8 साल, 5 DM, 3 MLA — भकुना का पुल आज भी नहीं बना, गांववाले ट्रॉली पर जान दांव पर लगाते हैं... ज़िम्मेदार कौन?
उत्तराखंड के भकुना गाँव का पुल 2017 में बह गया था। आठ साल, पाँच DM और तीन MLA बदलने के बावजूद पुल नहीं बना। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, गांववाले रोज़ाना लोहे की ट्रॉली पर नदी पार कर जान जोखिम में डालते हैं — यह 'विकास' के दावों की सबसे शर्मनाक पोल है।
एक ट्रॉली। लोहे की, जंग लगी, नदी के ऊपर तार पर लटकती हुई। उस पर एक बूढ़ी अम्मा, एक स्कूल जाता बच्चा, कभी-कभी एक गर्भवती औरत। नीचे उफनती नदी। यह किसी फ़िल्म का दृश्य नहीं — यह 2026 के भारत का रोज़मर्रा है, उत्तराखंड के भकुना गाँव में। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि 2017 में बाढ़ में बहे इस पुल के पुनर्निर्माण का इंतज़ार आठ साल बाद भी ख़त्म नहीं हुआ। इस बीच पाँच ज़िलाधिकारी बदले, तीन विधायक आए-गए, बजट आवंटित हुए — पर ज़मीन पर एक ईंट नहीं रखी गई।
सोचिए — एक देश जो चंद्रयान भेजता है, एक्सप्रेसवे का जाल बिछाता है, उसमें एक गाँव के लोग हर सुबह अपनी जान दांव पर लगाकर नदी पार करते हैं सिर्फ़ इसलिए कि उनका पुल बनाने की किसी को फ़ुरसत नहीं। भकुना सिर्फ़ एक पुल की कहानी नहीं है — यह उस पूरे तंत्र की सड़न की कहानी है जहाँ 'विकास' प्रेस कॉन्फ्रेंस में होता है, गाँव की पगडंडी पर नहीं।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, भकुना गाँव के ग्रामीणों ने बार-बार प्रशासन से गुहार लगाई। ज्ञापन दिए, धरने दिए, चुनाव से पहले नेताओं ने आश्वासन दिए। लेकिन हर बार वही कहानी दोहराई गई — DM बदला, फ़ाइल अटकी, टेंडर रद्द हुआ, सर्वे फिर से, नया DPR (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बनाओ। आठ साल में पाँच ज़िलाधिकारी — यानी हर डेढ़ साल में एक ट्रांसफ़र। कोई भी इतना नहीं टिका कि पुल की परियोजना को ज़मीन पर उतार सके। तीन विधायक बदले — हर एक ने उद्घाटन तो नहीं किया, शिलान्यास का फ़ोटो-ऑप तक नसीब नहीं हुआ। बजट आवंटन के कागज़ात ज़रूर बने, पर पैसा या तो लैप्स हुआ या रास्ता भटक गया।
ट्रॉली — जुगाड़ नहीं, मजबूरी का शर्मनाक स्मारक
गांववालों ने अपनी जान बचाने के लिए ख़ुद ट्रॉली बनाई — लोहे का एक प्लेटफ़ॉर्म, नदी के दोनों तरफ़ खंभों पर बँधे तार, और हाथ की ताक़त से खींचकर पार होना। बारिश के दिनों में नदी उफनती है, तार भीगते हैं, ट्रॉली फिसलती है। बच्चे स्कूल जाते हैं इस पर, बीमार अस्पताल पहुँचते हैं इस पर, बुज़ुर्ग बाज़ार जाते हैं इस पर। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में ग्रामीणों का दर्द साफ़ झलकता है — किसी ने कहा कि 'हमने वोट दिया, टैक्स दिया, पर बदले में सरकार ने क्या दिया? एक ट्रॉली पर मरने का न्योता।'
भारत सरकार का प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) का लक्ष्य हर गाँव को पक्की सड़क और पुल से जोड़ना है। उत्तराखंड सरकार के अपने आपदा पुनर्निर्माण कोष हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़ हर साल पहाड़ी राज्यों में पुल निर्माण के लिए सैकड़ों करोड़ आवंटित होते हैं। तो भकुना का नंबर क्यों नहीं आया? क्योंकि भकुना न तो किसी बड़े नेता का गाँव है, न किसी चुनावी 'स्विंग' में आता है। यह उत्तराखंड के उन दर्जनों गाँवों में से एक है जहाँ मतदाता संख्या इतनी कम है कि कोई पार्टी इसे 'प्रायोरिटी' नहीं मानती।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि भकुना जैसे इलाकों में पुल इसलिए नहीं बनते क्योंकि इनमें वोट-बैंक का गणित फिट नहीं बैठता। ट्रेड और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पहाड़ी ज़िलों में बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट उन्हीं जगहों पर तेज़ी से बनते हैं जहाँ या तो टूरिज़्म रेवेन्यू है या बड़े नेता का दबाव। बाक़ी गाँव फ़ाइलों में दबे रहते हैं। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के हवाले से हलकों में बात चलती है कि 'DM बदलते हैं तो नया अफ़सर पुरानी फ़ाइल को प्राथमिकता में नहीं रखता — उसकी अपनी नई योजनाएँ होती हैं।' यह 'इंस्टीट्यूशनल एम्नीशिया' है — संस्थागत भूलने की बीमारी — जिसमें फ़ाइल ज़िंदा रहती है, पर ज़िम्मेदारी मर जाती है।
(यह खंड सियासी हलकों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भकुना सिर्फ़ भकुना नहीं — यह पैटर्न है
भकुना अकेला नहीं है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, और यहाँ तक कि बिहार-झारखंड के दूरदराज़ इलाकों में ऐसे दर्जनों पुल सालों से 'निर्माणाधीन' या 'प्रस्तावित' हैं। PMGSY के अपने आँकड़े बताते हैं कि पहाड़ी राज्यों में पुल निर्माण की औसत देरी मैदानी राज्यों से कहीं ज़्यादा है। इसकी वजह सिर्फ़ भूगोल नहीं — नौकरशाही का ढाँचा ऐसा है कि दूरदराज़ गाँवों की परियोजना 'लो विज़िबिलिटी' मानी जाती है, यानी उससे न मीडिया कवरेज मिलता है, न राजनीतिक फ़ायदा।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि भकुना जैसे मामले तभी तेज़ी पकड़ते हैं जब सोशल मीडिया पर वायरल हों या कोई बड़ा हादसा हो जाए। यह भारतीय शासन-व्यवस्था की सबसे ख़तरनाक विफलता है — जवाबदेही सिर्फ़ शर्मिंदगी से आती है, व्यवस्था से नहीं। अगर कल भकुना की ट्रॉली टूट गई और कोई जान गई, तो 48 घंटे में पुल का टेंडर निकल आएगा — तो सवाल यह है कि वह टेंडर आज क्यों नहीं निकल सकता?
