SAARC की 'कब्र' पर डोभाल का BIMSTEC चक्रव्यूह — क्या पाकिस्तान अब हमेशा के लिए 'आउट' है?

Singh Anchala

NSA अजित डोभाल 2026 में ऐतिहासिक पाँचवें BIMSTEC सुरक्षा समिट की मेज़बानी कर रहे हैं। यह भारत की 'नेबरहुड फ़र्स्ट' नीति का नया अध्याय है — SAARC को दरकिनार कर BIMSTEC को दक्षिण एशिया का प्रमुख मंच बनाना, पाकिस्तान को स्थायी रूप से अलग-थलग करना और बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़त को काउंटर करना।

SAARC का आख़िरी शिखर सम्मेलन 2014 में काठमांडू में हुआ था। उसके बाद से इस मंच की हालत उस पुरानी हवेली जैसी है जिसकी चाबी कब की खो चुकी है — सब जानते हैं कि अंदर कुछ नहीं बचा, पर बाहर से ताला कोई नहीं तोड़ता। अब NSA अजित डोभाल ने वह ताला तोड़ने की बजाय एक बिलकुल नई इमारत खड़ी कर दी है — BIMSTEC। News18 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, डोभाल भारत में पाँचवें BIMSTEC सुरक्षा समिट की मेज़बानी करने जा रहे हैं, और यह बैठक सिर्फ़ एक सुरक्षा वार्ता नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक बिसात पर एक निर्णायक चाल है।

ज़रा सोचिए — सात देश एक मेज़ पर बैठेंगे और उस मेज़ पर पाकिस्तान के लिए कुर्सी ही नहीं होगी। BIMSTEC में भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, नेपाल और भूटान शामिल हैं। इसकी सदस्यता की डिज़ाइन ही ऐसी है कि पाकिस्तान बाहर है — कोई वीटो नहीं, कोई अड़ंगा नहीं, कोई 'बातचीत के लिए बातचीत' वाला ड्रामा नहीं। SAARC में पाकिस्तान के वीटो ने दशकों तक हर सार्थक पहल को रोका — BIMSTEC में वह ताक़त ही नहीं मिलती।

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पाकिस्तान का 'स्थायी निर्वासन' — SAARC से BIMSTEC तक का सफ़र

2016 उरी हमले के बाद भारत ने इस्लामाबाद में होने वाले SAARC शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया। बांग्लादेश, भूटान, अफ़ग़ानिस्तान और श्रीलंका ने भी साथ दिया। तब से SAARC व्यावहारिक रूप से मृत है। भारत ने उसकी जगह BIMSTEC को 'नेबरहुड फ़र्स्ट' का प्रमुख वाहन बना दिया — 2018 में BIMSTEC नेताओं को BRICS आउटरीच में बुलाया, फिर बैंकॉक चार्टर, फिर कोलंबो शिखर सम्मेलन। हर क़दम पर SAARC की ज़मीन खिसकती गई और BIMSTEC की बुनियाद मज़बूत होती गई।

अब डोभाल का यह पाँचवाँ सुरक्षा समिट उस प्रक्रिया की 'कील' है। रक्षा विश्लेषकों और विदेश नीति के जानकारों के अनुसार, NSA-स्तर की बैठक का मतलब है कि अब यह मंच सिर्फ़ व्यापार और संस्कृति तक सीमित नहीं रहा — इसमें आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, ड्रग तस्करी और समुद्री सुरक्षा जैसे 'हार्ड सिक्योरिटी' मुद्दे शामिल हो गए हैं। SAARC में ये बातें पाकिस्तान की वजह से कभी आगे नहीं बढ़ पाईं — BIMSTEC में बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ रही हैं।

बंगाल की खाड़ी में चीन को 'चेकमेट'

पाकिस्तान को बाहर रखना इस बिसात का सिर्फ़ एक पहलू है। दूसरा — और शायद ज़्यादा बड़ा — पहलू है बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़ती मौजूदगी को काउंटर करना। चीन ने म्यांमार में क्याउकफ्यू बंदरगाह, श्रीलंका में हंबनटोटा और बांग्लादेश में चटगाँव में अपनी पैठ बना रखी है। BIMSTEC के सभी सात सदस्य बंगाल की खाड़ी से जुड़े हैं या उसके तटवर्ती हैं — यह कोई संयोग नहीं, एक डिज़ाइन है।

