जंतर-मंतर पर 408 घंटे का 'युवा ज्वालामुखी' — क्या धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी BJP का नया टाइम बॉम्ब है?

Singh Anchala

जंतर-मंतर पर 408 घंटों से जारी NEET-NET विरोध प्रदर्शन में छात्र शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा माँग रहे हैं। CJP (कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स) समर्थित यह आंदोलन BJP के युवा वोटबैंक के लिए गंभीर चेतावनी बनता जा रहा है।

चार सौ आठ घंटे। सत्रह दिन। दिल्ली की उमस भरी गर्मी में जंतर-मंतर की सड़क पर बैठे सैकड़ों छात्रों के चेहरे पर न थकान है, न हार — बस वह ज़िद है जो किसी से अपना सपना छिनते देखकर पैदा होती है। NEET और NET की परीक्षा प्रणाली के खिलाफ़ शुरू हुआ यह आंदोलन अब एक नाम पर आकर टिक गया है — शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान। और यही वह मोड़ है जहाँ एक छात्र धरना, सत्ताधारी पार्टी के लिए सियासी सिरदर्द बन जाता है।

CJP (कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स) के समर्थन में चल रहे इस प्रदर्शन की जड़ें 2024 के NEET-UG पेपर लीक कांड में हैं। उस साल लाखों छात्रों की ज़िंदगी रातोंरात अधर में लटक गई थी। NTA (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) की विश्वसनीयता ज़मीन पर आ गिरी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले पर सख्त टिप्पणियाँ कीं। लेकिन दो साल बीत गए — न NTA में वह आमूल-चूल सुधार हुआ जो वादा किया गया था, न किसी बड़े अधिकारी की जवाबदेही तय हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रदर्शनकारी छात्रों का सबसे बड़ा आरोप यही है: सरकार ने NEET-UG कांड को 'मैनेज' तो कर लिया, मगर 'सॉल्व' नहीं किया।

अब सवाल यह है कि 408 घंटे का यह धरना सिर्फ़ एक और विरोध प्रदर्शन है, या यह कुछ बड़ा बता रहा है? इसका जवाब संख्याओं में छिपा है। हर साल NEET में करीब 24 लाख और NET में लाखों छात्र बैठते हैं — इनमें से अधिकांश हिंदी बेल्ट के उन मध्यमवर्गीय परिवारों से आते हैं जो BJP का कोर वोटबैंक माने जाते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के छोटे शहरों में कोचिंग सेंटर्स की गलियों से निकलने वाले ये लाखों युवा जब नाराज़ होते हैं, तो उनका गुस्सा किसी एक पार्टी के 'यूथ आउटरीच' कार्यक्रम से नहीं ठंडा होता।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि धर्मेंद्र प्रधान को लेकर पार्टी के भीतर भी असहजता बढ़ रही है। ट्रेड हलकों में चर्चा यह है कि 2024 के NEET कांड के बाद शिक्षा मंत्रालय में 'कॉस्मेटिक रिशफल' की योजना बनी थी, लेकिन प्रधान के ओडिशा कनेक्शन और पार्टी संगठन में उनकी पैठ ने उन्हें बचा लिया। एक सीनियर भाजपा नेता ने हाल ही में ऑफ-द-रिकॉर्ड कहा था कि 'प्रधान जी की समस्या यह है कि वे शिक्षा को एनर्जी सेक्टर की तरह मैनेज करना चाहते हैं — लेकिन यहाँ हर गड़बड़ का शिकार किसी का बच्चा है।' विपक्षी दलों ने इस आंदोलन को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी — कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता जंतर-मंतर पहुँचकर सेल्फी ले रहे हैं, और सोशल मीडिया पर #ResignDharmendra ट्रेंड करता रहता है।

