खदान घोटालों के दाग वाले सोरेन का 'माइन टूरिज्म' दांव — बंद सुरंगों से सैलानी आएँगे या सिर्फ वोट?
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों को बंद और भूमिगत खदानों को पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित करने का निर्देश दिया है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार यह योजना रोजगार और राजस्व बढ़ाने के लिए है, लेकिन अवैध खनन के आरोपों और खदानों की सुरक्षा चिंताओं के बीच इसकी व्यावहारिकता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
एक ऐसा राज्य जहाँ की खदानों ने दशकों से ख़बरों में जगह बनाई — लेकिन पर्यटन के लिए नहीं, अवैध खनन, माफ़िया और राजनीतिक घोटालों के लिए। अब उन्हीं खदानों को 'टूरिस्ट स्पॉट' बनाने का ख़्वाब दिखाया जा रहा है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि राज्य की बंद और भूमिगत खदानों को पर्यटन स्थलों के रूप में चिह्नित और विकसित किया जाए।
सुनने में रोमांचक लगता है — जैसे वेल्स की स्लेट खदानें या जर्मनी की रुहर वैली, जहाँ बंद खदानें अब यूनेस्को हेरिटेज साइट हैं। लेकिन जब यह प्रस्ताव उस नेता की ओर से आए जिस पर खुद अवैध खनन से जुड़े गंभीर आरोप लग चुके हों, तो विश्वसनीयता का सवाल सबसे पहले खड़ा होता है। हेमंत सोरेन 2024 में खनन-संबंधी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की गिरफ़्तारी झेल चुके हैं — यह तथ्य किसी से छिपा नहीं।
अब ज़रा ग़ौर करें — झारखंड में कोयला, अभ्रक, लोहा, बॉक्साइट और यूरेनियम की सैकड़ों खदानें बंद पड़ी हैं। इनमें से कई दशकों पुरानी हैं, कई में पानी भर चुका है, कई की संरचना जर्जर है। भारत के खनन सुरक्षा महानिदेशालय (DGMS) के मानकों के अनुसार, किसी भी बंद भूमिगत खदान में आम जनता को प्रवेश देने से पहले व्यापक संरचनात्मक ऑडिट, वेंटिलेशन सिस्टम, गैस डिटेक्शन और इमरजेंसी एग्ज़िट की ज़रूरत होती है। एक औसत खदान को पर्यटन-योग्य बनाने में करोड़ों रुपये का निवेश लग सकता है।
दुनिया में जहाँ-जहाँ माइन टूरिज्म सफल हुआ है — चाहे पोलैंड की विएलिच्का नमक खदान हो या ऑस्ट्रेलिया की कूबर पीडी ओपल माइन — वहाँ सरकारों ने पहले दशकों तक सुरक्षा अवसंरचना में निवेश किया, फिर पर्यटकों को बुलाया। झारखंड में अभी न तो वैसी अवसंरचना है, न वैसा बजट। राज्य के अपने वित्तीय हालात तंग हैं — हाल ही में 54% कम बारिश के रेड अलर्ट के बीच सूखे और ख़ज़ाने दोनों की चिंता एक साथ सता रही है।
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पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में इस घोषणा को लेकर जो फुसफुसाहट है, वह सीधी है — 'खदान' शब्द हेमंत सोरेन के लिए राजनीतिक रूप से ज़हरीला रहा है। ईडी की गिरफ़्तारी, जमानत, चुनावी मैदान में विपक्ष का 'खदान माफ़िया' का तंज — इन सबके बीच अगर सोरेन खुद खदान को 'पर्यटन' से जोड़ सकें, तो यह एक तरह की नैरेटिव री-फ़्रेमिंग है। ट्रेड हलकों और विपक्षी खेमे में चर्चा है कि यह घोषणा झारखंड में 2024 के बाद के राजनीतिक माहौल में 'डैमेज कंट्रोल' की रणनीति है — खदान के साथ अपराध की बजाय पर्यटन की इमेज जोड़ने की कोशिश। (यह राजनीतिक विश्लेषण और इंडस्ट्री चर्चा पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
बीजेपी के झारखंड प्रदेश नेतृत्व ने पहले से ही इस योजना पर तंज कसना शुरू कर दिया है — हालाँकि इस विशेष घोषणा पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विपक्ष का तर्क सीधा है: जिस सरकार पर खनन नियमन में ही लापरवाही के आरोप हैं, वह खदानों में सैलानियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगी?
रोज़गार का वादा — हक़ीक़त कितनी?
सोरेन सरकार का दावा है कि माइन टूरिज्म से स्थानीय युवाओं को रोज़गार मिलेगा — गाइड, सुरक्षा कर्मी, हॉस्पिटैलिटी। सिद्धांत में यह ठीक लगता है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि झारखंड के आदिवासी इलाक़ों में बंद खदानों के आसपास बुनियादी सड़क, बिजली और पानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। एक खदान को पर्यटन-योग्य बनाने के लिए जिस बजट की दरकार है, उसका अनुमान दसियों करोड़ से शुरू होता है — और यह तब जब खदान संरचनात्मक रूप से सुरक्षित पाई जाए।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि सोरेन की यह घोषणा एक साथ तीन काम कर रही है — खनन के नकारात्मक नैरेटिव को पलटने की कोशिश, आदिवासी वोटबैंक को रोज़गार का संकेत, और राष्ट्रीय स्तर पर 'विज़नरी गवर्नेंस' की छवि बनाने का प्रयास। लेकिन बिना ठोस डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट), बजट आवंटन और सुरक्षा ऑडिट के यह एक और उन शिगूफ़ों की क़तार में खड़ा होगा जो भारतीय राजनीति में चुनाव के मौसम में खिलते हैं और बाद में सूख जाते हैं।
आगे क्या देखना होगा?