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि डोभाल इस समिट के ज़रिए 'मेरीटाइम डोमेन अवेयरनेस' और संयुक्त गश्त जैसे ठोस सुरक्षा तंत्र पर आम सहमति बनाना चाहते हैं। यह सीधे-सीधे चीन के 'स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स' — यानी हिंद महासागर में बंदरगाहों की माला — को तोड़ने की कोशिश है। जहाँ चीन पैसे से रिश्ते ख़रीदता है, भारत सुरक्षा साझेदारी से जवाब दे रहा है।

पॉलिटिकल पल्स

दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि डोभाल ने यह समिट ठीक उस वक़्त रखा है जब पाकिस्तान की सेना और सरकार आपसी खींचतान में उलझी हैं और इस्लामाबाद की विदेश नीति पर कोई एक आवाज़ नहीं है। सूत्रों के हवाले से यह बात भी घूम रही है कि BIMSTEC सदस्य देशों में से कई — ख़ासकर नेपाल और म्यांमार — चीन के आर्थिक दबाव से बचने के लिए भारत के इस मंच को 'सेफ़ स्पेस' की तरह देख रहे हैं। (यह कूटनीतिक हलकों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यही है कि डोभाल का यह क़दम सिर्फ़ विदेश नीति का नहीं, घरेलू राजनीति का भी दाँव है। 'मज़बूत भारत' की छवि — जहाँ पड़ोसी देश भारत की अगुवाई में बैठते हैं — सत्तारूढ़ दल के लिए चुनावी पूँजी भी है। और जब पाकिस्तान 'मेज़ पर ही नहीं' हो, तो विपक्ष का 'बातचीत करो' वाला तर्क अपने आप कमज़ोर हो जाता है।

डोभाल का 'चक्रव्यूह' — आगे क्या?

अब सवाल यह है कि क्या BIMSTEC SAARC की जगह पूरी तरह ले सकता है? इसके रास्ते में दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। पहली — म्यांमार, जहाँ सैन्य शासन और गृहयुद्ध ने स्थिति अस्थिर कर रखी है। BIMSTEC का एक सदस्य अगर अंतरराष्ट्रीय दबाव में है, तो मंच की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। दूसरी — थाईलैंड और श्रीलंका जैसे देश चीन से आर्थिक रूप से गहरे जुड़े हैं; भारत को सुरक्षा सहयोग और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का संतुलन साधना होगा।

लेकिन डोभाल की रणनीति का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि उन्होंने SAARC को औपचारिक रूप से 'मारा' नहीं — बस उसे 'अप्रासंगिक' बना दिया। काग़ज़ पर SAARC ज़िंदा है, उसका सचिवालय काठमांडू में है, कर्मचारियों की तनख़्वाह निकलती है। लेकिन असली काम — असली बैठकें, असली फ़ैसले, असली सुरक्षा सहयोग — सब BIMSTEC की मेज़ पर हो रहा है। यह कूटनीति की वह बारीक चाल है जिसमें आप किसी को 'निकालते' नहीं, बस उसके लिए कमरे में जगह नहीं छोड़ते।

आने वाले हफ़्तों में देखना यह होगा कि इस समिट से कोई ठोस समुद्री सुरक्षा समझौता निकलता है या नहीं, और क्या भारत BIMSTEC के भीतर एक स्थायी 'काउंटर-टेररिज़्म सेंटर' का प्रस्ताव रखता है। अगर ऐसा हुआ, तो यह SAARC के ताबूत में आख़िरी कील होगी — और पाकिस्तान के लिए दक्षिण एशिया के बहुपक्षीय ढाँचे में लौटने का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद।

डोभाल ने चक्रव्यूह रचा है — सवाल यह है कि क्या इस्लामाबाद के पास अभिमन्यु जैसी हिम्मत है कि अंदर घुसने की कोशिश भी करे, या बाहर से देखता रहे जबकि बाक़ी पड़ोस आगे निकल जाए?

