वांगचुक को 'जबरन' खाना खिलाने की याचिका — क्या अनशन कुचलने के लिए कोर्ट की आड़ ले रही है सरकार?
दिल्ली हाईकोर्ट में एक अधिवक्ता ने याचिका दायर कर सोनम वांगचुक को मेडिकल आधार पर जबरन खाना खिलाने की माँग की है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह कदम वांगचुक के लद्दाख के लिए छठी अनुसूची की माँग वाले अनशन के बीच उठाया गया है — जो सरकार की प्रॉक्सी रणनीति हो सकती है।
एक आदमी भूखा बैठा है — दिल्ली की सड़क पर, लद्दाख की बर्फ़ीली पहाड़ियों की आवाज़ लेकर। और एक वकील अदालत के दरवाज़े पर खड़ा है, हाथ में 'जनहित' का बोर्ड लेकर, माँग कर रहा है कि इस आदमी के मुँह में ज़बरदस्ती खाना डाल दो। सवाल यह नहीं कि सोनम वांगचुक को खाना खिलाना चाहिए या नहीं — सवाल यह है कि यह 'चिंता' असली है या कोई और इस वकील के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहा है?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एक अधिवक्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर माँग की है कि जलवायु और लद्दाख अधिकार कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को मेडिकल आधार पर जबरन खाना खिलाने (फ़ोर्स-फ़ीडिंग) के निर्देश दिए जाएँ। याचिकाकर्ता का तर्क है कि वांगचुक की जान ख़तरे में है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राज्य का यह कर्तव्य है कि वह नागरिक के जीवन की रक्षा करे।
ऊपर से यह एक मानवीय चिंता लगती है। लेकिन ज़रा पर्दा उठाकर देखिए — यही वह क्लासिक पैटर्न है जो भारत में बार-बार दोहराया गया है: जब सरकार किसी अनशनकारी की माँग नहीं मानना चाहती, लेकिन सीधे तौर पर आंदोलन कुचलने का राजनीतिक जोखिम भी नहीं उठा सकती, तो एक 'तीसरा पक्ष' अचानक प्रकट होता है — एक ऐसा वकील, एक ऐसी PIL, जो 'जनहित' के नाम पर कोर्ट से वही आदेश माँगती है जो सरकार चाहती है लेकिन ख़ुद नहीं माँग सकती।
इसे 'प्रॉक्सी लिटिगेशन' कहते हैं — और भारतीय राजनीति में इसकी जड़ें गहरी हैं।
रामदेव से अन्ना तक — अनशन तोड़ने का पुराना नुस्ख़ा
2011 में बाबा रामदेव रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अनशन पर बैठे — आधी रात को पुलिस ने आँसू गैस छोड़कर मैदान ख़ाली कराया। जनता ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। उसी साल अन्ना हज़ारे के अनशन के दौरान सरकार ने सीधी कार्रवाई का रास्ता छोड़ा और मध्यस्थता, बातचीत और 'स्वास्थ्य चिंता' का मुखौटा पहना। पैटर्न साफ़ है: जब सीधा दमन राजनीतिक रूप से महँगा पड़े, तो संस्थागत रास्ते से — कोर्ट के ज़रिए, मेडिकल बोर्ड के ज़रिए — अनशन ख़त्म करवाओ। सरकार के हाथ साफ़, आदेश कोर्ट का।
वांगचुक का मामला इसी टेम्पलेट पर चल रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इस बार कोर्ट से सीधे 'जबरन खिलाने' की माँग की गई है — जो अनुच्छेद 21 के 'जीने के अधिकार' को 'जबरन जिलाने के अधिकार' में बदलने की कोशिश है। अगर कोर्ट यह आदेश दे देता है, तो सरकार के पास वैध बहाना होगा: हम तो कोर्ट का आदेश मान रहे हैं — पुलिस भेजी, डॉक्टर भेजे, अनशन 'मेडिकल इमरजेंसी' के नाम पर तोड़ दिया। छठी अनुसूची? वह बात बाद में।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यही है कि यह याचिका 'स्वतःस्फूर्त जनहित' नहीं है। ट्रेड हलकों और क़ानूनी विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि ऐसी PIL अक्सर 'ऑर्केस्ट्रेटेड' होती हैं — यानी कोई और लिखवाता है, कोई और दायर करता है। दिल्ली के वकीलों के बीच यह बात खुलकर हो रही है कि जिस वकील ने याचिका दायर की, उसका लद्दाख से या वांगचुक से कोई पुराना जुड़ाव नहीं दिखता। सवाल उठता है: अचानक इतनी 'चिंता' क्यों? (यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
अनुच्छेद 21 का दोधारी इस्तेमाल
भारतीय न्यायशास्त्र में अनुच्छेद 21 — 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार' — सबसे शक्तिशाली और सबसे लचीला हथियार है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके दायरे में स्वच्छ हवा से लेकर सम्मान से मरने के अधिकार तक को शामिल किया है। लेकिन यहाँ विडंबना देखिए: जिस अनुच्छेद 21 के तहत वांगचुक को अपनी बात कहने, विरोध करने और अनशन पर बैठने का अधिकार मिलता है — उसी अनुच्छेद 21 को पलटकर उनका अनशन तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यह वही तर्क है जो जेलों में क़ैदियों की भूख हड़ताल तोड़ने के लिए दिया जाता है — लेकिन वांगचुक कोई क़ैदी नहीं, एक स्वतंत्र नागरिक हैं।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि अगर दिल्ली हाईकोर्ट इस याचिका पर सुनवाई करता है और मेडिकल बोर्ड गठित करने तक का भी आदेश देता है, तो वह अपने-आप में सरकार को वह 'कवर' दे देगा जिसकी उसे ज़रूरत है। अनशन तोड़ने का काम पुलिस करेगी, लेकिन ज़िम्मेदारी कोर्ट के कंधों पर होगी। लद्दाख की छठी अनुसूची की माँग — जिसके लिए वांगचुक भूखे बैठे हैं — उस पर बात करने की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाएगी।
लद्दाख का अनसुना दर्द
2019 में जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया, तो लद्दाखी समुदाय को भरोसा दिलाया गया था कि उन्हें छठी अनुसूची के तहत विशेष सुरक्षा मिलेगी — जो आदिवासी क्षेत्रों की ज़मीन, संस्कृति और पहचान की रक्षा करती है। छह साल बीत गए — वह वादा अभी तक काग़ज़ पर ही है। वांगचुक 2024 में भी दिल्ली तक पैदल मार्च कर चुके हैं, तब भी सरकार ने 'बातचीत' का आश्वासन दिया और फिर चुप्पी साध ली। अब 2026 में फिर अनशन — और फिर वही सन्नाटा, बस इस बार एक PIL का शोर ज़रूर है।
मामले की तह में जाएँ तो लद्दाख की माँग न तो अलगाववादी है, न ग़ैर-संवैधानिक। छठी अनुसूची पहले से पूर्वोत्तर के कई राज्यों में लागू है। लेकिन लद्दाख को यह देने का मतलब होगा कि केंद्र सरकार को वहाँ की ज़मीन और संसाधनों पर सीधा नियंत्रण कम करना पड़ेगा — और यही वह बिंदु है जहाँ राजनीतिक गणित अड़ जाता है।
आगे क्या होगा — कोर्ट के सामने असली परीक्षा
दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अब दो रास्ते हैं। पहला: याचिका को सिरे से ख़ारिज करे और कहे कि एक स्वतंत्र नागरिक का शांतिपूर्ण विरोध उसका मौलिक अधिकार है — इससे सरकार को कोई कवर नहीं मिलेगा और उसे वांगचुक से सीधे बात करनी होगी। दूसरा: मेडिकल बोर्ड गठित करने या 'स्वास्थ्य निगरानी' का आदेश दे — जो देखने में मानवीय लगेगा, लेकिन असल में अनशन तोड़ने का क़ानूनी रास्ता खोल देगा।
अगर कोर्ट दूसरा रास्ता चुनता है, तो उम्मीद कीजिए कि अगले 48-72 घंटों में वांगचुक के अनशन स्थल पर मेडिकल टीम और पुलिस दोनों पहुँचेंगी। और अगर पहला रास्ता चुनता है, तो सरकार पर दबाव बनेगा कि वह छठी अनुसूची पर ठोस जवाब दे — कुछ ऐसा जो वह छह साल से टालती आ रही है।
असली सवाल यह नहीं है कि वांगचुक को खाना खिलाना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है: क्या भारतीय लोकतंत्र में अब शांतिपूर्ण अनशन का मतलब सिर्फ़ तब तक है जब तक सरकार को तकलीफ़ न हो — और जैसे ही तकलीफ़ हुई, कोई 'तीसरा पक्ष' कोर्ट पहुँच जाएगा, 'जनहित' का मुखौटा लगाकर?
