असम में 'हिमंत शो' का असली दांव — क्या 2026 की यह जंग सरमा को दिल्ली दरबार का किंगमेकर बना देगी?

Singh Anchala

असम में तेज़ होता चुनावी प्रचार सिर्फ़ राज्य की सत्ता का मामला नहीं है। हिमंत बिस्वा सरमा के लिए यह जीत 2029 लोकसभा से पहले भाजपा की राष्ट्रीय बिसात पर उनकी हैसियत तय करेगी, जबकि कांग्रेस पूर्वोत्तर में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भाजपा के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और कांग्रेस के राज्य व राष्ट्रीय नेतृत्व — News On AIR के अनुसार दोनों दल प्रचार में पूरी ताक़त झोंक रहे हैं।
  • क्या: असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए प्रचार अभियान तेज़ हो गया है, भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेता रैलियों को संबोधित कर रहे हैं।
  • कब: 2026 में असम विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद से प्रचार अभियान पूरी रफ़्तार में है।
  • कहाँ: असम के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में — गुवाहाटी, सिलचर, डिब्रूगढ़ और ब्रह्मपुत्र घाटी के ज़िलों सहित।
  • क्यों: भाजपा के लिए यह पूर्वोत्तर में अपने दबदबे को पक्का करने और हिमंत की राष्ट्रीय छवि गढ़ने का मौक़ा है; कांग्रेस के लिए यह क्षेत्र में अपना अस्तित्व बचाने की आख़िरी कोशिश है।
  • कैसे: भाजपा केंद्रीय नेतृत्व और NDA सहयोगियों के साथ मिलकर बूथ-स्तर पर संगठन चला रही है, जबकि कांग्रेस बदरुद्दीन अजमल की AIUDF से दूरी-क़रीबी के संकेतों और स्थानीय गठबंधनों पर निर्भर है।

एक राज्य का चुनाव। एक मुख्यमंत्री जिसकी महत्वाकांक्षा राज्य की सीमाओं में समा नहीं रही। और एक विपक्षी पार्टी जिसके पास न चेहरा है, न कथा, न ज़मीनी संगठन। असम विधानसभा चुनाव 2026 ऊपर से एक राज्य चुनाव दिखता है — लेकिन अंदर से यह भारतीय राजनीति के सबसे बड़े सवालों में से एक की ड्रेस रिहर्सल है: 2029 में मोदी के बाद — या मोदी के साथ — भाजपा का अगला राष्ट्रीय चेहरा कौन?

News On AIR के अनुसार, भाजपा और कांग्रेस दोनों के शीर्ष नेता असम में रैलियों को संबोधित कर रहे हैं और प्रचार अभियान अपने चरम पर पहुँच गया है। लेकिन रैलियों की भीड़ और माइक पर ग़रजते नारों के पीछे जो असली खेल चल रहा है, उसे समझने के लिए ज़रा गहरे उतरना होगा।

हिमंत का 'मॉडल': विकास या ध्रुवीकरण?

हिमंत बिस्वा सरमा ने पिछले पाँच सालों में असम में एक ऐसा प्रशासनिक-राजनीतिक मॉडल खड़ा किया है जिसकी दिल्ली में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बार-बार तारीफ़ की है। बाढ़ प्रबंधन, चाय बाग़ान मज़दूरों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ, और CAA-NRC पर कड़ा रुख़ — सरमा ने विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक ऐसा कॉकटेल तैयार किया है जिसे भाजपा अपने अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में कॉपी-पेस्ट करना चाहती है। भारतीय निर्वाचन आयोग के आँकड़ों के मुताबिक़, 2021 में भाजपा ने असम में 60 सीटें जीतकर सहयोगियों के साथ दो-तिहाई बहुमत हासिल किया था — अगर 2026 में भी यह आँकड़ा बरक़रार रहता है, तो सरमा उन गिने-चुने मुख्यमंत्रियों में शामिल हो जाएँगे जिन्होंने लगातार दो बार इतने बड़े मार्जिन से जीत दर्ज की।

लेकिन सरमा का असली कार्ड विकास नहीं, बल्कि ध्रुवीकरण की राजनीति में उनकी महारत है। CAA लागू होने के बाद असम में जो ज़मीनी बँटवारा हुआ — हिंदू बंगाली बनाम स्थानीय असमी बनाम मुस्लिम — उसे सरमा ने इतनी कुशलता से नेविगेट किया कि हर वर्ग को लगा कि सरकार उनके पक्ष में है। यह वही हुनर है जो दिल्ली में भाजपा के चुनावी रणनीतिकार ढूँढते हैं।

