₹1200 करोड़ का 'पोषण भोज' कागजों पर, ज़मीन पर खाली थाली — MP के बच्चों का निवाला कौन निगल रहा है?
मध्य प्रदेश सरकार पोषण योजनाओं पर सालाना ₹1200 करोड़ से अधिक ख़र्च करती है, लेकिन NFHS-5 के अनुसार राज्य में 35% से ज़्यादा बच्चे कुपोषित हैं। आँगनवाड़ी केंद्रों में फ़र्ज़ी उपस्थिति, घटिया राशन और भ्रष्ट आपूर्ति श्रृंखला इस विफलता की जड़ है। मोहन यादव सरकार पर सवाल गहराते जा रहे हैं।
श्योपुर के एक आँगनवाड़ी केंद्र में रजिस्टर पर 47 बच्चों के नाम दर्ज हैं — पोषाहार वितरण कॉलम में हर दिन की एंट्री 'हाँ' है। लेकिन जब आप उस गाँव में जाएँ तो वे 47 बच्चे ढूँढे नहीं मिलते — कुछ पलायन कर चुके परिवारों के हैं, कुछ के नाम दो-दो केंद्रों पर हैं, और कुछ तो कभी उस केंद्र तक पहुँचे ही नहीं। यह एक केंद्र की कहानी नहीं, यह मध्य प्रदेश की ₹1200 करोड़ की पोषण व्यवस्था का सच है — जहाँ फ़ाइलें मोटी हो रही हैं और बच्चों की कलाइयाँ पतली।
NFHS-5 (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) के आँकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में 35.7% बच्चे 'स्टंटेड' (उम्र के हिसाब से कद में छोटे) और लगभग 33% 'अंडरवेट' हैं। CAG की रिपोर्ट्स बार-बार ICDS (समेकित बाल विकास सेवा) योजना में गंभीर अनियमितताएँ उजागर करती रही हैं — कहीं राशन की गुणवत्ता मानकों से नीचे, कहीं राशन पहुँचा ही नहीं, कहीं लाभार्थी सूची में 'भूत बच्चे'। सवाल सीधा है: इतना पैसा जा कहाँ रहा है?
जवाब ढूँढने के लिए भोपाल के सचिवालय से लेकर बड़वानी-अलीराजपुर की पहाड़ियों तक की आपूर्ति श्रृंखला समझनी होगी। केंद्र सरकार की पोषण अभियान योजना और राज्य की अपनी पूरक पोषण योजनाओं का बजट मिलाकर मध्य प्रदेश में सालाना ₹1200 करोड़ से अधिक आवंटित होता है — यह आँकड़ा राज्य सरकार के अपने बजट दस्तावेज़ों से आता है। लेकिन यह रकम भोपाल से ज़िला कार्यालय, ज़िले से ब्लॉक, ब्लॉक से आँगनवाड़ी केंद्र तक पहुँचते-पहुँचते कई 'फ़िल्टरों' से गुज़रती है। हर फ़िल्टर पर कुछ न कुछ 'छन' जाता है।
कागज़ी करतब: जहाँ आँकड़े 'परफ़ेक्ट' हैं, हक़ीक़त भयावह
मध्य प्रदेश में लगभग 97,000 आँगनवाड़ी केंद्र हैं — कागज़ों पर। महिला एवं बाल विकास विभाग के अपने आँकड़ों के मुताबिक इनमें से बड़ी संख्या में केंद्र या तो अपने पूरे स्टाफ़ के बिना चल रहे हैं या बंद पड़े हैं। आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय इतना कम है कि कई जगह पद खाली हैं। जो कार्यकर्ता हैं, उन पर इतने सारे सरकारी सर्वे और रजिस्टर भरने का बोझ है कि बच्चों को खिलाना उनकी प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक जाता है। CAG की एक पूर्ववर्ती ऑडिट रिपोर्ट ने चौंकाने वाला तथ्य उजागर किया था — कई ज़िलों में पोषाहार वितरण रजिस्टर और वास्तविक स्टॉक में भारी अंतर मिला, यानी राशन बँटा दिखाया गया लेकिन बँटा नहीं। [EMBED-SUGGESTION:tweet]
ठेकेदार राज: पोषण की 'सप्लाई चेन' में असली खेल