अगर यह पैटर्न सफल हुआ, तो कल किसी भी अनशनकारी का — चाहे वह किसान हो, मज़दूर हो या आदिवासी — अनशन एक PIL से तोड़ा जा सकेगा। और विरोध का अधिकार सिर्फ़ एक संवैधानिक सजावट बनकर रह जाएगा।
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आरोप: इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
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मुख्य बातें
- एक अधिवक्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में सोनम वांगचुक को मेडिकल आधार पर जबरन खाना खिलाने की याचिका दायर की है — द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार।
- यह भारत में 'प्रॉक्सी लिटिगेशन' के उसी पैटर्न का हिस्सा हो सकती है जो रामदेव और अन्ना हज़ारे के अनशन के दौरान भी दिखा था।
- अनुच्छेद 21 को दोधारी तलवार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है — जीवन के अधिकार के नाम पर विरोध का अधिकार छीनने की कोशिश।
- लद्दाख को छठी अनुसूची देने का वादा 2019 से अधूरा है — यही वांगचुक के अनशन की मूल वजह है।
- अगर कोर्ट मेडिकल बोर्ड या निगरानी का आदेश देता है तो सरकार को अनशन तोड़ने का क़ानूनी कवर मिल जाएगा।
आँकड़ों में
- छठी अनुसूची का वादा 2019 से — लगभग 6 साल से अधूरा
- 2024 में वांगचुक दिल्ली तक पैदल मार्च कर चुके, सरकार ने बातचीत का आश्वासन दिया पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया
- अनुच्छेद 21 का इस्तेमाल अब तक स्वच्छ हवा, सम्मान से मरने के अधिकार से लेकर जबरन खिलाने तक — दायरा लगातार बदल रहा
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: एक अधिवक्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की; याचिका सोनम वांगचुक के अनशन से जुड़ी है (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- क्या: याचिका में कोर्ट से निर्देश माँगा गया है कि वांगचुक को मेडिकल आधार पर जबरन खाना खिलाया जाए (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- कब: 2026 में वांगचुक के जारी अनशन के दौरान यह याचिका दायर की गई (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- कहाँ: दिल्ली हाईकोर्ट में यह याचिका दाखिल हुई (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- क्यों: याचिकाकर्ता का तर्क है कि वांगचुक की जान ख़तरे में है और राज्य का कर्तव्य है कि नागरिक के जीवन की रक्षा करे (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- कैसे: अधिवक्ता ने जनहित याचिका (PIL) के ज़रिए कोर्ट को मेडिकल इंटरवेंशन का आदेश देने की अपील की (द इंडियन एक्सप्रेस)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सोनम वांगचुक कौन हैं और वे अनशन पर क्यों बैठे हैं?
सोनम वांगचुक लद्दाख के प्रसिद्ध जलवायु और अधिकार कार्यकर्ता हैं। वे लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष सुरक्षा दिए जाने की माँग को लेकर अनशन पर हैं — यह माँग 2019 से अधूरी है।
जबरन खाना खिलाने की याचिका किसने और क्यों दायर की?
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार एक अधिवक्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि वांगचुक की जान ख़तरे में है और अनुच्छेद 21 के तहत राज्य का कर्तव्य है कि नागरिक का जीवन बचाए।
प्रॉक्सी लिटिगेशन क्या होती है?
प्रॉक्सी लिटिगेशन वह होती है जब कोई तीसरा पक्ष — अक्सर सरकार के इशारे पर — कोर्ट में ऐसी याचिका दायर करता है जो असल में सरकार के हित में हो, लेकिन सरकार सीधे उसे दायर नहीं करना चाहती।
छठी अनुसूची क्या है और लद्दाख के लिए क्यों ज़रूरी है?
छठी अनुसूची संविधान का वह प्रावधान है जो आदिवासी क्षेत्रों की ज़मीन, संस्कृति और प्रशासनिक स्वायत्तता की रक्षा करता है। लद्दाखी समुदाय चाहता है कि UT बनने के बाद उनकी ज़मीन और पहचान पर बाहरी दख़ल से सुरक्षा मिले।