टोल अरबों का, सेफ़्टी बजट पैसों का — NHAI के एक्सप्रेसवे 'किलर हाइवे' क्यों बन रहे हैं, ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
NHAI एक्सप्रेसवे पर बढ़ती मौतों की जड़ टोल राजस्व और सुरक्षा ख़र्च के बीच का भारी असंतुलन है। News18 के अनुसार एक्सप्रेसवे हादसे लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि सेफ़्टी ऑडिट, क्रैश बैरियर और इमरजेंसी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश नगण्य है — ठेकेदारों की शॉर्टकट इंजीनियरिंग और जवाबदेही की कमी इसे और घातक बना रही है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: NHAI (नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया), केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय, एक्सप्रेसवे ठेकेदार कंपनियाँ और यूपी-एमपी-राजस्थान सहित हिंदी बेल्ट के करोड़ों ड्राइवर
- क्या: एक्सप्रेसवे पर लगातार बढ़ रही दुर्घटनाओं और मौतों ने सेफ़्टी रिफ़ॉर्म की माँग तेज़ कर दी है — News18 की रिपोर्ट के अनुसार ये हादसे अब राष्ट्रीय चिंता का विषय हैं
- कब: 2025-26 में लगातार बड़े हादसों के बाद यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय बहस में आया है
- कहाँ: आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे सहित देशभर के प्रमुख एक्सप्रेसवे
- क्यों: सेफ़्टी ऑडिट की अनदेखी, क्रैश बैरियर और साइनेज की कमी, शॉर्टकट इंजीनियरिंग, और टोल राजस्व का सुरक्षा में पुनर्निवेश न होना — News18 के अनुसार
- कैसे: ठेकेदारों की लागत कटौती, NHAI की सेफ़्टी ऑडिट रिपोर्ट्स पर कार्रवाई न होना, और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी — ये तीन कड़ियाँ मिलकर एक्सप्रेसवे को किलर हाइवे बनाती हैं
एक चमचमाता छह लेन का एक्सप्रेसवे। स्पीड लिमिट का बोर्ड — जहाँ है वहाँ धुँधला, जहाँ ज़रूरत है वहाँ ग़ायब। बीच में मीडियन पर क्रैश बैरियर की जगह सिर्फ़ एक पतली पट्टी। और सड़क के किनारे फूल-मालाएँ — किसी ने यहाँ अपना कोई खोया है। यह दृश्य अब भारत के हर बड़े एक्सप्रेसवे पर आम हो गया है। News18 की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, देश के एक्सप्रेसवे पर सड़क दुर्घटनाओं और मौतों में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है, और सेफ़्टी रिफ़ॉर्म्स की माँग अब चरम पर पहुँच गई है।
लेकिन असली सवाल वह है जो कोई नहीं पूछ रहा: अगर ये एक्सप्रेसवे हर साल हज़ारों करोड़ का टोल वसूलते हैं, तो वह पैसा जाता कहाँ है? सेफ़्टी पर क्यों नहीं?
अरबों का टोल, पैसों की सेफ़्टी — नंबर जो शर्मिंदा करते हैं
NHAI का सालाना टोल रेवेन्यू अब ₹40,000 करोड़ के पार पहुँच चुका है — सड़क परिवहन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार यह रक़म हर साल बढ़ रही है। लेकिन News18 की रिपोर्ट में उजागर हुआ है कि सड़क सुरक्षा — क्रैश बैरियर, इमरजेंसी रिस्पॉन्स, साइनेज, लाइटिंग — पर ख़र्च का अनुपात इस टोल राजस्व की तुलना में बेहद कम है। यमुना एक्सप्रेसवे और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे जैसे हिंदी बेल्ट के सबसे व्यस्त रूटों पर यह अंतर सबसे क्रूर है — टोल बूथ पर क़तार लंबी, लेकिन अगले 50 किलोमीटर में एक भी काम करता हुआ इमरजेंसी फ़ोन बूथ नहीं।
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सड़क दुर्घटनाओं में हर साल लगभग 1.7 लाख लोगों की जान जाती है — और इसमें एक्सप्रेसवे का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। ये वे सड़कें हैं जो सबसे 'सुरक्षित' होने का दावा करती हैं।
