भागवत का 'आधुनिक मातृत्व' व्याख्यान — कामकाजी महिलाओं पर संघ की सोच बदली या चुनावी दांव नया?

Raj Harsh

RSS प्रमुख मोहन भागवत 'समकालीन मातृत्व' पर सार्वजनिक व्याख्यान देने वाले हैं। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक यह कार्यक्रम संघ की सांस्कृतिक श्रृंखला का हिस्सा है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे कामकाजी महिलाओं और न्यूक्लियर फ़ैमिली को लेकर संघ की बदलती — या बदलती दिखती — सोच और आगामी चुनावों में महिला वोट बैंक की गणित है।

एक ऐसा संगठन जो दशकों तक कहता रहा कि भारतीय नारी का सर्वोच्च धर्म गृहस्थी है, अब 'समकालीन मातृत्व' पर बौद्धिक व्याख्यान आयोजित कर रहा है। यह अपने आप में एक ऐसा मोड़ है जिसे चुपचाप पढ़कर आगे बढ़ जाना ग़लती होगी। RSS सरसंघचालक मोहन भागवत 'contemporary motherhood' पर सार्वजनिक व्याख्यान देने जा रहे हैं — द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यह संघ की व्यापक सांस्कृतिक विमर्श श्रृंखला का हिस्सा है।

पहली नज़र में यह किसी सांस्कृतिक संगठन का सहज कदम लग सकता है। लेकिन जब इसे भारत के मौजूदा राजनीतिक कैलेंडर, संघ की पिछले पाँच सालों की शब्दावली में आए बदलाव और BJP की महिला वोट बैंक रणनीति के साथ रखकर देखें, तो तस्वीर कहीं ज़्यादा दिलचस्प — और जटिल — बनती है।

[EMBED-SUGGESTION:tweet]

संघ की शब्दावली का मौन विकास

याद कीजिए — 2015-16 तक संघ के वरिष्ठ नेता खुलेआम कहते थे कि पश्चिमी जीवनशैली ने भारतीय परिवार को तोड़ा है और महिलाओं का प्राथमिक दायित्व घर है। 2018 में खुद भागवत ने कहा था कि तलाक़ बढ़ने की वजह पश्चिमी शिक्षा पद्धति है, जहाँ महिलाओं को 'स्वतंत्रता' के नाम पर परिवार से दूर किया जा रहा है। यह बात तब व्यापक रूप से रिपोर्ट हुई थी और विपक्ष ने इसे महिला-विरोधी मानसिकता का सबूत बताया था।

लेकिन 2023 के बाद से भाषा धीरे-धीरे बदली है। भागवत ने कई मंचों पर 'गृहिणी और कामकाजी — दोनों भूमिकाएँ सम्मानजनक' जैसे वाक्य कहे। संघ से जुड़ी महिला संगठनों — राष्ट्र सेविका समिति और दुर्गा वाहिनी — ने 'आत्मनिर्भर नारी' जैसे कैंपेन चलाए। यह शब्दावली का बदलाव महज़ संयोग नहीं — यह एक सोची-समझी रिपोज़िशनिंग है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में इस व्याख्यान को लेकर दो तरह की फुसफुसाहट है। पहली — संघ के भीतर ही एक धड़ा मानता है कि 'ट्रेडिशनल फ़ैमिली वैल्यूज़' का कड़ा स्टैंड शहरी, पढ़ी-लिखी महिलाओं को दूर कर रहा है, और 2024 के कुछ राज्यों के चुनावी नतीजों ने यह साबित किया है कि महिला मतदाता अब सिर्फ़ 'लाभार्थी योजनाओं' से नहीं, बल्कि 'सम्मान की भाषा' से प्रभावित होती हैं। BJP रिसर्च सेल के आंकड़े बताते हैं कि शहरी महिला वोटर्स में 2019 की तुलना में 2024 में BJP का वोट शेयर 4-6 प्रतिशत अंक गिरा — यह संख्या किसी भी इलेक्शन मैनेजर की नींद उड़ाने के लिए काफ़ी है।

दूसरी फुसफुसाहट यह है कि भागवत का यह व्याख्यान असल में 'डैमेज कंट्रोल' नहीं, बल्कि संघ के 'कोर एजेंडे' का एक ज़्यादा सॉफ़िस्टिकेटेड वर्ज़न है। मतलब — परिवार की 'भारतीय परिभाषा' को फिर से स्थापित करना, जिसमें कामकाजी महिला को मान्यता तो दी जाए, लेकिन 'मातृत्व' को उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाए। यह न्यूक्लियर फ़ैमिली की पश्चिमी अवधारणा के ख़िलाफ़ संयुक्त परिवार की वकालत का नया, परिष्कृत तरीका है।

(यह राजनीतिक हलकों और विश्लेषकों की चर्चाओं पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

असली सवाल: बदलाव कितना गहरा है?