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आगे क्या होगा — वह सवाल जो सरकार से पूछना ज़रूरी है
2027 में उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव हैं। भकुना का पुल अब सोशल मीडिया पर चर्चा में आ रहा है। अगर विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया — और बनाने की पूरी संभावना है — तो सत्तारूढ़ दल के लिए यह शर्मिंदगी का कारण बनेगा। देखना यह है कि क्या यह दबाव प्रशासन को हरकत में ला पाता है, या फिर एक और DM बदलेगा, एक और फ़ाइल नए सिरे से खुलेगी, और भकुना के लोग फिर उसी जंग लगी ट्रॉली पर अपनी जान लटकाकर नदी पार करेंगे। आठ साल में पुल न बनना सिर्फ़ लापरवाही नहीं — यह एक तरह का संस्थागत अपराध है। और सबसे बड़ा सवाल यही है — इसकी सज़ा किसे मिलेगी?
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मुख्य बातें
- भकुना गाँव का पुल 2017 में बहा — 8 साल, 5 DM, 3 MLA बदले, पर पुनर्निर्माण ज़ीरो (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- गांववाले रोज़ाना लोहे की ट्रॉली पर जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं — बच्चे, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ शामिल।
- DM ट्रांसफ़र, टेंडर रद्द, फ़ाइलें लैप्स — यह 'इंस्टीट्यूशनल एम्नीशिया' का क्लासिक उदाहरण है।
- PMGSY जैसी योजनाओं के बावजूद पहाड़ी गाँवों में पुल निर्माण की देरी मैदानी इलाकों से कहीं ज़्यादा है।
- 2027 उत्तराखंड चुनाव से पहले यह मुद्दा सोशल मीडिया से सियासी दबाव बना सकता है।
आँकड़ों में
- भकुना पुल 8 साल (2017-2026) से बहा हुआ है और पुनर्निर्माण शून्य है — इस दौरान 5 DM और 3 MLA बदले (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- PMGSY के तहत पहाड़ी राज्यों में पुल निर्माण की औसत देरी मैदानी राज्यों से काफ़ी अधिक है (केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के आँकड़े)।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: उत्तराखंड के भकुना गाँव के सैकड़ों ग्रामीण, जो पुल टूटने के बाद से ट्रॉली पर नदी पार करने को मजबूर हैं (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- क्या: 2017 में बाढ़ में बहे भकुना पुल का पुनर्निर्माण आठ साल बाद भी नहीं हो सका — ग्रामीण लोहे की ट्रॉली से जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- कब: पुल 2017 में बहा; 2026 तक — यानी आठ साल बाद — पुनर्निर्माण अधूरा है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- कहाँ: भकुना गाँव, उत्तराखंड (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
- क्यों: बदलते अधिकारी, अटकते टेंडर, फ़ाइलों की धीमी रफ़्तार और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी — इन सबके चलते पुल बनने की बजाय बस 'एजेंडे' में रहा (टाइम्स ऑफ़ इंडिया के विश्लेषण पर आधारित)।
- कैसे: हर नए DM और MLA के साथ फ़ाइल नए सिरे से शुरू होती रही, टेंडर रद्द हुए, और पुल की परियोजना नौकरशाही के चक्रव्यूह में फँसी रही — इस बीच गांववालों ने ख़ुद लोहे की ट्रॉली का जुगाड़ बनाया (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भकुना का पुल कब और कैसे टूटा?
भकुना गाँव (उत्तराखंड) का पुल 2017 में बाढ़ में बह गया था। तब से आठ साल बीत चुके हैं और पुनर्निर्माण नहीं हुआ (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
भकुना के गांववाले नदी कैसे पार करते हैं?
गांववालों ने ख़ुद लोहे की ट्रॉली बनाई है जो तार पर लटककर नदी पार कराती है — इस पर बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार लोग जान जोखिम में डालकर आते-जाते हैं (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
पुल क्यों नहीं बना — क्या कारण है?
8 साल में 5 DM और 3 MLA बदले, हर बार फ़ाइल नए सिरे से शुरू हुई, टेंडर रद्द हुए, बजट लैप्स हुआ — यह नौकरशाही की 'संस्थागत भूलने की बीमारी' और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का नतीजा है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट पर आधारित विश्लेषण)।
क्या भकुना का पुल अब बनेगा?
2027 उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले सोशल मीडिया दबाव और मीडिया कवरेज से प्रशासन पर दबाव बन सकता है — लेकिन अभी तक कोई ठोस समयसीमा सार्वजनिक नहीं हुई है।