शॉर्टकट इंजीनियरिंग — ठेकेदार कहाँ बचाता है, ड्राइवर कहाँ मरता है
News18 की रिपोर्ट इस पहलू को सीधे छूती है: एक्सप्रेसवे निर्माण में ठेकेदारों की शॉर्टकट इंजीनियरिंग एक बड़ी वजह है। मीडियन बैरियर की जगह सस्ती वायर रोप, रंबल स्ट्रिप्स जो महीनों में घिस जाती हैं, और ड्रेनेज सिस्टम जो पहली बारिश में फ़ेल हो जाते हैं — ये सब लागत बचाने के 'जुगाड़' हैं जो जान लेते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा समिति ने पहले भी इन ख़ामियों पर चिंता जताई है। लेकिन ज़मीन पर बदलाव नगण्य है। कारण? ठेकेदार और NHAI के बीच का रिश्ता एक बंद दरवाज़े की बातचीत है — सेफ़्टी ऑडिट होती हैं, रिपोर्ट बनती हैं, लेकिन वे 'गोपनीय' फ़ाइलों में दफ़न हो जाती हैं।
इंडिया हेराल्ड ने इसी पैटर्न को दिल्ली की वसंत कुंज-महिपालपुर टनल के संदर्भ में भी रेखांकित किया था — जहाँ इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में 'क्रेडिट की जंग' सेफ़्टी प्लानिंग पर भारी पड़ती है।
पॉलिटिकल पल्स — सड़कों का उद्घाटन वोट लाता है, मौतों की गिनती नहीं
यहाँ वह कोण है जो प्रेस रिलीज़ में नहीं मिलेगा। सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि एक्सप्रेसवे का उद्घाटन — फ़ीता काटना, ड्रोन शॉट, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की तस्वीर — चुनावी गणित का हिस्सा है। लेकिन उद्घाटन के बाद उसी सड़क पर होने वाली मौतों की ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेता। यूपी का आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे इसका सबसे कड़वा उदाहरण है — इसके उद्घाटन को ज़बरदस्त राजनीतिक क्रेडिट मिला, लेकिन इस पर होने वाली सैकड़ों मौतों पर कोई राजनीतिक जवाबदेही नहीं।
ट्रेड विश्लेषकों का कहना है कि NHAI के भीतर एक अलिखित नियम है — सेफ़्टी ऑडिट रिपोर्ट्स को सार्वजनिक न करो, क्योंकि इससे प्रोजेक्ट की 'इमेज' ख़राब होती है। जनता की नब्ज़ भी यही कहती है — हिंदी बेल्ट के ड्राइवर्स एक्सप्रेसवे को 'जुआ' मानने लगे हैं, जहाँ स्पीड तो मिलती है लेकिन सुरक्षा का कोई भरोसा नहीं।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
सुप्रीम कोर्ट और संसद — आगे क्या हो सकता है?
जो कोण बाकी मीडिया से छूट गया, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है — यह मसला अब सिर्फ़ इंजीनियरिंग की खामी का नहीं रहा, यह एक राजनीतिक और संवैधानिक सवाल बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा समिति पहले ही सक्रिय है, और News18 की रिपोर्ट के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान ले सकता है।
संसद में भी संभावना है — विपक्ष के लिए यह एक तैयार हथियार है। अगर 2026 के मानसून सत्र में कोई संसदीय समिति NHAI की सेफ़्टी ऑडिट रिपोर्ट्स को सार्वजनिक करने की माँग करती है, तो सरकार के लिए यह असुविधाजनक होगा — क्योंकि हर सत्तारूढ़ सरकार ने एक्सप्रेसवे का क्रेडिट लिया है, लेकिन मौतों की ज़िम्मेदारी से बचती रही है। यह दोनों पक्षों के लिए असहज सत्य है।
आगे देखने लायक़ बात यह है: अगर सुप्रीम कोर्ट NHAI को सेफ़्टी ऑडिट रिपोर्ट्स सार्वजनिक करने का आदेश देता है — जैसा कि पर्यावरणीय मामलों में हो चुका है — तो यह भारतीय सड़क सुरक्षा का वॉटरशेड मोमेंट होगा। ठेकेदारों की जवाबदेही, टोल रेवेन्यू में सेफ़्टी का अनिवार्य हिस्सा, और हर एक्सप्रेसवे पर इमरजेंसी रिस्पॉन्स का न्यूनतम मानक — ये तीन माँगें अब टालने लायक़ नहीं रहीं।
हिंदी बेल्ट का ड्राइवर — सबसे ज़्यादा टोल, सबसे कम सुरक्षा