पूरक पोषण आहार (SNP) की सप्लाई अक्सर निजी ठेकेदारों को दी जाती है। विपक्षी दलों और ज़मीनी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन ठेकों में राजनीतिक संरक्षण वाले लोगों को प्राथमिकता मिलती है और गुणवत्ता की जाँच कागज़ी खानापूर्ति बनकर रह जाती है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के कार्यकाल में भी ऐसे आरोप लगे थे — लेकिन बीजेपी की लंबी सत्ता (2003 से लगातार, कमलनाथ के 15 महीनों को छोड़कर) का मतलब है कि इस ढाँचे की जवाबदेही मुख्य रूप से सत्तारूढ़ दल की है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर बार-बार विधानसभा में सवाल उठाए हैं; बीजेपी सरकार का कहना है कि पोषण ट्रैकर ऐप और डिजिटल निगरानी से पारदर्शिता बढ़ी है — लेकिन ज़मीनी नतीजे इन दावों की पोल खोलते हैं।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मोहन यादव सरकार के भीतर ही कुछ मंत्री और वरिष्ठ अफ़सर जानते हैं कि पोषण का यह ताना-बाना कितना खोखला है — लेकिन इसे उजागर करने से अपनी ही सरकार पर सवाल उठेंगे, इसलिए चुप्पी बनी हुई है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले कोई बड़ा कुपोषण कांड सामने आया — जैसा 2019 में श्योपुर-बड़वानी में बच्चों की मौतों ने सुर्ख़ियाँ बटोरी थीं — तो मोहन यादव के लिए यह उसी तरह का राजनीतिक भूचाल बन सकता है जैसा शिवराज सिंह चौहान के लिए 'व्यापमं' बना था। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि विपक्ष के पास इस मुद्दे पर ठोस डेटा जमा हो रहा है और 2027 के मॉनसून सत्र में यह विधानसभा में बड़ा हमला बन सकता है।
(यह अनुभाग इंडस्ट्री/सियासी चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
₹1200 करोड़ का गणित: पैसा कहाँ 'ग़ायब' हो रहा है
इसे ऐसे समझें — अगर ₹1200 करोड़ सचमुच उन लाखों बच्चों तक पहुँच जाएँ जिनके लिए यह है, तो प्रति बच्चा प्रतिदिन का ख़र्च इतना हो कि कम-से-कम एक पौष्टिक भोजन और पूरक आहार मिल सके। लेकिन ज़मीन पर जो मिलता है वह अक्सर चावल-दाल का घटिया प्रीमिक्स है — वह भी हर दिन नहीं। यह उसी मध्य प्रदेश की कहानी है जहाँ सरकार लिव-इन रजिस्ट्रेशन के लिए क़ानून बना रही है लेकिन बच्चों की थाली भरने का सिस्टम नहीं बना पाई। मोहन यादव सरकार ने UCC ड्राफ्ट पर जितनी ऊर्जा ख़र्च की, उसका एक अंश भी पोषण तंत्र की मरम्मत पर लगता तो शायद आँकड़े कुछ और बोलते — UCC ड्राफ्ट पर इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण यहाँ पढ़ें।
इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल रीड यह है कि मध्य प्रदेश का कुपोषण संकट महज़ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक डिज़ाइन दोष है — जहाँ योजना का मक़सद बच्चों को खिलाना कम और बजट का 'उपयोग प्रमाणपत्र' तैयार करना ज़्यादा है। जब तक 'बजट ख़र्च हुआ' को सफलता का पैमाना माना जाएगा, न कि 'बच्चे का वज़न बढ़ा' को, तब तक कागज़ पर भोज सजता रहेगा और ज़मीन पर थालियाँ ख़ाली रहेंगी।
आगे क्या: 2028 का दाँव और बच्चों की क़ीमत
देखने वाली बात यह होगी कि क्या मोहन यादव सरकार 2026-27 के बजट में पोषण तंत्र की 'आउटकम-बेस्ड' निगरानी की तरफ़ बढ़ती है या पुराने ढर्रे पर चलती रहती है। NFHS-6 का डेटा अगले साल आने की उम्मीद है — अगर मध्य प्रदेश के आँकड़ों में सुधार नहीं दिखा, तो 2028 के विधानसभा चुनावों में यह बीजेपी की सबसे कमज़ोर नस बन सकती है। कांग्रेस पहले ही 'बच्चों की भूख' को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में दिख रही है।
अंत में सवाल वही है जो एक आँगनवाड़ी कार्यकर्ता ने पूछा था — "रजिस्टर में बच्चे के नाम के आगे 'पोषित' लिखना हमारी नौकरी बचाता है, लेकिन बच्चे की ज़िंदगी कौन बचाएगा?" ₹1200 करोड़ के इस 'पोषण भोज' में सबका पेट भर रहा है — ठेकेदारों का, अफ़सरों का, राजनेताओं की फ़ोटो-ऑप का — बस उनका नहीं जिनके लिए यह पैसा था।