(यह राजनीतिक गलियारों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

लेकिन विपक्ष की मौकापरस्ती से अलग, इस आंदोलन की असली ताकत वह ऑर्गेनिक गुस्सा है जो किसी पार्टी के झंडे तले नहीं है। जंतर-मंतर पर बैठे छात्र किसी विपक्षी दल का झंडा नहीं उठा रहे — वे अपनी मार्कशीट और एडमिट कार्ड लहरा रहे हैं। यही बात BJP के लिए सबसे ख़तरनाक है। जब गुस्सा 'पार्टी बनाम पार्टी' का हो, तो उसे 'हमारा बनाम उनका' बनाकर मैनेज किया जा सकता है। लेकिन जब गुस्सा 'सिस्टम बनाम स्टूडेंट' का हो, तो सत्ताधारी पार्टी के पास बचने की जगह कम होती है।

इस पूरी कहानी के पीछे की असली चाल को इंडिया हेराल्ड बेबाकी से डिकोड कर रहा है: यह धरना सिर्फ़ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बारे में नहीं है — यह 2014 से 'रोज़गार देंगे, बेहतर शिक्षा देंगे' का वादा सुनकर बड़ी हुई उस पूरी पीढ़ी के मोहभंग का प्रतीक है जो अब मतदान की उम्र में है। 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को पहली बार युवा वोटर्स में गिरावट दिखी थी — कई सर्वेक्षणों ने इसकी पुष्टि की। अगर यह ट्रेंड 2029 तक बना रहा, तो हिंदी बेल्ट की वे सीटें जहाँ युवा मतदाता निर्णायक हैं — कोटा, पटना, लखनऊ, भोपाल जैसे शहरों के आसपास — BJP के लिए कड़ी टक्कर बन सकती हैं।

आने वाले दिनों में देखने लायक यह होगा कि सरकार इस आंदोलन को कैसे 'हैंडल' करती है। तीन रास्ते दिखते हैं: पहला, NTA में कोई बड़ा संरचनात्मक सुधार घोषित करके छात्रों की हवा निकालना; दूसरा, किसी जूनियर मंत्री या अधिकारी की 'बलि' देकर धर्मेंद्र प्रधान को बचाना; तीसरा, धरने को 'इग्नोर' करना और समय का इंतज़ार करना। अगर सरकार तीसरा रास्ता चुनती है — जो अब तक की रणनीति लगती है — तो हर बीतता दिन इस आंदोलन को और वैधता देता जाएगा। 408 घंटे पहले ही एक बड़ी संख्या है; अगर यह 500 पार करता है, तो मीडिया नैरेटिव पूरी तरह बदल जाएगा।

एक बात और है जो कोई खुलकर नहीं कह रहा: NEET-NET का मसला सिर्फ़ पेपर लीक का नहीं है। यह भारत की पूरी प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली के ढाँचागत संकट का लक्षण है — जहाँ लाखों छात्रों का भविष्य एक OMR शीट पर टिका है, जिस शीट की सुरक्षा एक ऐसी एजेंसी के हवाले है जो बार-बार विफल हुई है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा शायद प्रतीकात्मक जीत हो, लेकिन असली सवाल यह है: क्या कोई भी शिक्षा मंत्री बिना NTA को पूरी तरह तोड़कर दोबारा बनाए इस संकट का हल कर सकता है?

जंतर-मंतर पर बैठे उन छात्रों से पूछिए — उनका जवाब साफ़ है: नहीं। और अगर यही जवाब 2029 में EVM पर भी आया, तो BJP की हिंदी बेल्ट की राजनीति को उस गुस्से का हिसाब देना होगा जो आज जंतर-मंतर की सड़क पर उबल रहा है।

