भारतीय पासपोर्ट 125वें पायदान पर — 'विश्वगुरु' का नागरिक दुनिया में कितना बेबस?
ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत फिसलकर 125वें स्थान पर आ गया है जबकि स्वीडन ने पहला स्थान हासिल किया। भारतीय पासपोर्ट से मात्र 58 देशों में वीज़ा-फ्री या ऑन-अराइवल एंट्री मिलती है — यह 'विश्वगुरु' की आकांक्षा और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई को बेरहमी से उजागर करता है।
एक तरफ़ संसद में 'विश्वगुरु' का नारा गूँजता है, दूसरी तरफ़ लखनऊ के पासपोर्ट ऑफ़िस के बाहर एक इंजीनियरिंग ग्रैजुएट सुबह पाँच बजे से लाइन में खड़ा है — सिर्फ़ इसलिए कि उसे दुबई जाने के लिए भी वीज़ा अपॉइंटमेंट नहीं मिल रहा। ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 ने जो नंबर दिए हैं, वे इस तस्वीर को और भी बेरहमी से पेश करते हैं: भारतीय पासपोर्ट 125वें पायदान पर फिसल गया है, जबकि स्वीडन ने पहला स्थान हासिल किया।
इंडियन एक्सप्रेस और न्यूज़18 की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारतीय पासपोर्ट-धारकों को दुनिया के मात्र 58 देशों में वीज़ा-फ्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल एंट्री मिलती है। तुलना कीजिए — स्वीडिश पासपोर्ट से 192 देशों के दरवाज़े बिना वीज़ा खुलते हैं। फ़र्क़ 134 देशों का है। ज़ी न्यूज़ हिंदी के अनुसार, टॉप-10 में लगभग सभी यूरोपीय देश हैं — जर्मनी, फ़िनलैंड, फ़्रांस, इटली, नीदरलैंड्स — और एशिया से जापान और सिंगापुर ने जगह बनाई है।
अब सवाल यह है कि जो सरकार G20 की अध्यक्षता करती है, जिसके प्रधानमंत्री हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर गले मिलते दिखते हैं, उसके नागरिक की 'ग्लोबल इज़्ज़त' गिर क्यों रही है?
पासपोर्ट पावर का असली गणित
पासपोर्ट रैंकिंग कोई सम्मान का सर्टिफ़िकेट नहीं — यह ठोस कूटनीतिक पारस्परिकता का आईना है। जब भारत किसी देश को वीज़ा-फ्री एंट्री देता है, तो उम्मीद होती है कि वह देश भी बदले में यही सुविधा दे। लेकिन भारत की जनसंख्या, प्रति-व्यक्ति आय और इमिग्रेशन-रिस्क प्रोफ़ाइल के चलते ज़्यादातर विकसित देश यह रिस्क लेने को तैयार नहीं होते। न्यूज़18 की रिपोर्ट बताती है कि भारत ने पिछले कुछ सालों में कई देशों के साथ वीज़ा-सरलीकरण पर बात की, लेकिन ज़मीन पर नतीजे सीमित रहे।
इंडियन एक्सप्रेस ने एक अलग रिपोर्ट में बताया कि 'दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों' की 2026 की सूची में भारत 16वें स्थान पर है — यानी 'प्रभाव' और 'पासपोर्ट पावर' के बीच 109 पायदानों की खाई है। यह अंतर ही असली कहानी है: भारत भू-राजनीतिक शक्ति तो बढ़ा रहा है, लेकिन वह ताक़त उसके आम नागरिक की ज़िंदगी तक पहुँच नहीं रही।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में इस रैंकिंग पर चर्चा दो तरह से हो रही है। सत्ता पक्ष के क़रीबी सूत्रों का कहना है कि पासपोर्ट इंडेक्स "पश्चिमी फ़्रेमवर्क" है जो अमीर देशों को ऊपर रखने के लिए बना है — भारत का ई-वीज़ा प्रोग्राम और यूपीआई जैसे डिजिटल इन्फ़्रास्ट्रक्चर की गिनती इसमें नहीं होती। दूसरी तरफ़ विपक्षी हलकों में यह रैंकिंग "जुमलों बनाम हक़ीक़त" वाली बहस का ताज़ा हथियार बन रही है — ख़ासकर 2024 के बाद जब सरकार ने कनाडा के साथ कूटनीतिक तनाव के दौरान वीज़ा प्रक्रिया और कड़ी की थी।
