INS महेंद्रगिरि समंदर में उतरा — क्या चीन की पनडुब्बियों का हिंद महासागर में खेल अब खत्म?

Raj Harsh

INS महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट 17A का सातवाँ और अंतिम स्टील्थ फ्रिगेट है, जो भारतीय नौसेना में शामिल हुआ। रडार-अदृश्य डिज़ाइन, ब्रह्मोस मिसाइल और एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्षमता से लैस यह युद्धपोत हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों और पनडुब्बी तैनातियों का सीधा जवाब है।

समंदर की सतह पर दिखता है एक जहाज़ — पर रडार की स्क्रीन पर वह गायब है। यही INS महेंद्रगिरि की सबसे खतरनाक बात है। प्रोजेक्ट 17A का सातवाँ और आखिरी स्टील्थ फ्रिगेट अब भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल हो चुका है, और इसकी तैनाती का वक्त ऐसा है जब हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियों की आवाजाही ने रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा रखी है।

सवाल सीधा है — भारत को इस जहाज़ की ज़रूरत अभी क्यों? जवाब उतना ही सीधा: क्योंकि ड्रैगन अब सिर्फ दक्षिण चीन सागर में नहीं, बल्कि भारत के 'पिछवाड़े' हिंद महासागर में भी अपना झंडा गाड़ने की कोशिश कर रहा है।

प्रोजेक्ट 17A — सात जहाज़ों की श्रृंखला का 'क्लोज़र'

प्रोजेक्ट 17A भारतीय नौसेना का सबसे महत्वाकांक्षी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम रहा है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस परियोजना के तहत सात नीलगिरि-श्रेणी के स्टील्थ फ्रिगेट बनाए गए — चार मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स (MDL), मुंबई में और तीन गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता में। INS महेंद्रगिरि इस श्रृंखला का आखिरी और सबसे उन्नत जहाज़ है। इसकी कुल लागत लगभग ₹50,000 करोड़ (पूरे प्रोजेक्ट की) आँकी गई — यानी हर फ्रिगेट पर करीब ₹7,000 करोड़ से अधिक का निवेश।

लेकिन असली कहानी लागत में नहीं, तकनीक में है। ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, INS महेंद्रगिरि का डिज़ाइन ही ऐसा है कि दुश्मन के रडार पर इसका 'सिग्नेचर' बेहद छोटा दिखता है — जैसे कोई बड़ी मछली पकड़ने निकला हो और जाल में सिर्फ एक छोटी मछली आए। इसे तकनीकी भाषा में 'रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) रिडक्शन' कहते हैं। जहाज़ की दीवारें झुकी हुई हैं, एंटेना छुपे हुए हैं, और हथियार डेक के अंदर लगे हैं — सब कुछ इसलिए ताकि रडार की किरणें टकराकर वापस न लौटें।

हथियारों का जखीरा — ब्रह्मोस से लेकर बराक-8 तक

INS महेंद्रगिरि की मारक क्षमता किसी से कम नहीं। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, इस पर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलें तैनात हैं जो 290 किलोमीटर से अधिक की रेंज में दुश्मन के जहाज़ या ज़मीनी ठिकानों को तबाह कर सकती हैं — मैक 2.8 यानी ध्वनि की लगभग तीन गुना रफ्तार से। हवाई हमलों से बचाव के लिए इज़राइल-भारत संयुक्त विकसित बराक-8 मिसाइल सिस्टम लगा है, जो 100 किलोमीटर दूर से आने वाली मिसाइलों और विमानों को गिरा सकता है।

लेकिन INS महेंद्रगिरि का सबसे बड़ा दाँव इसकी एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW) क्षमता है। रॉकेट-लॉन्च्ड टॉरपीडो, हल-माउंटेड सोनार और टोव्ड एरे सोनार — ये सब मिलकर पानी के अंदर छुपी पनडुब्बियों को ढूँढकर नष्ट करने का काम करते हैं। और यही वह बिंदु है जहाँ चीन को सबसे ज़्यादा तकलीफ होगी।