कांग्रेस का संकट: न चेहरा, न कथा

कांग्रेस की हालत असम में किसी ढहती इमारत जैसी है — नींव कमज़ोर, दीवारें दरक चुकीं, और छत पर खड़े होने को कोई तैयार नहीं। पार्टी के पास न कोई ऐसा चेहरा है जो सरमा के सामने टिक सके, न कोई ऐसी कथा जो असम के मतदाता को लुभा सके। 2021 में कांग्रेस ने AIUDF के साथ 'महाजोट' बनाया था — नतीजा? मुस्लिम वोट बँट गया और हिंदू वोट और ज़्यादा भाजपा की ओर चला गया।

इस बार कांग्रेस के सामने दोहरी मुश्किल है। अगर बदरुद्दीन अजमल की AIUDF के साथ फिर गठबंधन करती है, तो 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का भाजपा का नैरेटिव और मज़बूत होगा। अगर नहीं करती, तो अल्पसंख्यक वोट तीन-चार टुकड़ों में बिखर जाएगा और भाजपा को सीधा फ़ायदा होगा। राहुल गांधी की रैलियों में भीड़ तो आ रही है — लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के पास ज़मीनी बूथ-स्तर का संगठन बुरी तरह चरमरा चुका है। पार्टी के कई दिग्गज नेता या तो भाजपा में जा चुके हैं, या चुनाव लड़ने से बच रहे हैं।

पॉलिटिकल पल्स

दिल्ली के सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि अगर सरमा 2026 में 70+ सीटें लाते हैं — यानी 2021 से भी बेहतर प्रदर्शन — तो उनका नाम 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के 'टॉप-5 नेशनल फेसेस' में आ सकता है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि सरमा की नज़र पार्टी अध्यक्ष पद या किसी बड़े केंद्रीय मंत्रालय पर है — ठीक वैसे ही जैसे एक समय शिवराज सिंह चौहान या मनोहर पर्रिकर की ज़मीनी जीत ने उन्हें दिल्ली की बिसात पर बड़ा खिलाड़ी बनाया था।

लेकिन सरमा के रास्ते में रोड़ा भी कम नहीं। भाजपा के भीतर ही असम के कई नेता उनकी 'वन-मैन शो' शैली से नाराज़ हैं। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि सरमा ने राज्य में पार्टी संगठन को इतना केंद्रित कर लिया है कि अगर वे कभी दिल्ली जाएँ, तो असम में उनकी जगह लेने वाला कोई दूसरा चेहरा तैयार नहीं है — और यही बात दिल्ली के नेतृत्व को थोड़ा सतर्क भी रखती है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

पूर्वोत्तर में भाजपा का बड़ा प्रयोग

असम सिर्फ़ असम नहीं है — यह भाजपा के पूरे पूर्वोत्तर एजेंडे का नर्व सेंटर है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2014 से पहले भाजपा पूर्वोत्तर के आठ में से सिर्फ़ एक राज्य में सत्ता में थी; आज वह सीधे या गठबंधन से लगभग सभी राज्यों पर क़ाबिज़ है। असम इस पूरी रणनीति का केंद्रबिंदु है — अगर यहाँ सरमा की जीत पक्की होती है, तो मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा में भाजपा के गठबंधन साझेदार भी सहज रहेंगे। हार हुई, तो पूर्वोत्तर की पूरी बिसात हिल सकती है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि असम 2026 का चुनाव असल में तीन परतों पर खेला जा रहा है — पहली परत: ज़मीनी मुद्दे, बाढ़, बेरोज़गारी, चाय मज़दूरों की हालत। दूसरी परत: CAA, NRC और सांस्कृतिक पहचान की राजनीति। तीसरी परत — जो सबसे अहम है और जिसके बारे में कोई खुलकर नहीं बोलता — हिमंत बिस्वा सरमा का व्यक्तिगत राष्ट्रीय भविष्य। और यही तीसरी परत है जो इस चुनाव को एक साधारण राज्य चुनाव से कहीं ज़्यादा बड़ा बनाती है।

कांग्रेस के लिए 'अस्तित्व' का सवाल

कांग्रेस के लिए असम अब 'जीत' का सवाल नहीं रहा — यह 'अस्तित्व' का सवाल है। पार्टी 2016 से पूर्वोत्तर में लगातार सिकुड़ती गई है। अगर 2026 में भी कांग्रेस 30 सीटों से नीचे रहती है, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या पूर्वोत्तर में कांग्रेस को 'क्षेत्रीय पार्टी' का दर्जा भी मिल पाएगा। पार्टी को अपना 'काउंटर-नैरेटिव' ढूँढना होगा — सिर्फ़ भाजपा-विरोध पर चुनाव नहीं जीते जाते, यह बात 2021 में साबित हो चुकी है।

ऑनलाइन भी घूमता सवाल यही है — क्या कांग्रेस के पास असम में सरमा के मुक़ाबले कोई 'स्टार चेहरा' है? जवाब आज की तारीख़ में 'नहीं' है, और यही शायद इस चुनाव की सबसे बड़ी ख़बर है।

आगे क्या? — देखने लायक़ तीन बातें

पहला: भाजपा के सीट-शेयरिंग फ़ॉर्मूले पर नज़र रखें — AGP और UPPL के साथ सीटों का बँटवारा कितना सहज होता है, इससे NDA की आंतरिक सेहत पता चलेगी। दूसरा: कांग्रेस-AIUDF का रिश्ता — अगर गठबंधन होता है तो किस फ़ॉर्मूले पर, और अगर नहीं होता तो कांग्रेस का मुस्लिम वोट-बेस कहाँ जाएगा। तीसरा: सरमा की रैलियों की भाषा — अगर वे असम के मुद्दों से ज़्यादा राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलने लगें, तो समझिए कि उनकी नज़र पहले से दिल्ली की ओर है।

असम का यह चुनाव एक राज्य की सत्ता से कहीं बड़ा है। यह उस सवाल का जवाब तय करेगा जो हर राजनीतिक विश्लेषक पूछ रहा है — क्या भाजपा के पास मोदी के अलावा कोई ऐसा चेहरा है जो अकेले दम पर राज्य जीत सके? अगर सरमा का जवाब 'हाँ' निकलता है, तो दिल्ली की सियासी हवा का रुख़ बदलना तय है। और अगर कांग्रेस का जवाब फिर 'नहीं' निकलता है — तो पूर्वोत्तर में उसका आख़िरी क़िला भी गिर चुका माना जाएगा।

आरोपों और राजनीतिक दावों को यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत किया गया है और ये तब तक अप्रमाणित हैं जब तक कोई अदालत निर्णय न दे; न्यायालय-विचाराधीन मामलों पर बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किया गया है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • 2021 में भाजपा ने असम में 60 सीटें जीतकर सहयोगियों के साथ दो-तिहाई बहुमत हासिल किया था — भारतीय निर्वाचन आयोग के आँकड़े।
  • 2014 से पहले भाजपा पूर्वोत्तर के 8 में से सिर्फ़ 1 राज्य में सत्ता में थी; आज लगभग सभी में सत्ता या गठबंधन में है।

मुख्य बातें

  • हिमंत बिस्वा सरमा के लिए असम 2026 सिर्फ़ राज्य चुनाव नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा से पहले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी हैसियत तय करने का इम्तिहान है।
  • कांग्रेस के पास न कोई मज़बूत चेहरा है, न कोई काउंटर-नैरेटिव — AIUDF गठबंधन का फ़ैसला उसकी रणनीति बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है।
  • असम भाजपा के पूरे पूर्वोत्तर एजेंडे का नर्व सेंटर है — यहाँ की जीत-हार का असर मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा पर सीधा पड़ेगा।
  • 2021 में भाजपा ने 60 सीटें जीती थीं; अगर 2026 में 70+ सीटें आती हैं, तो सरमा भाजपा के टॉप-5 राष्ट्रीय चेहरों में शामिल हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

असम विधानसभा चुनाव 2026 कब होंगे?

2026 में असम विधानसभा चुनावों की तारीख़ों की घोषणा भारतीय निर्वाचन आयोग करेगा। प्रचार अभियान पहले से तेज़ हो चुका है और भाजपा-कांग्रेस दोनों रैलियों में पूरी ताक़त लगा रही हैं।

हिमंत बिस्वा सरमा की राष्ट्रीय राजनीतिक महत्वाकांक्षा क्या है?

सियासी विश्लेषकों के अनुसार, अगर सरमा 2026 में बड़ी जीत दर्ज करते हैं, तो उनका नाम 2029 लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के शीर्ष राष्ट्रीय चेहरों में आ सकता है — चाहे पार्टी अध्यक्ष पद हो या बड़ा केंद्रीय मंत्रालय।

कांग्रेस की असम में क्या रणनीति है?

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसी मज़बूत मुख्यमंत्री चेहरे की कमी और AIUDF के साथ गठबंधन का फ़ैसला है। गठबंधन करें तो भाजपा का तुष्टिकरण वाला नैरेटिव मज़बूत होगा, न करें तो अल्पसंख्यक वोट बिखर जाएगा।

असम चुनाव का पूर्वोत्तर की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?

असम भाजपा के पूर्वोत्तर एजेंडे का नर्व सेंटर है। यहाँ की जीत से मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा में गठबंधन साझेदार सहज रहेंगे; हार से पूरी पूर्वोत्तर रणनीति हिल सकती है।

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