घाटी में सख्ती तो राजौरी बना 'प्लान-B' — पीर पंजाल के जंगलों में आतंक की नई पनाहगाह क्यों बन रही है?
राजौरी में लैंडमाइन ब्लास्ट में एक जेसीओ के घायल होने की घटना उस बड़ी रणनीतिक शिफ्ट का ताज़ा सबूत है जिसमें आतंकी गतिविधियों का केंद्र कश्मीर घाटी से खिसककर जम्मू के पीर पंजाल साउथ — ख़ासकर राजौरी-पुंछ के घने जंगली इलाकों — में आ गया है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारतीय सेना का एक जूनियर कमीशंड ऑफ़िसर (JCO) जो राजौरी ज़िले में तैनात था।
- क्या: राजौरी में लैंडमाइन ब्लास्ट में JCO घायल हुआ — यह जम्मू रीजन में बढ़ते आतंकी हमलों की ताज़ा कड़ी है। (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
- कब: जून 2025 में, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशनल सीज़न के दौरान।
- कहाँ: जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले में — पीर पंजाल रेंज के दक्षिणी हिस्से का घना जंगली इलाका।
- क्यों: कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों की कड़ी चौकसी और सफल एनकाउंटर अभियानों ने आतंकियों को जम्मू रीजन, ख़ासकर राजौरी-पुंछ के दुर्गम जंगलों की ओर धकेल दिया है।
- कैसे: आतंकियों ने सेना की गश्ती पार्टी के रास्ते में IED/लैंडमाइन बिछाया, जिसमें विस्फोट से JCO ज़ख़्मी हुआ। (स्रोत: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
एक लैंडमाइन, एक घायल जेसीओ, और राजौरी का वही जंगल जो पिछले दो-तीन सालों से बार-बार ख़बरों में आ रहा है — हर बार थोड़ा ज़्यादा ख़ूनी, हर बार थोड़ा ज़्यादा चिंताजनक। जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले में ताज़ा लैंडमाइन ब्लास्ट में एक जूनियर कमीशंड ऑफ़िसर (JCO) के घायल होने की ख़बर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने दी है। अगर यह इकलौती घटना होती, तो शायद रूटीन सुरक्षा अपडेट मानकर आगे बढ़ जाते। लेकिन यह इकलौती नहीं है — यह एक पैटर्न की ताज़ा, और शायद सबसे स्पष्ट, कड़ी है।
वह पैटर्न यह है: कश्मीर घाटी — जो दशकों से आतंकवाद का 'ग्राउंड ज़ीरो' रहा — अब पहले से कहीं ज़्यादा सख़्त निगरानी में है। इंटेलिजेंस ग्रिड मज़बूत हुआ, एनकाउंटर तेज़ हुए, ओवरग्राउंड वर्कर नेटवर्क पर शिकंजा कसा। नतीजा? घाटी में आतंकी वारदातों की संख्या में गिरावट आई — यह सुरक्षा बलों की सफलता है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जहाँ एक दरवाज़ा बंद हुआ, वहाँ दूसरी खिड़की खुल गई — और वह खिड़की है पीर पंजाल के दक्षिण का इलाका: राजौरी, पुंछ, और उनके बीच फैले घने, दुर्गम जंगल।
राजौरी-पुंछ: आतंक का 'प्लान-B' क्यों?
इसे समझने के लिए नक़्शा देखिए। पीर पंजाल रेंज कश्मीर घाटी और जम्मू डिवीज़न के बीच एक प्राकृतिक दीवार है। इसके उत्तर में — शोपियाँ, कुलगाम, पुलवामा — जहाँ दशकों से आतंकवाद का गढ़ रहा। लेकिन इसके दक्षिण में — राजौरी, पुंछ, रियासी — वहाँ की भौगोलिक स्थिति बिलकुल अलग है। यहाँ 'गुलमर्ग-नाउगाम' जैसे खुले मैदान नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्ग किलोमीटर में फैले घने देवदार और चीड़ के जंगल हैं, ऊँची-नीची पहाड़ियाँ हैं, और छोटे-छोटे गाँव हैं जहाँ सड़कें ख़त्म हो जाती हैं।
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यही भूगोल आतंकी समूहों के लिए 'स्ट्रैटेजिक एडवांटेज' बन गया है। घाटी में जो काम शहरी आबादी के बीच छिपकर होता था — ओवरग्राउंड सपोर्ट, सेफ़ हाउस, लॉजिस्टिक्स — वह राजौरी-पुंछ के जंगलों में प्रकृति ख़ुद मुहैया कराती है। इन जंगलों में ड्रोन सर्विलांस की अपनी सीमाएँ हैं — घनी छत्रछाया गर्मी के सिग्नल भी छिपा लेती है। सैटेलाइट इमेजरी से एक-दो लोगों की मूवमेंट पकड़ना मुश्किल है। और LoC से नज़दीकी — राजौरी ज़िले के कुछ हिस्से नियंत्रण रेखा से 15-20 किलोमीटर ही दूर हैं — घुसपैठ के लिए अपेक्षाकृत छोटा रास्ता देती है।
