मोसाद का 'रेजीम चेंज' प्लान — क्या अहमदीनेजाद सच में इस्राइल के मोहरे थे?

Raj Harsh

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने एक गोपनीय 'रेजीम चेंज' योजना के तहत ईरान के कट्टर राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को ईरान की सत्ता के शीर्ष पर पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन यह ऑपरेशन आखिरकार इस्राइल के ही खिलाफ़ पलट गया।

दुनिया की सबसे पुरानी दुश्मनियों में एक नाम हमेशा ऊपर रहता है — इस्राइल बनाम ईरान। दोनों ने एक-दूसरे को नष्ट करने की कसमें खाई हैं, प्रॉक्सी वॉर लड़ी हैं, साइबर हमले किए हैं। लेकिन अब जो खुलासा सामने आया है, वह इस दुश्मनी के इतिहास का शायद सबसे विचित्र और सबसे खतरनाक अध्याय है: इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने कथित तौर पर ईरान के सबसे कट्टर राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को खुद 'तैयार' किया — ताकि ईरान की सत्ता को भीतर से पलट सकें।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस्राइल ने एक गोपनीय 'रेजीम चेंज' प्लान के तहत अहमदीनेजाद को ईरान के 'पोटेंशियल फ्यूचर लीडर' के रूप में ग्रूम किया। योजना का मूल यह था कि ईरान के भीतर एक ऐसे नेता को ऊपर लाया जाए जो शासन व्यवस्था में दरार पैदा कर सके, सुप्रीम लीडर की पकड़ कमज़ोर कर सके — और आखिरकार ईरान का पूरा ढाँचा भीतर से ढह जाए।

ज़रा सोचिए — वही अहमदीनेजाद जिन्होंने 2005 में ईरान की कुर्सी संभालते ही इस्राइल को नक्शे से मिटाने की धमकी दी, जिन्होंने होलोकॉस्ट को 'मिथक' बताया, जिन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रफ़्तार दी — क्या वही शख्स दरअसल इस्राइल के खुफिया दाँव का एक मोहरा थे? अगर यह रिपोर्ट सच है, तो यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी इंटेलिजेंस विडंबना है।

मोसाद का यह ऑपरेशन क्लासिक 'रेजीम चेंज' डॉक्ट्रिन पर आधारित बताया जा रहा है: दुश्मन देश में ऐसे नेता को आगे बढ़ाओ जो व्यवस्था में अंतर्विरोध पैदा करे। इस्राइल का अनुमान रहा होगा कि अहमदीनेजाद जैसा उग्र, लोकलुभावन नेता ईरान के रूढ़िवादी धार्मिक ढाँचे — खासकर सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई — से टकराएगा, और यह टकराव ईरान को भीतर से तोड़ देगा।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों और इंटेलिजेंस विश्लेषकों के बीच इस रिपोर्ट पर जो फुसफुसाहट चल रही है, वह और भी दिलचस्प है। कहा जा रहा है कि मोसाद का यह प्लान शायद सिर्फ़ अहमदीनेजाद तक सीमित नहीं था — ईरान की राजनीति में ऐसे कई 'एसेट्स' की चर्चा होती रही है जिन्हें पश्चिमी या इस्राइली एजेंसियों ने कथित तौर पर 'नर्चर' किया। ट्रेड हलकों में यह भी चर्चा है कि क्या ईरान के मौजूदा सत्ता संघर्ष — खासकर सुप्रीम लीडर खामेनेई के निधन के बाद मोजताबा खामेनेई की गैरमौजूदगी का रहस्य — भी इसी बड़े खुफिया खेल की एक और परत है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

लेकिन हुआ ठीक उलटा। अहमदीनेजाद ने सत्ता में आकर इस्राइल-विरोध को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी बना लिया। उन्होंने परमाणु कार्यक्रम को तेज़ किया, हिज़बुल्लाह और हमास को और मज़बूत किया, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्राइल को सबसे तीखी चुनौती दी। अगर मोसाद ने उन्हें 'मोहरा' बनाया था, तो वह मोहरा शतरंज के बोर्ड पर अपना ही खेल खेलने लगा। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट भी इसे 'बैकफायर' बताती है — इस्राइल ने जिस आग को नियंत्रित करना चाहा, उसी ने उसे झुलसा दिया।

इस खुलासे को मौजूदा मिडिल ईस्ट संकट के संदर्भ में देखें तो तस्वीर और साफ़ होती है। हिंदुस्तान टाइम्स की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने 13 विश्व नेताओं की एक 'बदले की सूची' बनाई है जिसमें इस्राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी शामिल हैं। साथ ही, इस्राइल ने हाल ही में अमेरिका को ईरान की एक कथित नई हत्या की साजिश की इंटेलिजेंस भी साझा की है जो ट्रंप को निशाना बना रही है। यानी इस्राइल-ईरान का यह खुफिया युद्ध 2026 में भी उतना ही गर्म है जितना दो दशक पहले था — बस दांव और ऊँचे हो गए हैं।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा सबक 'रेजीम चेंज' की अवधारणा पर ही सवाल उठाता है। अमेरिका ने इराक में किया, लीबिया में किया — और हर बार नतीजा वही निकला: जिस अराजकता को 'मैनेज' करना था, वह 'मैनेज' करने वाले को ही निगल गई। मोसाद का अहमदीनेजाद ऑपरेशन इसी पैटर्न की इंटेलिजेंस-ग्रेड कड़ी है — आप दुश्मन के घर में आग लगा सकते हैं, लेकिन हवा का रुख तय करना आपके हाथ में नहीं।