(यह सियासी हलकों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
हिंदी बेल्ट के उस मिडिल-क्लास युवा से पूछिए जो गल्फ़ में नौकरी के लिए, कनाडा में पीआर के लिए, या यूरोप में मास्टर्स के लिए लाइन में खड़ा है — उसके लिए पासपोर्ट रैंकिंग कोई एकेडमिक बहस नहीं, रोज़मर्रा की तक़लीफ़ है। वीज़ा रिजेक्शन का ख़ौफ़, एम्बेसी अपॉइंटमेंट के लिए महीनों का इंतज़ार, और हज़ारों रुपये की फ़ीस — यही उसकी हक़ीक़त है।
मोदी सरकार के दावे बनाम नंबर
सरकार कहती है कि भारतीय पासपोर्ट अब 36 घंटे में बनता है, चिप-आधारित ई-पासपोर्ट रोलआउट हो रहा है, और विदेश मंत्रालय ने कई देशों के साथ वीज़ा-सरलीकरण एमओयू किए हैं। लेकिन ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, पासपोर्ट बनने की स्पीड और पासपोर्ट की 'पावर' दो बिलकुल अलग चीज़ें हैं — स्पीड घरेलू प्रशासनिक सुधार है, पावर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक सौदेबाज़ी का नतीजा।
इसे ऐसे समझिए: आप एक शानदार गाड़ी बना सकते हैं, लेकिन अगर दूसरे देशों की सड़कें आपकी गाड़ी के लिए बंद हैं, तो गाड़ी की स्पीड का क्या मतलब? असली सवाल यह है कि क्या विदेश नीति में पासपोर्ट पारस्परिकता को उतनी ही प्राथमिकता मिलती है जितनी रक्षा सौदों या व्यापार समझौतों को?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि इस रैंकिंग के पीछे सिर्फ़ कूटनीति नहीं, एक गहरा संरचनात्मक मसला है — भारत की विशाल जनसंख्या और अपेक्षाकृत कम प्रति-व्यक्ति आय के चलते विकसित देश हमेशा 'ओवरस्टे रिस्क' को ध्यान में रखते हैं। जब तक भारत की प्रति-व्यक्ति आय और मानव विकास सूचकांक में नाटकीय सुधार नहीं होता, कूटनीतिक मुस्कुराहटें अकेले रैंकिंग नहीं बदलेंगी।
आगे क्या — दरवाज़ा खुलेगा या और तंग होगा?
आने वाले महीनों में दो बातें देखने लायक़ हैं। पहला, भारत-यूके और भारत-यूरोपीय संघ के बीच चल रहे फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट की बातचीत में 'मोबिलिटी क्लॉज़' शामिल है — अगर यह सफल होता है तो कम-से-कम कुछ यूरोपीय देशों में वीज़ा प्रक्रिया आसान हो सकती है। दूसरा, 2027 में भारत में आम चुनाव से पहले सरकार कुछ 'शोपीस' वीज़ा-फ्री समझौते कर सकती है — जैसे कि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों या कैरेबियन देशों के साथ — ताकि रैंकिंग में दो-चार पायदान की सुधार दिखाई जा सके।
लेकिन असली बदलाव तभी होगा जब भारत की इकनॉमिक प्रोफ़ाइल बदले — जब कोई कनाडा या जर्मनी यह भरोसा कर सके कि भारत से आने वाला यात्री लौटेगा, क्योंकि उसके पास लौटने की वजह है।
125वें पायदान का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि दुनिया भारतीय पासपोर्ट को कमज़ोर मानती है — इसका मतलब यह है कि दुनिया अभी भी भारतीय नागरिक को 'रिस्क' के ख़ाने में रखती है। और यह वह सवाल है जिसका जवाब प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नहीं, रोज़गार, आय और विकास के ठोस आँकड़ों में छिपा है। जब तक 'विश्वगुरु' की गूँज पासपोर्ट काउंटर पर नहीं पहुँचती, तब तक वह लखनऊ वाला लड़का सुबह पाँच बजे लाइन में खड़ा रहेगा।
इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप नामित स्रोतों से लिए गए हैं और जब तक कोर्ट ने फ़ैसला नहीं दिया, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- भारतीय पासपोर्ट ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में 125वें स्थान पर — सिर्फ़ 58 देशों में वीज़ा-फ्री एक्सेस; स्वीडन 192 देशों के साथ नंबर-1
- भारत 'प्रभावशाली देशों' की सूची में 16वां लेकिन पासपोर्ट में 125वां — प्रभाव और नागरिक स्वतंत्रता के बीच 109 पायदानों की खाई
- पासपोर्ट बनने की स्पीड बढ़ी है लेकिन 'पावर' नहीं — असली बदलाव प्रति-व्यक्ति आय और कूटनीतिक पारस्परिकता से आएगा
- 2027 चुनाव से पहले सरकार कुछ छोटे वीज़ा-फ्री समझौते कर सकती है, लेकिन बड़ा सुधार संरचनात्मक आर्थिक बदलाव पर निर्भर
आँकड़ों में
- भारतीय पासपोर्ट: 58 देशों में वीज़ा-फ्री/ऑन-अराइवल एक्सेस; स्वीडिश पासपोर्ट: 192 देशों में — अंतर 134 देशों का (ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026)
- भारत प्रभावशाली देशों में 16वां लेकिन पासपोर्ट पावर में 125वां — 109 पायदानों का फ़ासला (इंडियन एक्सप्रेस)
- टॉप-10 में लगभग सभी यूरोपीय देश — जापान और सिंगापुर एशिया से अकेले प्रतिनिधि (ज़ी न्यूज़ हिंदी)
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत और उसके 140 करोड़ पासपोर्ट-धारक नागरिक, बनाम स्वीडन जो इंडेक्स में टॉप पर है।
- क्या: ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत 125वें स्थान पर फिसल गया; स्वीडन पहले और यूरोपीय देशों ने टॉप-10 पर कब्ज़ा किया।
- कब: 2026 की ताज़ा रैंकिंग, जून 2026 में जारी।
- कहाँ: वैश्विक — रैंकिंग 199 देशों के पासपोर्ट की वीज़ा-फ्री एक्सेस पर आधारित है।
- क्यों: सीमित वीज़ा-फ्री एक्सेस (मात्र 58 देश), कूटनीतिक समझौतों में पारस्परिकता की कमी, और विकसित देशों द्वारा भारतीय पासपोर्ट को उच्च इमिग्रेशन-रिस्क श्रेणी में रखना।
- कैसे: इंडेक्स हर पासपोर्ट को वीज़ा-फ्री, वीज़ा-ऑन-अराइवल और ई-वीज़ा एक्सेस के आधार पर स्कोर देता है — भारत का स्कोर कम रहने से रैंक गिरी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत 125वें स्थान पर है। भारतीय पासपोर्ट से मात्र 58 देशों में वीज़ा-फ्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल एंट्री मिलती है।
ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में नंबर-1 कौन सा देश है?
स्वीडन ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में पहले स्थान पर है, जिसके पासपोर्ट से 192 देशों में वीज़ा-फ्री एक्सेस मिलती है। टॉप-10 में ज़्यादातर यूरोपीय देश हैं।
भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग क्यों गिर रही है?
मुख्य कारण हैं: सीमित वीज़ा-फ्री पारस्परिकता समझौते, विकसित देशों द्वारा भारतीय नागरिकों को उच्च इमिग्रेशन-रिस्क श्रेणी में रखना, और भारत की कम प्रति-व्यक्ति आय जिससे 'ओवरस्टे रिस्क' की धारणा बनती है।
क्या भारत की पासपोर्ट रैंकिंग सुधर सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि असली सुधार प्रति-व्यक्ति आय बढ़ने और कूटनीतिक पारस्परिकता समझौतों से होगा। भारत-यूके और भारत-ईयू फ़्री ट्रेड वार्ता में मोबिलिटी क्लॉज़ एक सकारात्मक क़दम हो सकता है।