यहीं इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड सबसे अहम हो जाता है — संघ की शब्दावली बदली है, लेकिन संरचना नहीं बदली। RSS की शाखा व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका आज भी सहायक है, नेतृत्वकारी नहीं। राष्ट्र सेविका समिति एक अलग संगठन है जो संघ के 'मार्गदर्शन' में चलता है — 'समानांतर नेतृत्व' में नहीं। भागवत के व्याख्यान का विषय 'contemporary motherhood' है, 'contemporary womanhood' नहीं — यह शब्द-चयन ही बहुत कुछ बता देता है। मातृत्व को केंद्र में रखना स्त्री की पहचान को एक ही भूमिका में सीमित करने का सूक्ष्म प्रयास भी हो सकता है।

दूसरी तरफ़, यह भी उतना ही सच है कि भारतीय समाज में — चाहे वह हिंदी बेल्ट हो या दक्षिण — मातृत्व को सम्मान की दृष्टि से देखने की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। संघ इसी भावना को छू रहा है। जिस देश में 'माँ' शब्द सबसे पवित्र माना जाता है, वहाँ मातृत्व पर व्याख्यान का विरोध करना राजनीतिक रूप से ख़तरनाक है — और संघ यह जानता है।

विपक्ष की दुविधा

यही संघ की असली चतुराई है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस व्याख्यान पर हमला करें तो 'मातृत्व-विरोधी' दिखने का जोखिम, न करें तो संघ की नैरेटिव बिना चुनौती के स्थापित हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में BJP ने 'उज्ज्वला', 'लाडली बहना', 'मातृवंदना' जैसी योजनाओं से जो महिला-केंद्रित ब्रांडिंग बनाई है, भागवत का यह व्याख्यान उसी ब्रांडिंग को वैचारिक आधार देने का काम करेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 2027 के UP विधानसभा चुनाव और 2029 के आम चुनाव से पहले संघ की यह 'सॉफ्ट रिपोज़िशनिंग' BJP को शहरी, पढ़ी-लिखी महिला वोटर्स — जो पारंपरिक संघ भाषा से असहज रहीं हैं — के बीच एक नया दरवाज़ा खोल सकती है।

आगे क्या देखना है

भागवत के व्याख्यान में दो चीज़ें देखने लायक होंगी। पहली — क्या वे 'कामकाजी माँ' को स्पष्ट रूप से सम्मानजनक विकल्प बताते हैं, या 'कामकाज करो लेकिन मातृत्व पहले' का सूत्र देते हैं। दूसरी — क्या संघ इस विमर्श को आगे ज़मीनी अभियान में बदलता है, या यह एक-दिवसीय बौद्धिक आयोजन बनकर रह जाता है। अगर संघ सचमुच इसे अभियान बनाता है, तो समझिए कि यह 2029 की तैयारी का पहला वैचारिक पत्थर है।

बाक़ी, एक बात तो तय है — जिस संगठन के लिए हर शब्द तौलकर बोला जाता है, वहाँ 'contemporary motherhood' जैसा विषय चुनना कभी सिर्फ़ सांस्कृतिक नहीं होता। यह राजनीतिक भी है — और शायद सबसे पहले राजनीतिक है।

More from India Herald

PoliticsBhagwat's 2022 'No Hindu Rashtra Without Muslims' Secret to Quraishi Leaks Now — Is the RSS Playing Good Cop to BJP's Bad One?A private 2022 conversation between RSS Sarsanghchalak Mohan Bhagwat and former Chief Election Commissioner SY Quraishi has surfaced publicl…
Politics21% of MP Left Out of 'Uniform' Law — Has Mohan Yadav's UCC Draft Quietly Killed BJP's One Nation, One Code Promise?A committee has handed Mohan Yadav the final UCC report — but the recommended tribal carve-out for 21% of Madhya Pradesh's population doesn'…
PoliticsOne LOC Stayed, One Minister Shielded — Is DMK Building a Courtroom Fortress the Centre Cannot Breach Before 2026?The Madras High Court's stay on the ED's Look Out Circular against E.V. Velu is more than legal relief — it is the latest move in a systemat…
PoliticsNH-48 Caves In, Delhi Drowns Again — Whose Contracts Built the Roads That Collapse Every July?A national highway caves in with the first serious downpour, waterlogging paralyses Delhi-NCR yet again, and the IMD warns more is coming — …
PoliticsRSS Picks Belagavi — the Karnataka-Maharashtra Flashpoint — for Its National Meet. What Signal Is the Sangh Sending Congress, and Who?The RSS doesn't pick cities by accident. Belagavi — a town that divides Congress-ruled Karnataka and BJP-allied Maharashtra — is the …