यूपी, मध्य प्रदेश और राजस्थान — भारत के सबसे अधिक एक्सप्रेसवे इसी बेल्ट में हैं। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे — इन सब पर हिंदी बेल्ट का मध्यमवर्गीय परिवार सबसे ज़्यादा सफ़र करता है। और सबसे ज़्यादा जोखिम उठाता है।
News18 की रिपोर्ट बताती है कि इन एक्सप्रेसवे पर एम्बुलेंस का औसत रिस्पॉन्स टाइम अंतरराष्ट्रीय मानकों से कहीं अधिक है। जहाँ विकसित देशों में यह 8-10 मिनट है, वहाँ भारतीय एक्सप्रेसवे पर 30-45 मिनट लग सकते हैं — और इस अंतर में ही ज़िंदगी और मौत का फ़ैसला हो जाता है।
एक्सप्रेसवे इंजीनियरिंग विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या का समाधान असंभव नहीं है — टोल राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत (कम से कम 5-7%) सेफ़्टी इन्फ्रास्ट्रक्चर में अनिवार्य करना, सेफ़्टी ऑडिट को थर्ड-पार्टी और सार्वजनिक बनाना, और हर 25 किलोमीटर पर फ़ंक्शनल इमरजेंसी रिस्पॉन्स यूनिट स्थापित करना। ये क़दम तकनीकी रूप से सीधे हैं — कमी सिर्फ़ इच्छाशक्ति की है।
आँकड़ों में
- NHAI का सालाना टोल राजस्व ₹40,000 करोड़ से अधिक — सड़क परिवहन मंत्रालय
- भारत में सड़क दुर्घटनाओं में सालाना लगभग 1.7 लाख मौतें — केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय
- भारतीय एक्सप्रेसवे पर एम्बुलेंस रिस्पॉन्स टाइम 30-45 मिनट बनाम अंतरराष्ट्रीय मानक 8-10 मिनट — News18
मुख्य बातें
- NHAI का सालाना टोल रेवेन्यू ₹40,000 करोड़ से अधिक है, लेकिन सेफ़्टी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ख़र्च का अनुपात बेहद कम — News18 व मंत्रालय रिपोर्ट के अनुसार
- एक्सप्रेसवे पर एम्बुलेंस रिस्पॉन्स टाइम 30-45 मिनट तक — अंतरराष्ट्रीय मानक 8-10 मिनट, यही अंतर जान ले रहा है
- सेफ़्टी ऑडिट रिपोर्ट्स 'गोपनीय' फ़ाइलों में दबी हैं — सार्वजनिक नहीं होतीं, ठेकेदारों की जवाबदेही शून्य
- आगे सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान या संसदीय समिति की माँग दोनों संभव — सेफ़्टी ऑडिट सार्वजनिक करने का आदेश वॉटरशेड मोमेंट होगा
- टोल राजस्व का 5-7% सेफ़्टी में अनिवार्य करना और हर 25 किमी पर इमरजेंसी यूनिट — तकनीकी रूप से सीधा, कमी इच्छाशक्ति की
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
NHAI एक्सप्रेसवे पर इतनी दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं?
News18 और मंत्रालय रिपोर्ट्स के अनुसार प्रमुख कारण हैं — क्रैश बैरियर की कमी, ठेकेदारों की शॉर्टकट इंजीनियरिंग, सेफ़्टी ऑडिट पर कार्रवाई न होना, इमरजेंसी रिस्पॉन्स का खराब ढाँचा, और टोल राजस्व का सुरक्षा में पुनर्निवेश न होना।
टोल से मिलने वाला पैसा सेफ़्टी पर क्यों नहीं ख़र्च होता?
NHAI का सालाना टोल राजस्व ₹40,000 करोड़ से अधिक है, लेकिन सेफ़्टी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ख़र्च का अनुपात बहुत कम है। विशेषज्ञों का कहना है कि टोल का 5-7% सेफ़्टी में अनिवार्य होना चाहिए, लेकिन ऐसा कोई बाध्यकारी नियम फ़िलहाल नहीं है।
क्या सुप्रीम कोर्ट एक्सप्रेसवे सेफ़्टी पर कार्रवाई कर सकता है?
हाँ — सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा समिति पहले से सक्रिय है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोर्ट NHAI को सेफ़्टी ऑडिट रिपोर्ट्स सार्वजनिक करने का आदेश दे सकता है, जो एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
हिंदी बेल्ट के कौन-से एक्सप्रेसवे सबसे ख़तरनाक हैं?
यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे — ये सब हादसों के लिए बदनाम हैं। News18 की रिपोर्ट इन पर बढ़ती दुर्घटनाओं को रेखांकित करती है।