आरोप और आकलन जो यहाँ रिपोर्ट किए गए हैं, वे नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक कोई अदालत फ़ैसला न दे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • SAARC 2014 के बाद से व्यावहारिक रूप से मृत है — डोभाल ने BIMSTEC को 'नेबरहुड फ़र्स्ट' का प्रमुख मंच बना दिया है, जिसमें पाकिस्तान के लिए कोई जगह नहीं।
  • पाँचवाँ BIMSTEC सुरक्षा समिट NSA-स्तर का है — इसमें आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा जैसे 'हार्ड सिक्योरिटी' मुद्दे शामिल हैं, जो SAARC में पाकिस्तान के वीटो से कभी आगे नहीं बढ़ पाए।
  • बंगाल की खाड़ी में चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स' को काउंटर करना इस समिट का दूसरा बड़ा मक़सद है — सभी सात BIMSTEC सदस्य इस खाड़ी से जुड़े हैं।
  • म्यांमार की अस्थिरता और थाईलैंड-श्रीलंका की चीन पर आर्थिक निर्भरता BIMSTEC की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं।
  • अगर इस समिट से स्थायी काउंटर-टेररिज़्म सेंटर या समुद्री सुरक्षा समझौता निकला, तो SAARC की वापसी का दरवाज़ा स्थायी रूप से बंद हो जाएगा।

आँकड़ों में

  • SAARC का आख़िरी शिखर सम्मेलन 2014 में काठमांडू में हुआ था — 12 साल से कोई शिखर बैठक नहीं।
  • BIMSTEC के 7 सदस्य देशों की कुल आबादी लगभग 1.8 अरब है — दुनिया की क़रीब 22% जनसंख्या।
  • 2016 उरी हमले के बाद भारत सहित 5 देशों ने SAARC शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया — तब से कोई सम्मेलन नहीं हुआ।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल, सात BIMSTEC सदस्य देशों के सुरक्षा प्रमुख।
  • क्या: पाँचवें BIMSTEC सुरक्षा समिट की भारत में मेज़बानी — आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा और ट्रांसनेशनल क्राइम पर बहुपक्षीय वार्ता।
  • कब: 2026 में — News18 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार।
  • कहाँ: भारत — सटीक शहर की आधिकारिक घोषणा प्रतीक्षित।
  • क्यों: SAARC के ठप पड़ने के बाद BIMSTEC को दक्षिण एशिया के प्राथमिक बहुपक्षीय सुरक्षा मंच के रूप में स्थापित करना, पाकिस्तान को बाहर रखते हुए।
  • कैसे: 'नेबरहुड फ़र्स्ट' नीति के तहत BIMSTEC सदस्य देशों — भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, नेपाल, भूटान — के NSA-स्तरीय अधिकारियों को एक मंच पर लाकर सुरक्षा सहयोग का संस्थागत ढाँचा खड़ा करना।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

BIMSTEC क्या है और इसमें कौन-कौन से देश हैं?

BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) एक बहुपक्षीय संगठन है जिसमें भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, नेपाल और भूटान — कुल सात देश शामिल हैं। इसकी स्थापना 1997 में हुई थी।

SAARC और BIMSTEC में क्या फ़र्क़ है?

SAARC में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान सहित 8 देश हैं, जबकि BIMSTEC में पाकिस्तान शामिल नहीं है। SAARC में पाकिस्तान का वीटो कई पहलों को रोकता रहा, जबकि BIMSTEC में बिना किसी अड़ंगे के सुरक्षा और व्यापार सहयोग आगे बढ़ रहा है।

डोभाल BIMSTEC सुरक्षा समिट से क्या हासिल करना चाहते हैं?

News18 की रिपोर्ट के अनुसार, डोभाल इस समिट से आतंकवाद-रोधी सहयोग, साइबर सुरक्षा, समुद्री डोमेन अवेयरनेस और ट्रांसनेशनल क्राइम पर ठोस बहुपक्षीय ढाँचा खड़ा करना चाहते हैं — जो बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़त को सीधे काउंटर करे।

क्या SAARC पूरी तरह ख़त्म हो चुका है?

औपचारिक रूप से SAARC अभी ज़िंदा है — इसका सचिवालय काठमांडू में काम करता है। लेकिन 2014 के बाद से कोई शिखर सम्मेलन नहीं हुआ और भारत ने व्यावहारिक रूप से अपनी बहुपक्षीय ऊर्जा BIMSTEC में लगा दी है।

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