एक 'बैंड' ने रोकी पूरी कार्यवाही — गुजरात HC में लॉ इंटर्न की वो 'गलती' जो लाखों कानून के छात्रों के ज़ख्म पर नमक है
गुजरात हाईकोर्ट में एक लॉ इंटर्न ने एडवोकेट्स का काला बैंड पहनकर पेशी में हिस्सा लिया, जिस पर जज ने तुरंत कार्यवाही रोक दी और बार काउंसिल के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि बिना एनरोलमेंट के बैंड पहनना अनधिकृत है — यह घटना लाखों लॉ स्टूडेंट्स की व्यवस्थागत उपेक्षा का प्रतीक बन गई है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: गुजरात हाईकोर्ट के एक जज और एक लॉ इंटर्न — नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार
- क्या: इंटर्न ने एडवोकेट्स का काला बैंड (नेक बैंड) पहनकर कोर्ट में पेशी में भाग लिया, जिस पर जज ने कार्यवाही रोक दी और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का उल्लेख किया
- कब: जून 2025 — नवभारत टाइम्स रिपोर्ट के अनुसार
- कहाँ: गुजरात हाईकोर्ट, अहमदाबाद
- क्यों: बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के तहत केवल एनरोल्ड एडवोकेट ही काला बैंड पहन सकते हैं, इंटर्न या लॉ स्टूडेंट को इसकी अनुमति नहीं है
- कैसे: जज ने कोर्टरूम में इंटर्न को बैंड पहने देखा, पूछताछ की, और नियमों का हवाला देकर कार्यवाही तब तक के लिए रोक दी — नवभारत टाइम्स के अनुसार
एक काले कपड़े की पट्टी — जिसे एडवोकेट बैंड कहते हैं — की कीमत बाज़ार में मुश्किल से पचास रुपये। लेकिन गुजरात हाईकोर्ट में इसी पट्टी ने एक दिन की पूरी कार्यवाही रोक दी, एक लॉ इंटर्न को सबके सामने टोका गया, और देश के लाखों कानून के छात्रों के बीच वह पुराना सवाल फिर ज़िंदा हो गया — क्या भारतीय कोर्टरूम में 'कौन अंदर आ सकता है' यह योग्यता से तय होता है, या एक ड्रेस कोड की हैसियत से?
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, गुजरात हाईकोर्ट में हाल ही में एक लॉ इंटर्न ने एडवोकेट्स का काला नेक बैंड पहनकर कोर्टरूम में पेशी में हिस्सा लिया। प्रिसाइडिंग जज ने जैसे ही यह देखा, उन्होंने कार्यवाही रोक दी और स्पष्ट किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों के तहत यह बैंड सिर्फ़ एनरोल्ड एडवोकेट्स का अधिकार है — कोई इंटर्न या लॉ स्टूडेंट इसे नहीं पहन सकता। जज ने इसे कोर्ट की गरिमा और प्रोफ़ेशनल आचार संहिता का मामला बताया।
सुनने में यह छोटी सी बात लगती है — एक छात्र ने ग़लती से या उत्साह में बैंड पहन लिया। लेकिन इस एक घटना के पीछे वह पूरा ढाँचा छिपा है जो भारत के क़रीब 16 लाख लॉ स्टूडेंट्स (बार काउंसिल ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर दर्ज आँकड़ों के अनुसार देश में 1,700 से अधिक लॉ कॉलेज हैं) को सालों तक 'बाहरी' बनाए रखता है।
बैंड — सम्मान का प्रतीक या गेटकीपिंग का औज़ार?
एडवोकेट बैंड की परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है। Advocates Act, 1961 और BCI के ड्रेस कोड नियम स्पष्ट करते हैं कि केवल वही व्यक्ति काला कोट और बैंड पहनकर कोर्ट में पेश हो सकता है जिसके पास BCI का एनरोलमेंट सर्टिफ़िकेट हो। यह एक तरह से वकालत के पेशे की 'पहचान' मानी जाती है — लेकिन सवाल यह है कि यह पहचान किसकी रक्षा कर रही है?
