ब्राज़ील ने EVM का सोर्स कोड खोल दिया — भारत के चुनाव आयोग को किस 'सीक्रेट' की रखवाली करनी है?

Singh Anchala

ब्राज़ील के चुनाव आयोग (TSE) ने अपनी EVM का सोर्स कोड सार्वजनिक कर पारदर्शिता का वैश्विक मानक स्थापित किया है। भारत का चुनाव आयोग (ECI) इसे 'सुरक्षा कारणों' से गोपनीय रखता है, लेकिन Frontline Magazine के विश्लेषण के अनुसार यह तर्क तकनीकी रूप से कमज़ोर है।

एक देश अपनी वोटिंग मशीन का दिल — उसका सोर्स कोड — दुनिया के सामने रख देता है और कहता है, 'देख लो, कुछ छिपा नहीं।' दूसरा देश, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है, उसी कोड को तिजोरी में बंद रखकर कहता है, 'हम पर भरोसा करो।' ब्राज़ील ने EVM का सोर्स कोड सार्वजनिक कर दिया है — और इसी एक क़दम ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) के दशकों पुराने 'सुरक्षा' तर्क की चूलें हिला दी हैं।

Frontline Magazine की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार ब्राज़ील के सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट (TSE) ने अपनी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का पूरा सोर्स कोड पब्लिक डोमेन में रख दिया है। इसका मतलब यह है कि कोई भी स्वतंत्र साइबर-सिक्योरिटी विशेषज्ञ, कोई भी विश्वविद्यालय का शोधकर्ता, कोई भी राजनीतिक दल — कोड की हर लाइन पढ़ सकता है, जाँच सकता है, और बता सकता है कि मशीन वही कर रही है जो उसे करना चाहिए। ब्राज़ील का तर्क सीधा है: जब कोड खुला है, तो धांधली का शक़ ही क्यों होगा?

अब इसकी तुलना भारत से करें। भारत का ECI तीन दशकों से EVM के सोर्स कोड को 'स्टेट सीक्रेट' मानता आया है। सुप्रीम कोर्ट में बार-बार याचिकाएँ दायर हुईं, विपक्षी दलों ने VVPAT की 100% गिनती की माँग की, तकनीकी विशेषज्ञों ने स्वतंत्र ऑडिट माँगा — लेकिन ECI का जवाब हर बार एक ही रहा: 'सोर्स कोड खोलने से सुरक्षा ख़तरे में पड़ेगी।'

लेकिन यह तर्क कितना पुख़्ता है? Frontline की रिपोर्ट में साइबर-सिक्योरिटी विशेषज्ञों का हवाला दिया गया है जो कहते हैं कि 'सिक्योरिटी थ्रू ऑब्स्क्योरिटी' — यानी कोड छिपाकर सुरक्षा बनाए रखना — आज की दुनिया में सबसे कमज़ोर सुरक्षा मॉडल माना जाता है। दुनिया के सबसे सुरक्षित सॉफ़्टवेयर सिस्टम — लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम से लेकर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन प्रोटोकॉल तक — ओपन सोर्स हैं। उनकी सुरक्षा इसलिए मज़बूत है क्योंकि हज़ारों आँखें उन्हें लगातार जाँचती हैं, इसलिए नहीं कि वे छिपे हुए हैं।

पॉलिटिकल पल्स

दिल्ली के सियासी गलियारों में इस ब्राज़ीलियन क़दम पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ सुनाई दे रही हैं। विपक्षी हलकों में फुसफुसाहट है कि ब्राज़ील का उदाहरण अब संसद में उठाया जाएगा — 'अगर ब्राज़ील कर सकता है तो भारत क्यों नहीं?' सत्ता पक्ष के क़रीबी सूत्रों का कहना है कि भारत की EVM 'स्टैंडअलोन' मशीन है, इंटरनेट से जुड़ी नहीं, इसलिए तुलना ही ग़लत है। लेकिन ट्रेड विश्लेषकों का मानना है कि यह तर्क सोर्स कोड गोपनीयता को जस्टिफ़ाई नहीं करता — स्टैंडअलोन होना और कोड छिपाना दो अलग चीज़ें हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इस पूरे विवाद में एक और पहलू है जिसे कोई खुलकर नहीं कहता। भारत की EVM का हार्डवेयर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ECIL) बनाती हैं — दोनों सरकारी कंपनियाँ। सोर्स कोड भी इन्हीं के इंजीनियर लिखते हैं। अब सवाल यह है: जब बनाने वाला, जाँचने वाला और चुनाव कराने वाला — तीनों सरकार के ही हिस्से हैं, तो स्वतंत्र ऑडिट का मतलब ही क्या रह जाता है? ब्राज़ील ने इसी समस्या को पहचाना और बाहरी विशेषज्ञों को कोड देखने का अधिकार दिया।