आँकड़े जो कहानी बयान करते हैं
पिछले तीन वर्षों का रिकॉर्ड देखें तो तस्वीर और साफ़ होती है। गृह मंत्रालय और सेना के विभिन्न बयानों के अनुसार, जम्मू डिवीज़न — ख़ासकर राजौरी-पुंछ बेल्ट — में आतंकी वारदातों की संख्या 2021 के बाद से लगातार बढ़ी है, जबकि इसी अवधि में कश्मीर घाटी में ये घटनाएँ कम हुई हैं। 2023 में राजौरी-पुंछ में कई बड़े हमले हुए — सेना के जवान शहीद हुए, और कुछ ऑपरेशन हफ़्तों तक चले। 2024 में रियासी-कटरा बेल्ट तक यह दायरा बढ़ा। और अब 2025 में, यह ताज़ा लैंडमाइन ब्लास्ट।
लैंडमाइन या IED का इस्तेमाल ख़ुद एक 'टैक्टिकल सिग्नल' है। यह बताता है कि आतंकी समूह इस इलाके में सिर्फ़ गुज़र नहीं रहे, बल्कि टिके हुए हैं — इतने कि सेना की गश्ती रूट्स की रेकी कर सकें, IED प्लांट कर सकें, और इंतज़ार कर सकें। यह 'ट्रांज़िट' नहीं, 'लॉजमेंट' है — फ़र्क बहुत बड़ा है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में — दिल्ली से लेकर जम्मू तक — जो बात दबी ज़ुबान में होती है वह यह है: क्या सुरक्षा तंत्र ने कश्मीर घाटी को 'शो-पीस' बनाने में जम्मू ज़ोन को 'अंडर-प्रायोरिटाइज़' कर दिया? विश्लेषक बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में घाटी में आतंकवाद के ग्राफ़ को नीचे लाना सरकार के लिए राजनीतिक रूप से ज़रूरी था — अनुच्छेद 370 हटाने के बाद यह 'सफलता की कहानी' बताने का सबसे ठोस पैमाना बन गया। लेकिन जम्मू रीजन — जो परंपरागत रूप से 'शांत' माना जाता था — वहाँ का सुरक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर उसी अनुपात में नहीं बढ़ा।
एक वरिष्ठ रिटायर्ड सैन्य अधिकारी की टिप्पणी — जो हाल ही में कई मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई — बहुत सटीक है: "आप एक कमरे में बत्ती जलाकर चोर भगा देते हैं, तो चोर बगल के अँधेरे कमरे में चला जाता है।" यही हुआ है। (यह इंडस्ट्री और सुरक्षा हलकों में व्यापक रूप से चर्चित विश्लेषण है, पुष्ट आधिकारिक बयान नहीं।)
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह 'टैक्टिकल शिफ्ट' सिर्फ़ सैन्य समस्या नहीं — यह एक राजनीतिक चुनौती भी बन चुकी है। जम्मू डिवीज़न — जो पारंपरिक रूप से बीजेपी का गढ़ है — वहाँ के लोगों में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। अगर यह धारणा मज़बूत होती है कि सरकार ने घाटी की सफलता के लिए जम्मू की सुरक्षा से समझौता किया, तो यह बीजेपी के अपने वोट-बैंक में दरार डाल सकता है।
पाकिस्तान का 'कैलकुलेटेड गैम्बिट'
सीमा पार से इसे देखें तो तस्वीर और पेचीदा है। विभिन्न इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स और रक्षा विश्लेषणों के मुताबिक, पाकिस्तान स्थित आतंकी समूह — ख़ासकर लश्कर और जैश के मॉड्यूल — ने जानबूझकर राजौरी-पुंछ बेल्ट को चुना है। कारण कई हैं: पहला, यहाँ की मिश्रित आबादी (गुज्जर-बकरवाल समुदाय) में कुछ हद तक ओवरग्राउंड सपोर्ट विकसित करने की कोशिश। दूसरा, LoC से नज़दीकी जो लॉजिस्टिक सप्लाई — हथियार, गोला-बारूद, संचार उपकरण — को आसान बनाती है। तीसरा, और सबसे अहम, जम्मू में हमला करने का 'ऑप्टिक्स वैल्यू' — यह संदेश देना कि आतंकवाद सिर्फ़ घाटी तक सीमित नहीं, बल्कि जम्मू तक फैल सकता है।