सोचिए — एक लॉ स्टूडेंट पाँच साल (BA LLB) या तीन साल (LLB) पढ़ाई करता है। इंटर्नशिप अनिवार्य है — BCI के अपने ही नियम कहते हैं कि बिना इंटर्नशिप के डिग्री पूरी नहीं होगी। लेकिन जब वही स्टूडेंट कोर्ट पहुँचता है, तो उसे वकील की तरह 'दिखने' की इजाज़त नहीं। वह रजिस्ट्री में फ़ाइलें ढोता है, सीनियर एडवोकेट के लिए नोट्स बनाता है, लेकिन उसकी 'हैसियत' — कम से कम कपड़ों के हिसाब से — एक दर्शक की है।
यहीं पर गुजरात हाईकोर्ट की यह घटना एक बड़ी व्यवस्थागत बेचैनी को उजागर करती है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों और क़ानूनी हलकों में यह चर्चा नई नहीं है कि BCI का ढाँचा 'गिल्ड सिस्टम' — यानी बंद दरवाज़ों वाला क्लब — बनता जा रहा है। एक वरिष्ठ वकील (जो नाम न छापने की शर्त पर बात करते हैं) की टिप्पणी अक्सर बार एसोसिएशन की बैठकों में सुनाई देती है: 'बैंड इसलिए नहीं रोका जाता कि कोर्ट की गरिमा ख़तरे में है — बैंड इसलिए रोका जाता है ताकि जूनियर को याद रहे कि वह अभी कुछ नहीं है।'
इंडस्ट्री की बात यह है कि देश भर के हाईकोर्ट्स और ज़िला अदालतों में इंटर्न्स के साथ व्यवहार को लेकर एक मूक असंतोष पनप रहा है। सोशल मीडिया पर लॉ स्टूडेंट्स के बीच 'इंटर्नशिप एक्सप्लॉइटेशन' हैशटैग कई बार ट्रेंड कर चुका है — कभी बिना वेतन के महीनों काम कराने को लेकर, कभी बुनियादी सम्मान न मिलने को लेकर। गुजरात HC वाली घटना ने इस दबी हुई आग को फिर से हवा दी है।
(यह खंड कानूनी हलकों में चल रही चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
₹50 का बैंड, ₹50 लाख की पढ़ाई — और बीच में खाई
आँकड़े देखें तो तस्वीर और साफ़ होती है। भारत में हर साल लगभग 80,000-90,000 लॉ ग्रैजुएट्स निकलते हैं (विभिन्न अनुमानों के अनुसार)। लेकिन BCI में एनरोलमेंट की प्रक्रिया — जो AIBE (All India Bar Examination) पास करने के बाद होती है — में महीनों लग जाते हैं। कई राज्यों में स्टूडेंट्स ने शिकायत की है कि एनरोलमेंट सर्टिफ़िकेट मिलने में छह महीने से एक साल तक का समय लगता है। इस बीच का दौर — जब स्टूडेंट न पूरी तरह 'छात्र' है, न 'वकील' — सबसे क्रूर होता है।
एक NLU (नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी) ग्रैजुएट की पढ़ाई पर कुल ख़र्च अक्सर ₹15-20 लाख पहुँच जाता है। प्राइवेट लॉ कॉलेजों में यह आँकड़ा और ऊपर जाता है। इतना ख़र्च करने के बाद जब कोई स्टूडेंट कोर्टरूम में ₹50 का बैंड पहन लेता है — शायद इसलिए कि उसके सीनियर ने कह दिया, शायद इसलिए कि उसे नियम की बारीकी नहीं पता — तो सज़ा यह कि पूरी कार्यवाही रुक जाती है, और उसे सबके सामने 'उदाहरण' बना दिया जाता है।
जज ग़लत नहीं — लेकिन सवाल नियम पर है
एक बात साफ़ कर दें — गुजरात हाईकोर्ट के जज ने जो किया, वह तकनीकी रूप से नियमों के अनुसार था। BCI के रूल्स के तहत बैंड पहनने का अधिकार सिर्फ़ एनरोल्ड एडवोकेट का है, और कोर्ट की यह ज़िम्मेदारी है कि वह इस आचार संहिता को लागू करे। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट में जज का रुख़ स्पष्ट था — उन्होंने इसे अनुशासन का मामला बताया।
लेकिन इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि असली समस्या जज के फ़ैसले में नहीं, उस नियम में है जो एक इंटर्न को कोर्टरूम में 'उपस्थित लेकिन अदृश्य' बनाए रखता है। जब BCI ख़ुद इंटर्नशिप को अनिवार्य बनाता है, तो इंटर्न की कोर्टरूम में क्या भूमिका होगी, उसकी पहचान क्या होगी, उसे कैसे ट्रीट किया जाएगा — यह सब तय करने की ज़िम्मेदारी भी BCI की है। और यहीं BCI चुप है।
आगे क्या — बार काउंसिल सुनेगा या सुप्रीम कोर्ट को सुनना पड़ेगा?