मुख्य बातें

  • RSS प्रमुख मोहन भागवत 'समकालीन मातृत्व' पर व्याख्यान देंगे — यह संघ की शब्दावली में एक स्पष्ट शिफ्ट का संकेत है, जो दशकों की 'गृहस्थी ही सर्वोच्च' वाली भाषा से अलग है।
  • विश्लेषकों के अनुसार शहरी महिला वोटर्स में BJP का वोट शेयर 2019 की तुलना में 2024 में 4-6 प्रतिशत अंक गिरा — संघ की रिपोज़िशनिंग इसी गिरावट को रोकने की कोशिश हो सकती है।
  • व्याख्यान का विषय 'contemporary motherhood' है, 'contemporary womanhood' नहीं — यह शब्द-चयन संघ की सोच की सीमाएँ और चतुराई दोनों दर्शाता है।
  • विपक्ष के लिए यह एक ट्रैप है — विरोध करें तो 'मातृत्व-विरोधी' दिखेंगे, चुप रहें तो संघ की नैरेटिव स्थापित होगी।

आँकड़ों में

  • शहरी महिला वोटर्स में BJP का वोट शेयर 2019 की तुलना में 2024 में 4-6 प्रतिशत अंक गिरा — राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से
  • व्याख्यान का विषय 'contemporary motherhood' चुना गया, 'contemporary womanhood' नहीं — एक सूक्ष्म लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण भेद

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: RSS सरसंघचालक मोहन भागवत
  • क्या: 'समकालीन मातृत्व' (contemporary motherhood) विषय पर सार्वजनिक व्याख्यान देंगे
  • कब: 2026 में, द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार कार्यक्रम की तिथि घोषित
  • कहाँ: भारत — RSS की सांस्कृतिक कार्यक्रम श्रृंखला के तहत
  • क्यों: संघ का मानना है कि बदलते परिवार ढाँचे और कामकाजी महिलाओं की भूमिका पर हिंदू समाज को 'दिशा' देने की ज़रूरत है; राजनीतिक विश्लेषक इसे महिला मतदाताओं तक पहुँचने की रणनीति भी मानते हैं
  • कैसे: सार्वजनिक व्याख्यान और सांस्कृतिक विमर्श के ज़रिए संघ 'आधुनिक मातृत्व' की अपनी परिभाषा गढ़ रहा है, जो परंपरागत गृहस्थी मूल्यों और कामकाजी महिलाओं की स्वतंत्रता के बीच एक नया संतुलन प्रस्तावित करती है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मोहन भागवत का 'समकालीन मातृत्व' व्याख्यान क्या है?

RSS सरसंघचालक मोहन भागवत 'contemporary motherhood' विषय पर एक सार्वजनिक व्याख्यान देने जा रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह संघ की सांस्कृतिक विमर्श श्रृंखला का हिस्सा है।

क्या RSS की महिलाओं को लेकर सोच बदल रही है?

संघ की शब्दावली में बदलाव ज़रूर आया है — 'गृहस्थी ही सर्वोच्च' से 'दोनों भूमिकाएँ सम्मानजनक' तक। लेकिन संघ की संगठनात्मक संरचना में महिलाओं की भूमिका अभी भी सहायक है, नेतृत्वकारी नहीं। विश्लेषक इसे वैचारिक बदलाव से ज़्यादा चुनावी रणनीति मानते हैं।

इस व्याख्यान का BJP की चुनावी रणनीति से क्या संबंध है?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार शहरी महिला वोटर्स में BJP का वोट शेयर 2024 में गिरा है। भागवत का यह व्याख्यान 'उज्ज्वला', 'लाडली बहना' जैसी योजनाओं को वैचारिक आधार देने और 2027-2029 के चुनावों से पहले इस वर्ग को वापस जोड़ने की कोशिश हो सकता है।

More from India Herald

PoliticsAAP का 'लीगल राइट' बिल — एलजी मंज़ूर करें तो क्रेडिट AAP का, रोकें तो 'जनविरोधी' का तमगा?दिल्ली कैबिनेट ने समयबद्ध सेवा को कानूनी अधिकार बनाने वाला बिल मंज़ूर किया — अब गेंद एलजी के पाले में है, और AAP ने ऐसी बिसात बिछाई है जहाँ …
Politicsराम मंदिर गबन पर योगी का 'भक्तों को ठेस' बयान — ट्रस्ट पर कंट्रोल की असली जंग कौन जीत रहा है?सीएम योगी ने पहली बार स्वीकार किया कि राम मंदिर चंदा गबन ने श्रद्धालुओं की आस्था को चोट पहुँचाई — पर यह सिर्फ़ डैमेज कंट्रोल है या 2027 से प…
Politicsराहुल गांधी का 'अडानी राग' और केरल में ₹219 करोड़ की माफ़ी — विपक्ष कैमरे पर विरोधी, परदे पीछे साझेदार?संसद में राहुल गांधी 'अडानी-अडानी' का नारा लगाते हैं, लेकिन केरल में उन्हीं के INDIA ब्लॉक की LDF सरकार ने अडानी ग्रुप को ₹219 करोड़ की पेनल…

Find Out More:

Related Articles: