अदालतों में 'प्राचीन ज्ञान' की कमी — कर्नाटक के पूर्व CM का सुर BNS की स्क्रिप्ट से क्यों मिलता है?

Singh Anchala

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय कानूनी व्यवस्था में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का अभाव है। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, यह बयान उस बड़ी राजनीतिक पिच से जुड़ता है जिसमें BNS के ज़रिए औपनिवेशिक क़ानूनों को भारतीय परंपरा से बदलने की बात कही जा रही है।

एक पूर्व मुख्यमंत्री मंच पर खड़े होकर कहता है — हमारी अदालतों में प्राचीन भारतीय ज्ञान की कमी है। सुनने में यह किसी विश्वविद्यालय के सेमिनार जैसा लगता है, लेकिन द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री का यह बयान उस समय आया है जब केंद्र सरकार ने पहले ही अंग्रेज़ों के बनाए तीन बड़े आपराधिक क़ानूनों — IPC, CrPC और Indian Evidence Act — को कूड़ेदान में डालकर भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू कर दिए हैं। तो सवाल यही है: क्या यह बयान सिर्फ़ एक अकादमिक राय है, या किसी बड़ी राजनीतिक स्क्रिप्ट का ताज़ा डायलॉग?

इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलिए। जब 2023 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में तीन नए आपराधिक क़ानून पेश किए थे, तब उनकी भाषा में एक शब्द बार-बार आया था — 'औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति'। ANI की रिपोर्ट के अनुसार शाह ने उस वक्त कहा था कि ये क़ानून अंग्रेज़ों ने भारतीयों को दबाने के लिए बनाए थे और अब आज़ाद भारत को अपने मूल्यों पर आधारित न्याय व्यवस्था चाहिए। BNS जुलाई 2024 से लागू हो चुकी है — यानी अब लगभग दो साल हो गए।

अब कर्नाटक के पूर्व सीएम जब 'प्राचीन ज्ञान' की बात करते हैं, तो वह इसी नैरेटिव की अगली कड़ी बन जाती है। ध्यान दीजिए — BNS ने भले ही क़ानून की भाषा और ढाँचा बदल दिया हो, लेकिन आलोचक कहते हैं कि इसमें कौटिल्य के अर्थशास्त्र या मनुस्मृति जैसे प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्रीय ग्रंथों की कोई सीधी छाप नहीं है। द हिंदू ने अपनी विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में लिखा था कि BNS बड़े पैमाने पर IPC का ही पुनर्लेखन है — धाराओं के नंबर बदले, कुछ नई धाराएँ जोड़ीं, लेकिन मूल ढाँचा ब्रिटिश कॉमन लॉ का ही रहा। तो पूर्व सीएम का बयान एक तरह से इस 'अधूरे डी-कॉलोनाइजेशन' की ओर इशारा करता है — कि नाम बदलना काफ़ी नहीं, आत्मा भी बदलनी होगी।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि 'प्राचीन ज्ञान' वाला यह सुर कोई अनायास नहीं है। बीजेपी के भीतर एक धड़ा लंबे समय से चाहता रहा है कि न्यायपालिका में भी वही 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का रंग आए जो शिक्षा नीति (NEP 2020) में दिखा — जहाँ वैदिक गणित, संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में जगह मिली। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि अगर 2029 के आम चुनावों से पहले 'न्यायिक भारतीयकरण' को एक बड़ी थीम बनाना है, तो उसकी ज़मीन अभी से तैयार करनी होगी — और ऐसे बयान उसी ज़मीन के पहले पत्थर हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही तीखा है। विपक्ष और कई विधि विशेषज्ञ इस पूरे नैरेटिव को संविधान की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद के लिए ख़तरा मानते हैं। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक विश्लेषण में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्यों ने चिंता जताई थी कि अगर 'प्राचीन ज्ञान' का मतलब किसी एक धार्मिक परंपरा के ग्रंथों को न्यायिक आधार बनाना है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) से सीधा टकराव पैदा करता है। दूसरी ओर, इस बयान के समर्थक कहते हैं कि प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र — चाहे वह कौटिल्य का हो या बौद्ध विनय पिटक का — में प्राकृतिक न्याय, साक्ष्य विधि और दंड के सिद्धांत थे जो आधुनिक विधिशास्त्र से कम परिष्कृत नहीं थे। सवाल यह है कि इन दोनों पक्षों के बीच का फ़ैसला कौन करेगा — संसद, सुप्रीम कोर्ट, या चुनावी जनादेश?

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह बयान 'डी-कॉलोनाइजेशन 2.0' की ड्रेस रिहर्सल है। BNS ने पहला चरण पूरा किया — क़ानूनों के नाम और ढाँचा बदला। अब दूसरा चरण वह होगा जहाँ न्यायशास्त्र की 'आत्मा' को बदलने की बात होगी — और इसके लिए 'प्राचीन ज्ञान' एक बेहद शक्तिशाली राजनीतिक मुहावरा है क्योंकि इसका विरोध करने वाला तुरंत 'भारतीय परंपरा विरोधी' दिखता है। यह ठीक वही रणनीति है जो NEP, UCC बहस और अयोध्या फ़ैसले के बाद के विमर्श में दिखी — पहले सांस्कृतिक सहमति बनाओ, फिर संस्थागत बदलाव लाओ।

आने वाले महीनों में देखिए — क्या संसद की विधि समितियों में 'प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र' पर नई रिपोर्ट या स्टडी ग्रुप बनते हैं, क्या लॉ कमीशन को इस विषय पर कोई नया संदर्भ मिलता है, और क्या कर्नाटक जैसे राज्यों में विधानसभा स्तर पर कोई प्रस्ताव आता है। अगर इनमें से कोई भी होता है, तो समझिए कि यह बयान कोई एकतरफ़ा टिप्पणी नहीं बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक अग्निपरीक्षा थी।

असली सवाल यह नहीं है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान मूल्यवान है या नहीं — निश्चित ही है। असली सवाल यह है कि जब सत्ता 'ज्ञान' का चुनाव करती है, तो वह किसका ज्ञान चुनती है, किसके लिए चुनती है, और किसे छोड़ देती है? जब तक यह जवाब साफ़ नहीं होता, तब तक 'न्यायिक भारतीयकरण' एक रोमांचक नारा भी है और एक ख़तरनाक फिसलन भी।

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मुख्य बातें

  • कर्नाटक के पूर्व CM का 'प्राचीन ज्ञान' बयान BNS लागू होने के दो साल बाद आया है — यह 'डी-कॉलोनाइजेशन 2.0' की राजनीतिक ज़मीन तैयार करने जैसा दिखता है।
  • BNS ने क़ानून के नाम बदले, लेकिन विधि विशेषज्ञों के अनुसार मूल ढाँचा अभी भी ब्रिटिश कॉमन लॉ पर टिका है — 'आत्मा बदलने' का एजेंडा अभी बाकी है।
  • विपक्ष और बार एसोसिएशन के सदस्य इसे संविधान की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद के लिए ख़तरा मानते हैं, जबकि समर्थक इसे भारतीय न्यायशास्त्रीय विरासत को पुनर्जीवित करने का ज़रूरी कदम बताते हैं।
  • आने वाले महीनों में लॉ कमीशन, संसदीय समितियों और राज्य विधानसभाओं में इस विषय पर कोई औपचारिक पहल होती है या नहीं — यही बताएगा कि बयान अकादमिक था या राजनीतिक।

आँकड़ों में

  • BNS, BNSS और BSA — तीन नए आपराधिक क़ानून जुलाई 2024 से लागू, जिन्होंने 164 साल पुराने IPC, CrPC और Evidence Act को बदला।
  • द हिंदू के विश्लेषण के अनुसार BNS बड़े पैमाने पर IPC का पुनर्लेखन है — धाराओं के नंबर बदले, मूल ढाँचा ब्रिटिश कॉमन लॉ का ही रहा।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री, जिन्होंने भारतीय कानूनी प्रणाली पर यह टिप्पणी की (द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • क्या: उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायिक प्रणाली में प्राचीन भारतीय ज्ञान और दर्शन का समावेश नहीं है, जो एक बड़ी कमी है (द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • कब: जून 2026 में यह बयान सामने आया, जब भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू हुए लगभग दो साल हो चुके हैं।
  • कहाँ: कर्नाटक — बयान राज्य स्तरीय मंच से आया लेकिन इसकी गूँज राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में है।
  • क्यों: क्योंकि केंद्र सरकार पहले से IPC, CrPC और Evidence Act को बदलकर BNS, BNSS और BSA ला चुकी है, और 'औपनिवेशिक विरासत हटाओ' का नैरेटिव सत्ताधारी दल की बड़ी राजनीतिक थीम है।
  • कैसे: पूर्व सीएम ने सार्वजनिक मंच से यह विचार रखा कि भारतीय न्यायशास्त्र को मनुस्मृति, कौटिल्य के अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों से प्रेरणा लेनी चाहिए — यह केंद्र की डी-कॉलोनाइजेशन पिच के समानांतर चलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कर्नाटक के पूर्व CM ने 'प्राचीन ज्ञान' पर क्या कहा?

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय कानूनी व्यवस्था में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा — जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र — का समावेश नहीं है, जो एक बड़ी कमी है।

BNS क्या है और इसका इस बयान से क्या संबंध है?

भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2024 में लागू हुई, जिसने 1860 के IPC को बदला। लेकिन विधि विशेषज्ञों के अनुसार इसका मूल ढाँचा ब्रिटिश कॉमन लॉ पर ही टिका है — पूर्व CM का बयान इसी 'अधूरे भारतीयकरण' की ओर इशारा करता है।

क्या अदालतों में प्राचीन ज्ञान लाना संविधान से टकराएगा?

विपक्षी विधि विशेषज्ञ और बार एसोसिएशन सदस्य मानते हैं कि अगर 'प्राचीन ज्ञान' का मतलब किसी विशेष धार्मिक परंपरा है, तो यह अनुच्छेद 14 और 25 से टकरा सकता है। समर्थक कहते हैं कि प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर भी आधारित था।

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