भारत के लिए यह सिर्फ़ एक विदेशी खबर नहीं है। ईरान भारत का ऐतिहासिक ऊर्जा सहयोगी रहा है, चाबहार बंदरगाह पर भारत का भारी निवेश है, और मिडिल ईस्ट में कोई भी भू-राजनीतिक उथल-पुथल सीधे तेल की कीमतों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ती है। अगर ईरान में 'रेजीम चेंज' की और कोशिशें होती हैं — या ईरान की 'बदले की सूची' के नतीजे सामने आते हैं — तो भारत को अपनी मिडिल ईस्ट रणनीति फिर से तौलनी पड़ सकती है।

आने वाले दिनों में देखने वाली बात यह होगी कि ईरान इस रिपोर्ट पर कैसे प्रतिक्रिया देता है। अहमदीनेजाद ईरान की राजनीति में आज भी एक विवादास्पद लेकिन सक्रिय शख्सियत हैं। अगर ईरान का शासन इस रिपोर्ट को हथियार बनाकर अहमदीनेजाद को 'विदेशी एजेंट' साबित करने की कोशिश करता है, तो ईरान की अंदरूनी राजनीति में एक नया भूचाल आ सकता है — ठीक उस वक्त जब सुप्रीम लीडर के उत्तराधिकार का सवाल पहले से खुला है।

और अगर यह रिपोर्ट सच है, तो असली सवाल यह नहीं कि मोसाद ने अहमदीनेजाद को 'बनाया' या नहीं — असली सवाल यह है कि दुनिया की कोई भी खुफिया एजेंसी किसी देश के 'भविष्य' को कब तक कंट्रोल कर सकती है? इतिहास का जवाब बार-बार यही रहा है: बहुत कम देर तक।

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मुख्य बातें

  • हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार मोसाद ने ईरान में 'रेजीम चेंज' के तहत अहमदीनेजाद को 'पोटेंशियल फ्यूचर लीडर' के रूप में कथित तौर पर तैयार किया।
  • अहमदीनेजाद ने सत्ता में आकर इस्राइल-विरोध को और तीखा किया — रिपोर्ट इसे मोसाद के लिए 'बैकफायर' बताती है।
  • ईरान ने 13 विश्व नेताओं की 'बदले की सूची' बनाई है जिसमें नेतन्याहू और ट्रंप शामिल हैं — हिंदुस्तान टाइम्स।
  • भारत के लिए यह सीधे ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार निवेश से जुड़ा मसला है।
  • 'रेजीम चेंज' का इतिहास — इराक, लीबिया, अब ईरान — यही बताता है कि नियंत्रित अराजकता कभी नियंत्रित नहीं रहती।

आँकड़ों में

  • ईरान की कथित 'बदले की सूची' में 13 विश्व नेता शामिल — हिंदुस्तान टाइम्स
  • अहमदीनेजाद 2005-2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे — इस दौरान ईरान-इस्राइल तनाव अपने चरम पर पहुँचा

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद — हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार।
  • क्या: मोसाद ने ईरान में 'रेजीम चेंज' के तहत अहमदीनेजाद को ईरान के भावी नेता के रूप में तैयार करने का गुप्त प्लान बनाया — हिंदुस्तान टाइम्स।
  • कब: रिपोर्ट जुलाई 2026 में सामने आई; ऑपरेशन की अवधि स्पष्ट रूप से अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति काल (2005-2013) से जुड़ी बताई गई है।
  • कहाँ: ईरान और इस्राइल — मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक रंगमंच पर।
  • क्यों: इस्राइल का मकसद ईरान की शासन व्यवस्था को भीतर से कमज़ोर कर अपने सबसे बड़े क्षेत्रीय दुश्मन को निष्प्रभावी करना था — हिंदुस्तान टाइम्स।
  • कैसे: मोसाद ने कथित तौर पर अहमदीनेजाद को 'पोटेंशियल फ्यूचर लीडर' के रूप में ग्रूम किया, लेकिन अहमदीनेजाद ने सत्ता में आकर इस्राइल-विरोधी रुख और भी तीखा कर दिया — रिपोर्ट के अनुसार।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मोसाद ने अहमदीनेजाद को कैसे 'ग्रूम' किया?

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार मोसाद ने एक गोपनीय 'रेजीम चेंज' प्लान के तहत अहमदीनेजाद को ईरान के 'पोटेंशियल फ्यूचर लीडर' के रूप में तैयार किया, ताकि वे ईरान की शासन व्यवस्था में अंतर्विरोध पैदा कर सकें।

यह ऑपरेशन बैकफायर क्यों हुआ?

अहमदीनेजाद ने सत्ता में आकर इस्राइल-विरोध को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी बनाया, परमाणु कार्यक्रम तेज़ किया और हिज़बुल्लाह-हमास को मज़बूत किया — जो इस्राइल के हितों के ठीक विपरीत था।

भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

ईरान भारत का ऊर्जा सहयोगी है और चाबहार बंदरगाह पर भारत का बड़ा निवेश है। ईरान में कोई भी भू-राजनीतिक उथल-पुथल सीधे तेल की कीमतों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।

ईरान की 'बदले की सूची' में कौन-कौन शामिल हैं?

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार इस सूची में 13 विश्व नेता हैं, जिनमें इस्राइल के नेतन्याहू, अमेरिका के ट्रंप और इटली की मेलोनी प्रमुख हैं।

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