पॉलिटिकल पल्स — चीन का 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' और भारत का जवाब

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि INS महेंद्रगिरि की कमीशनिंग का वक्त अचानक नहीं चुना गया। पिछले दो सालों में चीनी नौसेना ने हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी तेज़ी से बढ़ाई है — श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह से लेकर जिबूती के सैन्य अड्डे तक, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से लेकर म्यांमार के कोको द्वीप तक। रक्षा विशेषज्ञ इसे 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' कहते हैं — भारत को चारों ओर से घेरने की एक लंबी रणनीतिक चाल।

ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 में चीनी नौसेना की कम से कम 6-8 पनडुब्बियाँ हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय देखी गई हैं — जिनमें टाइप-039A जैसी परमाणु-सक्षम पनडुब्बियाँ भी शामिल हैं। यह संख्या पाँच साल पहले की तुलना में लगभग दोगुनी है।

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि INS महेंद्रगिरि सिर्फ एक युद्धपोत नहीं, बल्कि मोदी सरकार का एक सोचा-समझा भू-राजनीतिक संदेश है — खासतौर पर ऐसे समय जब भारत-चीन सीमा पर LAC विवाद ठंडा पड़ने का नाम नहीं ले रहा। समंदर में ताकत दिखाना ज़मीनी सीमा पर बातचीत की मेज़ पर बेहतर सौदेबाज़ी की स्थिति देता है। यह कूटनीति की भाषा में 'गनबोट डिप्लोमेसी' का 21वीं सदी का संस्करण है।

स्वदेशी तकनीक — 'मेक इन इंडिया' का सबसे भारी प्रमाण

एक बात जो अक्सर चर्चा में खो जाती है — INS महेंद्रगिरि में 75% से अधिक स्वदेशी सामग्री है। रक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक, प्रोजेक्ट 17A ने भारतीय रक्षा उद्योग के 100 से अधिक MSME और निजी कंपनियों को काम दिया। लड़ाकू प्रबंधन प्रणाली (CMS), एकीकृत प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम (IPMS) और कई सेंसर सूट पूरी तरह भारत में विकसित हैं।

यह सिर्फ सैन्य उपलब्धि नहीं, औद्योगिक उपलब्धि भी है। जब भारत का रक्षा निर्यात 2025-26 में ₹21,000 करोड़ से ऊपर पहुँचा (रक्षा मंत्रालय के अनुसार), तो प्रोजेक्ट 17A जैसे कार्यक्रमों ने उस नींव में सबसे बड़ा पत्थर रखा।

आगे क्या? — अगला दाँव प्रोजेक्ट 17B और तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर

रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, प्रोजेक्ट 17A के पूरा होने के बाद भारतीय नौसेना अब प्रोजेक्ट 17B पर ध्यान केंद्रित करेगी — जो और अधिक उन्नत, स्टील्थ और नेटवर्क-सेंट्रिक युद्धपोतों की अगली पीढ़ी होगी। साथ ही तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC-2) की चर्चा भी ज़ोरों पर है, जो 65,000 टन से अधिक वज़न का होगा और कैटपल्ट-असिस्टेड टेकऑफ तकनीक से लैस होगा।

चीन ने पिछले दशक में तीन एयरक्राफ्ट कैरियर उतारे हैं — फुजियान (2024) सबसे नया। भारत के पास अभी सिर्फ एक ऑपरेशनल कैरियर INS विक्रांत है। यह अंतर चिंताजनक है, लेकिन INS महेंद्रगिरि जैसे स्टील्थ फ्रिगेट उस अंतर को 'असममित' तरीके से भरने की कोशिश हैं — यानी कम खर्च में अधिकतम रणनीतिक प्रभाव।

