क्वेटा में 'असीम मुनीर मुर्दाबाद' की गूंज — क्या पाक सेना अपनी ही अवाम से जंग हार रही है?
बलूचिस्तान के ज़ियारत में विद्रोहियों के घात हमले में मारे गए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने क्वेटा में शवों को सड़क पर रखकर 'असीम मुनीर मुर्दाबाद' के नारे लगाए। News18 के अनुसार, यह विरोध पाक सेना प्रमुख के खिलाफ खुला जनाक्रोश दर्शाता है जो बलूचिस्तान में बढ़ती असुरक्षा और सैन्य विफलता की गहरी दरार उजागर करता है।
जब किसी देश में फ़ौज के सबसे बड़े जनरल का नाम लोग सड़क पर चीखकर कोसने लगें — और वह भी उन्हीं लोगों के मुँह से जिनके बेटों ने उसी फ़ौज की सरपरस्ती में वर्दी पहनी थी — तो समझ लीजिए कि खाई अब पाटने लायक नहीं रही। क्वेटा में 'असीम मुनीर मुर्दाबाद' की गूँज सिर्फ एक हमले का रिएक्शन नहीं है। यह उस पूरे ढाँचे का मातम है जिसने बलूचिस्तान को दशकों से एक खुले ज़ख्म की तरह रिसता छोड़ दिया।
News18 की रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान के ज़ियारत ज़िले में विद्रोहियों ने पुलिस काफिले पर घात लगाकर हमला किया जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद जो हुआ वह पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान के लिए शायद हमले से भी ज़्यादा करारा झटका था — मारे गए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने उनके शवों को क्वेटा की सड़कों पर रख दिया और खुलेआम पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर के खिलाफ नारे लगाए। यह नज़ारा अभूतपूर्व था — वर्दीधारियों के अपने परिवार ही उस फ़ौजी तंत्र को कठघरे में खड़ा कर रहे थे जिसकी छतरी तले वे ड्यूटी पर गए और ताबूत में लौटे।
ज़रा सोचिए — पाकिस्तान वह देश है जहाँ फ़ौज के ख़िलाफ़ बोलना अक्सर 'लापता' हो जाने का पर्याय रहा है। जहाँ आर्मी चीफ का नाम लेना ही हिम्मत माना जाता था, वहाँ सड़क पर शव रखकर 'मुर्दाबाद' चीखना — यह गुस्सा उस हद को पार कर चुका है जहाँ से लोग नतीजों की परवाह करना छोड़ देते हैं।
बलूचिस्तान: सेना का सबसे पुराना और सबसे अनसुलझा ज़ख्म
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे उपेक्षित सूबा है — क्षेत्रफल में लगभग 44% हिस्सा, लेकिन विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य में सबसे पीछे। दशकों से यहाँ बलूच राष्ट्रवादी विद्रोह सुलग रहा है, और पाक फ़ौज ने हमेशा इसका जवाब सैन्य ऑपरेशनों, 'लापता व्यक्तियों' और बल से दिया है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और अन्य सशस्त्र गुट लगातार हमले तेज़ करते रहे हैं। 2024 में पाक सरकार ने 'ऑपरेशन अज़्म-ए-इस्तेहकाम' शुरू किया था — बड़े-बड़े दावों के साथ कि यह बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा में आतंकवाद का अंतिम समाधान होगा। लेकिन ज़ियारत जैसे हमले बता रहे हैं कि यह ऑपरेशन कागज़ी शेर से ज़्यादा कुछ साबित नहीं हुआ।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों और विश्लेषकों के बीच जो बात सबसे ज़्यादा घूम रही है वह यह है: जनरल असीम मुनीर का नाम सीधे लिया जाना — यह बलूचिस्तान की राजनीतिक और जातीय फॉल्टलाइन का व्यक्तिकरण है। ट्रेड एनालिस्ट्स और पाकिस्तान विशेषज्ञों के बीच चर्चा है कि अगर पुलिसकर्मियों के अपने ही परिवार सड़क पर उतर आएँ, तो आम बलूच आबादी का मूड क्या होगा — यह सवाल रावलपिंडी (GHQ) की नींद उड़ाने के लिए काफी है। फ़ैन्स — यानी इस मामले में पाकिस्तानी सोशल मीडिया यूज़र्स — भी बँटे हुए हैं: एक तरफ़ वे जो 'सेना पर हमला राष्ट्र पर हमला' मानते हैं, दूसरी तरफ़ वे जो कह रहे हैं कि 'सेना खुद अपने लोगों पर हमला कर रही है।' (यह इंडस्ट्री और सोशल मीडिया चर्चा पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह प्रदर्शन पाकिस्तान की 'सिविल-मिलिट्री' खाई के एक नए चरण का संकेत है। पहले यह खाई राजनीतिक दलों — पीपीपी, पीएमएल-एन, पीटीआई — और फ़ौज के बीच थी। अब यह खाई सीधे अवाम और फ़ौज के बीच खुल गई है, और वह भी उस सूबे में जहाँ फ़ौज का ऑपरेशनल कंट्रोल सबसे कड़ा माना जाता था। जब वर्दीधारियों के अपने परिवार फ़ौज के ख़िलाफ़ सड़क पर आ जाएँ, तो यह सिर्फ सुरक्षा विफलता नहीं — यह वैधता का संकट है।
असीम मुनीर: सबसे शक्तिशाली, सबसे विवादित
जनरल असीम मुनीर पाकिस्तान के शायद सबसे ताक़तवर आर्मी चीफ हैं — 2022 में नियुक्ति के बाद से उन्होंने पीटीआई पर शिकंजा कसा, मई 2023 के दंगों के बाद सैन्य अदालतों में नागरिकों पर मुकदमे चलवाए, और राजनीतिक मैदान पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दोनों तरह से दख़ल दिया। लेकिन बलूचिस्तान उनकी अकिलीज़ हील बनता जा रहा है। ज़ियारत, ग्वादर, तुर्बत — हर कुछ हफ़्तों में एक नया हमला, और हर बार सेना का वही रटा-रटाया बयान: 'दुश्मन को मुँहतोड़ जवाब दिया जाएगा।' लेकिन शव सड़कों पर हैं और जवाब कहीं नज़र नहीं आता।
यहाँ एक और बात ग़ौर करने लायक है। पाकिस्तान में आर्मी चीफ का नाम लेकर विरोध करना — यह इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई के समर्थकों ने 9 मई 2023 के बाद शुरू किया था। लेकिन तब वह शहरी मध्यवर्ग का राजनीतिक गुस्सा था। अब वही नारा बलूचिस्तान की धूल भरी सड़कों पर, शहीद पुलिसवालों के ताबूतों के बीच गूँज रहा है — यह गुणात्मक रूप से एक अलग किस्म का विद्रोह है।
भारत के लिए क्या मायने?
भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों के लिए यह परिदृश्य दोधारी है। एक ओर, पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता का मतलब है कि उसकी सैन्य ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा अपने ही घर में खप रहा है — जो LAC और LOC पर भारत के लिए तात्कालिक दबाव कम करता है। दूसरी ओर, एक अस्थिर, परमाणु-संपन्न पड़ोसी जिसकी फ़ौज पर उसकी अपनी जनता का भरोसा टूट रहा हो — यह किसी के लिए भी अच्छी ख़बर नहीं है। बलूचिस्तान में चीन का CPEC इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से निशाने पर है; अगर यह अस्थिरता और बढ़ी, तो ग्वादर पोर्ट और उससे जुड़ी भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात हिल सकती है।
आने वाले दिनों में देखने लायक बात यह है: क्या पाक सेना इस तरह के विरोध को दबाने के लिए अपना पुराना हथकंडा — ज़्यादा बल, ज़्यादा ऑपरेशन, ज़्यादा 'लापता' लोग — अपनाती है, या कोई राजनीतिक रास्ता खोजती है? इतिहास गवाह है कि रावलपिंडी ने हमेशा पहला विकल्प चुना है। लेकिन हर बार बल का इस्तेमाल करके उन्होंने विद्रोह को दबाया नहीं, और गहरा किया है। अगर क्वेटा की सड़कों पर गूँजे ये नारे जनरल मुनीर के कानों तक पहुँचकर सिर्फ और ज़्यादा ऑपरेशन लेकर आए, तो बलूचिस्तान का अगला अध्याय और ख़ूनी होगा।
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और सबसे बड़ा सवाल जो पाकिस्तान को खुद से पूछना चाहिए: जब आपकी अपनी पुलिस के परिवार आपके जनरल को 'मुर्दाबाद' कहें, तो आप किससे लड़ रहे हैं — दुश्मन से, या अपने ही लोगों से?
