसके अलावा हिंदी बेल्ट में PSK की संख्या आबादी के अनुपात में कम होना और अपॉइंटमेंट स्लॉट जल्दी भर जाना प्रमुख कारण हैं।
पासपोर्ट शिकायत कहाँ दर्ज करें?
पासपोर्ट सेवा की आधिकारिक वेबसाइट (passportindia.gov.in) पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं, या CPGrams पोर्टल पर भी शिकायत की जा सकती है। इसके अलावा संबंधित सांसद के ज़रिए भी मामला उठाया जा सकता है।