यह एक 'कैलकुलेटेड गैम्बिट' है — सैन्य भाषा में कहें तो 'थ्रेट पर्सेप्शन को वाइडन करना'। जब ख़तरा एक जगह केंद्रित हो तो फ़ोर्स डिप्लॉयमेंट आसान है; जब वह 500 किलोमीटर की बेल्ट में फैल जाए, तो हर चेकपोस्ट, हर गश्ती रूट, हर जंगली पगडंडी को कवर करना असंभव के क़रीब हो जाता है।
आगे क्या — जो देखना ज़रूरी है
इस ताज़ा ब्लास्ट के बाद कुछ चीज़ें तय हैं। पहला, राजौरी-पुंछ बेल्ट में CASO (कॉर्डन एंड सर्च ऑपरेशन) तेज़ होंगे — सेना पहले ही 'ऑपरेशन त्रिनेत्र' जैसे अभियान चला रही है। दूसरा, इस इलाके में फ़ोर्स मल्टीप्लायर के तौर पर VDG (विलेज डिफ़ेंस गार्ड्स) को और मज़बूत करने की बात उठेगी — लेकिन यह अपने आप में विवादित मुद्दा है क्योंकि इससे समुदायों के बीच विश्वास की खाई बढ़ने का ख़तरा रहता है। तीसरा — और यह सबसे अहम है — सरकार को यह तय करना होगा कि क्या जम्मू डिवीज़न के लिए अलग, समर्पित काउंटर-इन्सर्जेंसी स्ट्रैटेजी बनाई जाए, जो घाटी की स्ट्रैटेजी से अलग हो — क्योंकि भूगोल अलग है, समाज अलग है, और आतंक का तरीका अलग है।
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एक घायल जेसीओ — यह एक आँकड़ा है जो शायद अगले हफ़्ते तक भूल जाएगा। लेकिन वह लैंडमाइन जिसने उन्हें घायल किया, वह उस ज़मीन में गड़ी थी जो दस साल पहले तक 'शांत ज़ोन' मानी जाती थी। असली सवाल यह नहीं है कि यह ब्लास्ट क्यों हुआ — असली सवाल यह है कि अगला ब्लास्ट कहाँ होगा, और क्या सुरक्षा तंत्र उस 'कहाँ' का जवाब देने के लिए तैयार है?
आरोपों और विश्लेषणों को यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत किया गया है और ये तब तक अप्रमाणित हैं जब तक कोई न्यायालय निर्णय न दे; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
आँकड़ों में
- राजौरी ज़िले के कुछ हिस्से LoC से मात्र 15-20 किलोमीटर दूर हैं — घुसपैठ के लिए अपेक्षाकृत छोटी दूरी। (रक्षा विश्लेषण)
- 2021 के बाद से जम्मू डिवीज़न में आतंकी वारदातें बढ़ी हैं जबकि कश्मीर घाटी में कमी आई है। (गृह मंत्रालय व सेना के बयान)
मुख्य बातें
- कश्मीर घाटी में सुरक्षा सख्ती के बाद आतंकी गतिविधियों का केंद्र पीर पंजाल के दक्षिण — राजौरी-पुंछ बेल्ट — में शिफ्ट हो चुका है।
- लैंडमाइन/IED का इस्तेमाल बताता है कि आतंकी इस इलाके में 'ट्रांज़िट' नहीं बल्कि 'लॉज' हैं — यानी टिके हुए हैं और सेना की रूट रेकी कर रहे हैं।
- जम्मू डिवीज़न — बीजेपी का पारंपरिक गढ़ — में बढ़ती असुरक्षा सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है।
- सरकार को जम्मू ज़ोन के लिए अलग, समर्पित काउंटर-इन्सर्जेंसी रणनीति बनानी होगी — घाटी का फ़ॉर्मूला यहाँ काम नहीं करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राजौरी-पुंछ में आतंकी हमले क्यों बढ़ रहे हैं?
कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों की सख्ती ने आतंकियों को पीर पंजाल के दक्षिण — राजौरी-पुंछ के घने जंगलों — की ओर धकेला है, जहाँ का दुर्गम भूगोल और LoC से नज़दीकी उन्हें प्राकृतिक पनाह देती है।
लैंडमाइन ब्लास्ट से क्या संकेत मिलता है?
IED/लैंडमाइन का इस्तेमाल बताता है कि आतंकी इस क्षेत्र में गुज़र नहीं रहे बल्कि टिके हुए हैं — वे सेना की गश्ती रूट्स की रेकी कर विस्फोटक बिछा रहे हैं, जो 'लॉजमेंट' का संकेत है।
क्या जम्मू ज़ोन के लिए अलग सुरक्षा रणनीति ज़रूरी है?
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार हाँ — राजौरी-पुंछ का भूगोल, समाज और आतंक का तरीका घाटी से बिलकुल अलग है, इसलिए वहाँ की काउंटर-इन्सर्जेंसी स्ट्रैटेजी भी अलग होनी चाहिए।