यह रिपोर्ट आरोपों और विश्लेषण पर आधारित है; बलूचिस्तान में सुरक्षा स्थिति से जुड़े मामले संवेदनशील और विकासशील हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- ज़ियारत घात हमले में मारे गए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने क्वेटा में शवों को सड़क पर रखकर 'असीम मुनीर मुर्दाबाद' के नारे लगाए — यह पाक फ़ौज प्रमुख के ख़िलाफ़ सार्वजनिक जनाक्रोश का अभूतपूर्व प्रदर्शन है — News18 के अनुसार।
- बलूचिस्तान में 'ऑपरेशन अज़्म-ए-इस्तेहकाम' के बावजूद विद्रोही हमले जारी हैं, जो सैन्य रणनीति की विफलता दर्शाते हैं।
- पाकिस्तान में सिविल-मिलिट्री खाई अब राजनीतिक दलों से आगे बढ़कर सीधे अवाम बनाम फ़ौज के रूप में सामने आ रही है।
- भारत के लिए यह दोधारी स्थिति है — पाक की आंतरिक अस्थिरता LAC/LOC दबाव कम करती है, लेकिन अस्थिर परमाणु पड़ोसी चिंता का विषय है।
- CPEC और ग्वादर पोर्ट पहले से निशाने पर हैं; बढ़ती अस्थिरता चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को प्रभावित कर सकती है।
आँकड़ों में
- बलूचिस्तान पाकिस्तान का ~44% क्षेत्रफल है लेकिन विकास सूचकांकों में सबसे पीछे — यह विषमता विद्रोह की जड़ है।
- 2024 में शुरू 'ऑपरेशन अज़्म-ए-इस्तेहकाम' के बावजूद 2026 में ज़ियारत जैसे बड़े घात हमले जारी हैं — News18 के अनुसार।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: ज़ियारत घात हमले में मारे गए पुलिसकर्मियों के परिजन और क्वेटा के नागरिक, जिनका गुस्सा पाक आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर पर फूटा — News18 के अनुसार।
- क्या: शहीद पुलिसकर्मियों के शवों को क्वेटा की सड़कों पर रखकर प्रदर्शनकारियों ने 'असीम मुनीर मुर्दाबाद' के नारे लगाए और सेना की सुरक्षा विफलता पर सवाल उठाए — News18 के अनुसार।
- कब: जुलाई 2026 में ज़ियारत में हुए घात हमले के तुरंत बाद — News18 के अनुसार।
- कहाँ: बलूचिस्तान के ज़ियारत ज़िले में घात हमला और उसके बाद प्रांतीय राजधानी क्वेटा में विरोध प्रदर्शन — News18 के अनुसार।
- क्यों: बलूचिस्तान में लगातार बढ़ते विद्रोही हमलों, सुरक्षाबलों की बेबसी और सेना के 'ऑपरेशन अज़्म-ए-इस्तेहकाम' की विफलता से उपजे गहरे जनाक्रोश के कारण — News18 के अनुसार।
- कैसे: ज़ियारत में विद्रोहियों ने पुलिस काफिले पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए; इसके बाद परिजनों ने शवों को क्वेटा में सड़क पर रखकर विरोध शुरू किया और सेना प्रमुख के खिलाफ नारेबाज़ी की — News18 के अनुसार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्वेटा में 'असीम मुनीर मुर्दाबाद' के नारे क्यों लगे?
बलूचिस्तान के ज़ियारत में विद्रोहियों के घात हमले में पुलिसकर्मी मारे गए; उनके परिजनों ने शवों को सड़क पर रखकर पाक आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर की सुरक्षा विफलता के ख़िलाफ़ गुस्सा ज़ाहिर किया — News18 के अनुसार।
ज़ियारत घात हमले में क्या हुआ?
बलूचिस्तान के ज़ियारत ज़िले में विद्रोहियों ने पुलिस काफिले पर घात लगाकर हमला किया जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद क्वेटा में बड़ा विरोध प्रदर्शन भड़का — News18 के अनुसार।
बलूचिस्तान में पाक सेना का ऑपरेशन अज़्म-ए-इस्तेहकाम क्यों विफल हो रहा है?
2024 में शुरू इस ऑपरेशन का लक्ष्य बलूचिस्तान और KP में आतंकवाद समाप्त करना था, लेकिन ज़ियारत जैसे लगातार हमले दर्शाते हैं कि सैन्य बल से राजनीतिक और जातीय समस्या का समाधान नहीं हो रहा।
भारत पर बलूचिस्तान की अस्थिरता का क्या असर पड़ सकता है?
पाक की आंतरिक अस्थिरता से LOC/LAC पर तात्कालिक दबाव कम हो सकता है, लेकिन अस्थिर परमाणु पड़ोसी और CPEC/ग्वादर पर बढ़ता ख़तरा भू-राजनीतिक चिंता बढ़ाता है।