आरोप जो यहाँ रिपोर्ट किए गए हैं, नामित स्रोतों से लिए गए हैं और जब तक न्यायालय ने निर्णय नहीं दिया, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • जंतर-मंतर पर 408 घंटों (17 दिनों) से NEET-NET सुधार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर छात्रों का अनिश्चितकालीन धरना जारी है।
  • यह आंदोलन किसी विपक्षी दल के नेतृत्व में नहीं बल्कि ऑर्गेनिक छात्र गुस्से से चल रहा है — जो सत्ताधारी BJP के लिए सबसे ख़तरनाक संकेत है।
  • NEET में हर साल करीब 24 लाख छात्र बैठते हैं — इनमें बड़ी संख्या हिंदी बेल्ट के मध्यमवर्गीय परिवारों से है, जो BJP का कोर वोटबैंक माना जाता है।
  • 2024 लोकसभा चुनाव में BJP को युवा मतदाताओं में गिरावट का सामना करना पड़ा — यह ट्रेंड 2029 तक जारी रहा तो हिंदी बेल्ट की निर्णायक सीटों पर असर पड़ सकता है।
  • सरकार के पास तीन विकल्प हैं: NTA में बड़ा सुधार, किसी जूनियर की बलि, या इग्नोर — तीसरा विकल्प हर बीतते दिन आंदोलन को और मज़बूत करेगा।

आँकड़ों में

  • जंतर-मंतर पर 408 घंटों (17+ दिनों) से अनिश्चितकालीन धरना जारी — CJP समर्थित छात्र आंदोलन।
  • NEET-UG में हर साल लगभग 24 लाख छात्र परीक्षा देते हैं — अधिकांश हिंदी बेल्ट के मध्यमवर्गीय परिवारों से।
  • 2024 लोकसभा चुनाव में BJP को युवा वोटर सेगमेंट में पहली बार उल्लेखनीय गिरावट दिखी — विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: NEET-NET परीक्षा पीड़ित छात्र और CJP (कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स) — प्रदर्शन का समर्थन करने वाला नागरिक अधिकार संगठन।
  • क्या: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और NTA में आमूल सुधार की माँग को लेकर 408 घंटों से अधिक समय से अनिश्चितकालीन धरना जारी है।
  • कब: जुलाई 2026 तक — 17 दिनों से लगातार जारी, रिपोर्ट्स के अनुसार।
  • कहाँ: जंतर-मंतर, नई दिल्ली — देश का प्रतिष्ठित विरोध-प्रदर्शन स्थल।
  • क्यों: NEET-UG 2024 पेपर लीक कांड के बाद NTA की विश्वसनीयता पर गहरे सवाल, बार-बार परीक्षा रद्द होना, और सरकार द्वारा ठोस जवाबदेही से बचने का आरोप।
  • कैसे: CJP समर्थन में छात्रों ने जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया; सोशल मीडिया पर #ResignDharmendra जैसे अभियान और विपक्षी दलों के दौरे से आंदोलन को राजनीतिक गति मिल रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जंतर-मंतर पर NEET-NET विरोध प्रदर्शन कब से चल रहा है?

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह आंदोलन 408 घंटों यानी लगभग 17 दिनों से जारी है। CJP (कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स) के समर्थन में छात्र शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और NTA सुधार की माँग कर रहे हैं।

छात्र धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों माँग रहे हैं?

2024 के NEET-UG पेपर लीक कांड के बाद NTA की विश्वसनीयता गिर गई। छात्रों का आरोप है कि शिक्षा मंत्री के नेतृत्व में दो साल बाद भी न आमूल सुधार हुआ, न किसी बड़े अधिकारी की जवाबदेही तय हुई।

क्या यह आंदोलन BJP के वोटबैंक को प्रभावित कर सकता है?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, NEET के 24 लाख से अधिक परीक्षार्थी बड़े पैमाने पर हिंदी बेल्ट के मध्यमवर्गीय परिवारों से आते हैं — जो BJP का पारंपरिक कोर वोटबैंक माना जाता है। 2024 में युवा मतदाताओं में गिरावट का ट्रेंड पहले ही दिखा था।

सरकार इस आंदोलन पर क्या कदम उठा सकती है?

तीन संभावित रास्ते दिखते हैं: NTA में बड़ा संरचनात्मक सुधार, किसी जूनियर मंत्री/अधिकारी की जवाबदेही तय करना, या धरने को नज़रअंदाज़ करना। विश्लेषकों का मानना है कि तीसरा विकल्प आंदोलन को और मज़बूत करेगा।

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