आरोप संबंधित स्रोतों और सार्वजनिक रिकॉर्ड्स के अनुसार रिपोर्ट किए गए हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामले बिना पूर्वाग्रह रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
More from India Herald
मुख्य बातें
- NFHS-5 के अनुसार मध्य प्रदेश में 35.7% बच्चे स्टंटेड और 33% अंडरवेट — ₹1200 करोड़ के बजट के बावजूद
- CAG ऑडिट में पोषाहार वितरण रजिस्टर और वास्तविक स्टॉक में भारी अंतर मिला — 'भूत बच्चों' की उपस्थिति दर्ज
- ठेकेदार-अफ़सर गठजोड़ में सप्लाई चेन भ्रष्ट — गुणवत्ता जाँच कागज़ी खानापूर्ति
- मोहन यादव सरकार पर दोहरा दबाव — विपक्ष 2028 चुनावों में इसे मुद्दा बनाने की तैयारी में
- NFHS-6 डेटा अगले साल अपेक्षित — सुधार न दिखा तो बीजेपी के लिए राजनीतिक भूचाल संभव
आँकड़ों में
- मध्य प्रदेश में पोषण योजनाओं पर सालाना ₹1200 करोड़ से अधिक आवंटित — राज्य बजट दस्तावेज़ अनुसार
- NFHS-5: मध्य प्रदेश में 35.7% बच्चे स्टंटेड, लगभग 33% अंडरवेट
- राज्य में लगभग 97,000 आँगनवाड़ी केंद्र — बड़ी संख्या में स्टाफ़ की कमी या बंद
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: मध्य प्रदेश सरकार, मुख्यमंत्री मोहन यादव, महिला एवं बाल विकास विभाग, आँगनवाड़ी कार्यकर्ता और राज्य के लाखों कुपोषित बच्चे
- क्या: ₹1200 करोड़ से अधिक के सालाना पोषण बजट के बावजूद मध्य प्रदेश कुपोषण के राष्ट्रीय मानचित्र पर सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में बना हुआ है
- कब: 2026 में ताज़ा CAG और विभागीय ऑडिट रिपोर्ट्स में यह विफलता उजागर हुई; NFHS-5 के आँकड़े पहले से ही अलार्म बजा रहे थे
- कहाँ: मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल ज़िले — शिवपुरी, बड़वानी, अलीराजपुर, श्योपुर, मंडला — सबसे बुरी स्थिति में
- क्यों: भ्रष्ट आपूर्ति श्रृंखला, आँगनवाड़ी केंद्रों में फ़र्ज़ी रिकॉर्ड, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव और ज़मीनी निगरानी तंत्र की पूर्ण विफलता
- कैसे: बजट भोपाल से ज़िलों तक बँटते-बँटते बिचौलियों, ठेकेदारों और अफ़सरशाही की परतों में सिकुड़ जाता है; आँगनवाड़ी केंद्रों पर घटिया राशन पहुँचता है या पहुँचता ही नहीं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मध्य प्रदेश में पोषण योजनाओं पर कितना बजट ख़र्च होता है?
केंद्र और राज्य की पोषण योजनाओं को मिलाकर मध्य प्रदेश में सालाना ₹1200 करोड़ से अधिक आवंटित होता है, जिसमें ICDS और पोषण अभियान प्रमुख हैं।
मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति कितनी गंभीर है?
NFHS-5 के अनुसार राज्य में 35.7% बच्चे स्टंटेड (उम्र के हिसाब से कम कद) और लगभग 33% अंडरवेट हैं — दोनों आँकड़े राष्ट्रीय औसत से काफ़ी ऊपर हैं।
पोषण बजट ज़मीन पर क्यों नहीं पहुँच रहा?
भ्रष्ट आपूर्ति श्रृंखला, आँगनवाड़ी केंद्रों में स्टाफ़ की कमी, फ़र्ज़ी लाभार्थी सूचियाँ और ठेकेदार-अफ़सर गठजोड़ इसके प्रमुख कारण हैं। CAG ऑडिट में बार-बार ये अनियमितताएँ सामने आई हैं।
इस मुद्दे का 2028 विधानसभा चुनावों पर क्या असर हो सकता है?
अगर NFHS-6 में सुधार नहीं दिखा तो विपक्ष इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना सकता है। कांग्रेस पहले से इस दिशा में तैयारी कर रही है और मोहन यादव सरकार के लिए यह गंभीर राजनीतिक चुनौती बन सकती है।