Frontline की रिपोर्ट एक और अहम बात उठाती है: ब्राज़ील में 2022 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद पूर्व राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो के समर्थकों ने EVM में धांधली का आरोप लगाते हुए संसद भवन पर हमला किया — ठीक वैसे जैसे अमेरिका में 6 जनवरी 2021 को हुआ था। इस घटना के बाद TSE ने फ़ैसला किया कि सोर्स कोड की पूरी पारदर्शिता ही ऐसे षड्यंत्र सिद्धांतों का सबसे मज़बूत जवाब है। जब कोड सबके सामने हो, तो 'मशीन हैक हो गई' कहना मुश्किल हो जाता है।

भारत में स्थिति उलटी है। ECI का रुख़ जितना बंद रहता है, उतने ही षड्यंत्र सिद्धांत फलते-फूलते हैं। हर चुनाव के बाद हारने वाला दल EVM पर सवाल उठाता है — कभी BJP ने उठाए, कभी कांग्रेस ने, कभी AAP ने। और ECI हर बार यही कहता है: 'मशीनें टैम्पर-प्रूफ़ हैं।' लेकिन अगर वे सचमुच टैम्पर-प्रूफ़ हैं, तो उनका कोड दिखाने में हर्ज़ क्या है? जो बात इंडिया हेराल्ड की नज़र में सबसे अहम है — ECI की गोपनीयता अब सुरक्षा का कवच नहीं, शक़ का चुंबक बन चुकी है।

सच यह है कि EVM विवाद सिर्फ़ तकनीकी मसला नहीं है — यह गहरे राजनीतिक अविश्वास का लक्षण है। जब जनता को भरोसा नहीं होता कि उसका वोट सही गिना गया, तो लोकतंत्र की नींव कमज़ोर होती है। ब्राज़ील ने यह समझा। उसने पारदर्शिता को ख़तरा नहीं, ताक़त माना। भारत अभी भी इस फ़ैसले से बच रहा है।

आने वाले दिनों में देखने लायक़ यह होगा कि क्या विपक्ष ब्राज़ील मॉडल को संसद में और अदालत में हथियार बनाता है। 2024 के आम चुनाव में सुप्रीम कोर्ट ने VVPAT स्लिप की पूरी गिनती की माँग ठुकरा दी थी — लेकिन अब ब्राज़ील का उदाहरण एक नई याचिका का आधार बन सकता है। अगर कोई तकनीकी विशेषज्ञ सुप्रीम कोर्ट में यह दिखा पाए कि ब्राज़ील का ओपन-सोर्स मॉडल वहाँ की सुरक्षा कमज़ोर नहीं बल्कि मज़बूत हुई है, तो ECI के लिए 'सुरक्षा ख़तरा' वाला तर्क टिकाना मुश्किल होगा।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। जो भी दल सत्ता में होता है, वह EVM व्यवस्था से ख़ुश होता है — क्योंकि जीत उसी मशीन से आई होती है। विपक्ष में जाते ही वही दल सवाल उठाता है। इस दोग़लेपन के चक्र को तोड़ने का एक ही रास्ता है: सोर्स कोड की पारदर्शिता को दलीय राजनीति से ऊपर रखना।

ब्राज़ील ने अपनी EVM का दिल दुनिया को दिखा दिया — और दुनिया ने देखा कि वहाँ कुछ छिपा नहीं। भारत के 140 करोड़ मतदाताओं का सवाल सीधा है: अगर ब्राज़ील को अपनी मशीनों पर इतना भरोसा है कि उसने कोड खोल दिया, तो भारत के चुनाव आयोग को अपनी मशीनों पर भरोसा क्यों नहीं?

AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और सवाल नामित स्रोतों और सार्वजनिक विमर्श पर आधारित हैं; किसी भी न्यायालयीन मामले पर बिना पूर्वाग्रह रिपोर्टिंग की गई है।

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मुख्य बातें

  • ब्राज़ील के TSE ने EVM का पूरा सोर्स कोड सार्वजनिक किया — Frontline Magazine के अनुसार यह वैश्विक चुनावी पारदर्शिता का नया मानक है
  • भारत का ECI 'सिक्योरिटी थ्रू ऑब्स्क्योरिटी' मॉडल पर टिका है जिसे साइबर-सिक्योरिटी विशेषज्ञ सबसे कमज़ोर सुरक्षा मॉडल मानते हैं
  • भारत में EVM का हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर दोनों सरकारी कंपनियाँ BEL और ECIL बनाती हैं — स्वतंत्र ऑडिट की कोई व्यवस्था नहीं
  • ब्राज़ील ने 2023 के संसद हमले के बाद पारदर्शिता को षड्यंत्र सिद्धांतों का सबसे मज़बूत जवाब माना
  • भारत में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों EVM पर सुविधानुसार रुख़ बदलते हैं — यह दोग़लापन पारदर्शिता की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है

आँकड़ों में

  • ब्राज़ील के TSE ने EVM का 100% सोर्स कोड पब्लिक डोमेन में रखा — Frontline Magazine
  • भारत में EVM का हार्डवेयर-सॉफ़्टवेयर दोनों सरकारी कंपनियों BEL और ECIL द्वारा निर्मित — स्वतंत्र बाहरी ऑडिट शून्य
  • भारत में 140 करोड़ से अधिक मतदाता EVM पर निर्भर — दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग इकोसिस्टम

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: ब्राज़ील का सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट (TSE) और भारत का चुनाव आयोग (ECI)
  • क्या: ब्राज़ील ने अपनी EVM का पूरा सोर्स कोड सार्वजनिक कर दिया; भारत अभी भी इसे गोपनीय रखता है
  • कब: 2026 में ब्राज़ील की पहल; भारत में EVM विवाद दशकों पुराना
  • कहाँ: ब्राज़ीलिया, ब्राज़ील और नई दिल्ली, भारत
  • क्यों: ब्राज़ील का मानना है कि ओपन सोर्स कोड से जनता का भरोसा बढ़ता है; भारत का ECI सुरक्षा जोखिम का हवाला देता है
  • कैसे: TSE ने सोर्स कोड को पब्लिक रिपॉज़िटरी में डाला ताकि स्वतंत्र विशेषज्ञ ऑडिट कर सकें; भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ब्राज़ील ने EVM का सोर्स कोड क्यों सार्वजनिक किया?

Frontline Magazine के अनुसार ब्राज़ील के TSE ने 2023 के संसद हमले के बाद फ़ैसला किया कि पूर्ण पारदर्शिता ही चुनावी षड्यंत्र सिद्धांतों का सबसे मज़बूत जवाब है — ताकि कोई भी स्वतंत्र विशेषज्ञ कोड की जाँच कर सके।

भारत का चुनाव आयोग EVM का सोर्स कोड क्यों नहीं खोलता?

ECI का कहना है कि सोर्स कोड सार्वजनिक करने से सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है। लेकिन साइबर-सिक्योरिटी विशेषज्ञों के अनुसार 'सिक्योरिटी थ्रू ऑब्स्क्योरिटी' सबसे कमज़ोर सुरक्षा मॉडल है।

भारत की EVM कौन बनाता है और क्या स्वतंत्र ऑडिट होती है?

भारत की EVM का हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर सरकारी कंपनियाँ BEL और ECIL बनाती हैं। अभी तक किसी स्वतंत्र बाहरी एजेंसी द्वारा सोर्स कोड ऑडिट की कोई सार्वजनिक व्यवस्था नहीं है।

क्या ब्राज़ील मॉडल भारत में लागू हो सकता है?

तकनीकी रूप से कोई बाधा नहीं है। असली बाधा राजनीतिक इच्छाशक्ति है — सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों EVM पर सुविधानुसार रुख़ बदलते हैं।

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