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मुख्य बातें

  • INS महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट 17A का सातवाँ और अंतिम स्टील्थ फ्रिगेट है, जो ब्रह्मोस, बराक-8 और उन्नत एंटी-सबमरीन सिस्टम से लैस है
  • हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियों की संख्या पाँच साल पहले की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है — INS महेंद्रगिरि इसी खतरे का सीधा जवाब है
  • प्रोजेक्ट 17A में 75% से अधिक स्वदेशी सामग्री इस्तेमाल हुई और 100 से अधिक भारतीय MSME को काम मिला
  • अगला कदम प्रोजेक्ट 17B और तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर IAC-2 की दिशा में होगा — चीन से नौसैनिक अंतर पाटने की लंबी दौड़ शुरू

आँकड़ों में

  • प्रोजेक्ट 17A की कुल अनुमानित लागत लगभग ₹50,000 करोड़ — सात स्टील्थ फ्रिगेट
  • ब्रह्मोस मिसाइल रेंज 290+ किमी, रफ्तार मैक 2.8 (ध्वनि से तीन गुना)
  • हिंद महासागर में 2025-26 में 6-8 चीनी पनडुब्बियाँ सक्रिय — ज़ी न्यूज़ रिपोर्ट
  • INS महेंद्रगिरि में 75% से अधिक स्वदेशी सामग्री — रक्षा मंत्रालय
  • भारत का रक्षा निर्यात 2025-26 में ₹21,000 करोड़ से ऊपर — रक्षा मंत्रालय

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारतीय नौसेना और मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई
  • क्या: प्रोजेक्ट 17A के अंतिम स्टील्थ फ्रिगेट INS महेंद्रगिरि को भारतीय नौसेना में कमीशन किया गया
  • कब: जून 2026 में कमीशनिंग, रक्षा मंत्रालय के अनुसार
  • कहाँ: मुंबई स्थित मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स में निर्माण; तैनाती हिंद महासागर क्षेत्र में
  • क्यों: हिंद महासागर में चीनी नौसेना की बढ़ती पनडुब्बी और जहाज़ तैनातियों का मुकाबला करने और 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति को काटने के लिए
  • कैसे: स्टील्थ डिज़ाइन, रडार क्रॉस-सेक्शन में कमी, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, बराक-8 एयर डिफेंस और उन्नत एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सूट के ज़रिए

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

INS महेंद्रगिरि क्या है और यह कब भारतीय नौसेना में शामिल हुआ?

INS महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट 17A (नीलगिरि-श्रेणी) का सातवाँ और अंतिम स्टील्थ फ्रिगेट है। इसे जून 2026 में भारतीय नौसेना में कमीशन किया गया। इसका निर्माण मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स, मुंबई में हुआ।

INS महेंद्रगिरि में कौन-कौन से हथियार और तकनीक हैं?

ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल (290+ किमी रेंज, मैक 2.8), बराक-8 एयर डिफेंस सिस्टम (100 किमी रेंज), एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सूट (टॉरपीडो, हल-माउंटेड और टोव्ड एरे सोनार), और उन्नत स्टील्थ डिज़ाइन जो रडार क्रॉस-सेक्शन को न्यूनतम करता है।

चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति क्या है और INS महेंद्रगिरि इसका जवाब कैसे है?

'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' चीन की वह रणनीति है जिसमें हिंद महासागर के किनारे बंदरगाहों (हंबनटोटा, ग्वादर, जिबूती) और सैन्य अड्डों का जाल बिछाकर भारत को चारों ओर से घेरा जा रहा है। INS महेंद्रगिरि जैसे स्टील्थ फ्रिगेट इन ठिकानों के पास गश्त और निगरानी करके इस घेरे को तोड़ने की क्षमता रखते हैं।

प्रोजेक्ट 17A के बाद भारतीय नौसेना का अगला कदम क्या है?

रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, अगला चरण प्रोजेक्ट 17B है — और अधिक उन्नत नेटवर्क-सेंट्रिक युद्धपोतों की श्रृंखला। साथ ही तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर IAC-2 (65,000+ टन, कैटपल्ट-असिस्टेड) की योजना भी चर्चा में है।

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