अगर सोरेन सरकार सचमुच इस योजना को आगे बढ़ाना चाहती है, तो अगले तीन-छह महीनों में कुछ ठोस क़दम दिखने चाहिए — पहला, DGMS के साथ मिलकर खदानों का सुरक्षा ऑडिट; दूसरा, कम से कम दो-तीन पायलट साइट्स की पहचान और डीपीआर; तीसरा, बजट में स्पष्ट आवंटन। अगर ये क़दम नहीं दिखे, तो यह घोषणा वही साबित होगी जो विपक्ष कह रहा है — बयानबाज़ी। और सबसे बड़ा सवाल तो यह रहेगा: जिस राज्य में खदानों का कामकाज ही विवादों में घिरा रहा हो, वहाँ खदानों में सैलानियों की जान की ज़िम्मेदारी कौन लेगा — वही सरकार जिस पर खनन नियमन में कोताही के आरोप हैं?
यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों के अनुसार हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- हेमंत सोरेन ने बंद और भूमिगत खदानों को पर्यटन स्थल बनाने का निर्देश दिया — लेकिन झारखंड में सुरक्षा अवसंरचना और बजट दोनों की भारी कमी है।
- सोरेन पर खुद अवैध खनन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लग चुके हैं — इसलिए 'माइन टूरिज्म' की घोषणा नैरेटिव री-फ़्रेमिंग की कोशिश भी मानी जा रही है।
- दुनिया में जहाँ माइन टूरिज्म सफल हुआ, वहाँ दशकों के निवेश और सुरक्षा मानक लगे — झारखंड की खदानों में यह अभी शून्य से शुरू होगा।
- अगले 3-6 महीनों में DGMS ऑडिट, पायलट साइट और बजट आवंटन नहीं दिखा तो यह महज़ एक और चुनावी शिगूफा साबित होगा।
आँकड़ों में
- DGMS मानकों के अनुसार बंद भूमिगत खदान में पर्यटकों के प्रवेश से पहले व्यापक संरचनात्मक ऑडिट, वेंटिलेशन, गैस डिटेक्शन और इमरजेंसी एग्ज़िट अनिवार्य हैं।
- हेमंत सोरेन 2024 में खनन-संबंधी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी द्वारा गिरफ़्तार किए गए थे।
- झारखंड में कोयला, अभ्रक, लोहा, बॉक्साइट और यूरेनियम की सैकड़ों बंद खदानें मौजूद हैं।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों को यह निर्देश दिया — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- क्या: बंद और भूमिगत खदानों को पर्यटन स्थलों (माइन टूरिज्म) के रूप में चिह्नित और विकसित करने का आदेश।
- कब: जून 2026 में अधिकारियों के साथ बैठक में — टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार।
- कहाँ: झारखंड, जहाँ कोयला, अभ्रक, लोहा और अन्य खनिजों की सैकड़ों बंद खदानें मौजूद हैं।
- क्यों: रोजगार सृजन, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और झारखंड को पर्यटन मानचित्र पर लाने के उद्देश्य से — सरकारी तर्क के अनुसार।
- कैसे: अधिकारियों को ऐसी खदानों की पहचान करने, सुरक्षा ऑडिट करने और पर्यटन अवसंरचना विकसित करने का निर्देश दिया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
माइन टूरिज्म क्या होता है?
माइन टूरिज्म में बंद या ऐतिहासिक खदानों को सुरक्षित बनाकर पर्यटकों के लिए खोला जाता है — जैसे पोलैंड की विएलिच्का नमक खदान या जर्मनी की रुहर वैली खदानें। इसमें संरचनात्मक सुरक्षा, वेंटिलेशन और इमरजेंसी सिस्टम ज़रूरी होते हैं।
हेमंत सोरेन पर खनन से जुड़े क्या आरोप हैं?
सोरेन पर अवैध खनन से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगा और 2024 में ईडी ने उन्हें गिरफ़्तार किया था। बाद में उन्हें जमानत मिली। मामला न्यायाधीन है।
क्या भारत में कहीं माइन टूरिज्म सफल है?
भारत में अभी माइन टूरिज्म बहुत सीमित है। राजस्थान की कुछ संगमरमर खदानों में छोटे स्तर पर पर्यटन होता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर की कोई सफल भारतीय माइन टूरिज्म साइट अभी तक विकसित नहीं हुई है।
झारखंड की बंद खदानें पर्यटन के लिए कितनी सुरक्षित हैं?
वर्तमान में अधिकांश बंद खदानें असुरक्षित हैं — कई में पानी भरा है, संरचनाएँ जर्जर हैं। DGMS के मानकों के अनुसार पर्यटन से पहले व्यापक सुरक्षा ऑडिट और भारी निवेश ज़रूरी है।