अब सवाल यह है कि यह 'बैंड पॉलिटिक्स' आगे कहाँ जाएगी। तीन संभावनाएँ हैं:
पहली — BCI अपने ड्रेस कोड नियमों में संशोधन करे और इंटर्न्स के लिए एक अलग पहचान चिह्न (जैसे अलग रंग का बैंड या ID बैज) तय करे। यह सबसे व्यावहारिक रास्ता है, लेकिन BCI की कार्यशैली देखें तो ऐसे सुधार में सालों लग सकते हैं।
दूसरी — कोई लॉ स्टूडेंट या बार एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर करे। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने लीगल प्रोफ़ेशन में सुधार को लेकर कई बार BCI को निर्देश दिए हैं — AIBE के मानकों से लेकर लॉ कॉलेजों की मान्यता तक। इंटर्नशिप और जूनियर लॉयर्स के अधिकारों का मुद्दा अगला फ्रंट हो सकता है।
तीसरी — कुछ नहीं बदलेगा। जैसे पिछले दशकों में नहीं बदला। और हर साल लाखों लॉ स्टूडेंट्स उसी चक्र में पिसते रहेंगे — इंटर्नशिप करो, चुपचाप रहो, बैंड मत पहनो, और जब तक AIBE पास करके एनरोलमेंट न मिले, तब तक अपनी 'औक़ात' याद रखो।
अगर आपको लगता है यह सिर्फ़ एक बैंड की कहानी है, तो ज़रा सोचिए — किसी भी पेशे में अगर एक ट्रेनी को सिर्फ़ एक कपड़े की पट्टी पहनने पर इतनी सार्वजनिक फटकार मिले कि पूरा काम रुक जाए, तो वह पेशा कितना 'स्वागत करने वाला' है?
गुजरात हाईकोर्ट का यह वाक़या एक दिन में भुला दिया जाएगा। लेकिन जिस लॉ इंटर्न के साथ यह हुआ, उसकी स्मृति में यह कोर्टरूम का पहला सबक़ बनकर रहेगा — कि न्याय के मंदिर में भी, पहले हैसियत देखी जाती है।
आँकड़ों में
- भारत में 1,700+ मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज हैं — BCI वेबसाइट
- हर साल अनुमानित 80,000-90,000 लॉ ग्रैजुएट्स निकलते हैं
- BCI एनरोलमेंट प्रक्रिया में कई राज्यों में 6 महीने से 1 साल तक विलंब की शिकायतें
मुख्य बातें
- गुजरात हाईकोर्ट में लॉ इंटर्न द्वारा एडवोकेट बैंड पहनने पर जज ने कार्यवाही रोकी — BCI नियमों के तहत सिर्फ़ एनरोल्ड एडवोकेट ही बैंड पहन सकते हैं (नवभारत टाइम्स)
- भारत में 1,700+ लॉ कॉलेजों से हर साल 80,000-90,000 लॉ ग्रैजुएट्स निकलते हैं, लेकिन BCI एनरोलमेंट में 6 महीने से 1 साल तक की देरी आम है
- इंटर्नशिप BCI के अपने नियमों से अनिवार्य है, लेकिन इंटर्न की कोर्टरूम पहचान और अधिकारों पर कोई स्पष्ट नीति नहीं
- यह घटना सिर्फ़ ड्रेस कोड नहीं — भारतीय क़ानूनी पेशे में जूनियर्स की व्यवस्थागत उपेक्षा का प्रतीक है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या लॉ इंटर्न कोर्ट में एडवोकेट बैंड पहन सकते हैं?
नहीं। BCI (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) के ड्रेस कोड नियमों के अनुसार केवल एनरोल्ड एडवोकेट ही काला बैंड और गाउन पहनकर कोर्ट में पेश हो सकते हैं। इंटर्न या लॉ स्टूडेंट को इसकी अनुमति नहीं है।
गुजरात हाईकोर्ट में क्या हुआ था?
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक लॉ इंटर्न ने एडवोकेट बैंड पहनकर कोर्टरूम में पेशी में हिस्सा लिया, जिस पर प्रिसाइडिंग जज ने कार्यवाही रोक दी और BCI के नियमों का हवाला दिया।
BCI एनरोलमेंट में कितना समय लगता है?
विभिन्न शिकायतों और रिपोर्ट्स के अनुसार, AIBE पास करने के बाद BCI एनरोलमेंट सर्टिफ़िकेट मिलने में कई राज्यों में 6 महीने से लेकर 1 साल तक का समय लग सकता है।
क्या इंटर्न्स के लिए अलग ड्रेस कोड बन सकता है?
अभी BCI के नियमों में इंटर्न्स के लिए कोई अलग पहचान चिह्न या ड्रेस कोड नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि BCI को इस दिशा में नीति बनानी चाहिए — या फिर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।