Google Maps को आपकी गली का नाम कौन बताता है — और गड़बड़ होने पर ज़िम्मेदार कौन?

Singh Anchala

Google Maps भारत की गलियों के नाम मुख्यतः चार स्रोतों से जुटाता है: सैटेलाइट और Street View इमेजरी का AI विश्लेषण, सरकारी सर्वे और म्यूनिसिपल डेटाबेस, 30 करोड़ से ज़्यादा लोकल गाइड्स का क्राउडसोर्स्ड योगदान, और थर्ड-पार्टी डेटा प्रोवाइडर्स।

ज़रा सोचिए — आप किसी अनजान शहर में हैं, ऑटो वाले को पता बताइए तो वो कहता है 'भैया, गूगल मैप लगाओ।' आप लगाते हैं और स्क्रीन पर वो तंग गली, वो नुक्कड़ का पान की दुकान वाला मोड़, यहाँ तक कि 'शर्मा जी की गली' जैसा अनौपचारिक नाम भी दिख जाता है। सवाल यह है: गूगल को ये सब पता कैसे चलता है? ABP News की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक इसके पीछे एक बहुस्तरीय, लगातार चलने वाली डेटा मशीनरी काम करती है — और इसकी सबसे दिलचस्प कड़ी शायद आप ख़ुद हैं।

इस पूरे सिस्टम को समझने के लिए चार परतों को अलग-अलग देखना होगा। हर परत अकेली अधूरी है, लेकिन मिलकर ये वो नक्शा बनाती हैं जिस पर आज 10 करोड़ से ज़्यादा भारतीय रोज़ाना भरोसा करते हैं।

पहली परत: आसमान से आँखें — सैटेलाइट और Street View AI

Google अपनी सैटेलाइट इमेजरी और Street View कारों के कैमरों से दुनियाभर की सड़कों की तस्वीरें लेता है। लेकिन असली जादू तस्वीर लेने में नहीं, उसे पढ़ने में है। Google का Optical Character Recognition (OCR) — यानी टेक्स्ट पहचानने वाला AI — सड़क किनारे लगे साइनबोर्ड, दुकानों के नामपट्ट, सरकारी बोर्ड, यहाँ तक कि दीवारों पर पेंट किए गए पतों को स्कैन करता है और उनसे गली, सड़क या इलाके का नाम निकालता है। भारत जैसे देश में जहाँ एक ही गली का बोर्ड हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू तीनों में हो सकता है, यह मल्टी-लिंग्वल OCR काम आता है। Google के अपने AI ब्लॉग के अनुसार, 2023 तक Street View इमेजरी 100 से ज़्यादा देशों में 36 ट्रिलियन पिक्सल से ज़्यादा डेटा कवर कर चुकी थी।

लेकिन यहाँ एक पेंच है। भारत की बहुत-सी गलियों में कोई बोर्ड ही नहीं है — न सरकारी, न प्राइवेट। ऐसे में AI कितना भी होशियार हो, वो खाली दीवार से नाम नहीं गढ़ सकता। यहीं अगली परत आती है।

दूसरी परत: सरकारी ख़ज़ाना — Survey of India और म्यूनिसिपल डेटा

Google Maps सरकारी एजेंसियों से आधिकारिक भौगोलिक डेटा लाइसेंस लेता है। भारत में Survey of India (SOI) देश की सबसे पुरानी और अधिकृत मैपिंग संस्था है — 1767 से काम कर रही है। इसके अलावा नगरपालिकाओं, पंचायतों, राज्य सरकारों के प्रॉपर्टी टैक्स डेटाबेस और पिनकोड रजिस्ट्री में सड़कों और वार्डों के नाम दर्ज होते हैं।

समस्या? भारत में इन डेटाबेस का डिजिटाइज़ेशन बहुत असमान है। दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों का डेटा अपेक्षाकृत साफ़ है, लेकिन छोटे शहरों और गाँवों में अक्सर दशकों पुराने कागज़ी रिकॉर्ड ही उपलब्ध हैं जिनमें वर्तनी अलग-अलग मिलती है — 'गांधी नगर', 'गाँधीनगर', 'Gandhi Ngr' एक ही जगह के तीन अलग नाम। Google को इन सबको एक में मर्ज करना होता है, और यहीं AI और ह्यूमन दोनों से गलतियाँ होती हैं।

तीसरी परत: 30 करोड़+ की फ़ौज — Local Guides प्रोग्राम

यह शायद सबसे कम समझी जाने वाली और सबसे ज़्यादा ताकतवर परत है। Google का Local Guides प्रोग्राम 2015 में शुरू हुआ था, और ABP News की रिपोर्ट के मुताबिक आज दुनियाभर में इसके 30 करोड़ से ज़्यादा सदस्य हैं — जिनमें भारत सबसे बड़ा योगदानकर्ता देश है। ये आम लोग हैं — छात्र, दुकानदार, रिटायर्ड कर्मचारी — जो अपने मोहल्ले की जगहों के नाम, फ़ोटो, रिव्यू, और लोकेशन करेक्शन Google Maps पर जोड़ते हैं। बदले में उन्हें 'पॉइंट्स', बैज और कभी-कभी Google Drive स्टोरेज या इवेंट इन्विटेशन जैसे छोटे इनाम मिलते हैं।

अब यहाँ अर्थशास्त्र की बात करें तो तस्वीर साफ़ होती है। Google को इन 30 करोड़+ लोगों को कोई सैलरी नहीं देनी पड़ती। मतलब, दुनिया की सबसे विस्तृत मैपिंग सेवा का एक बड़ा हिस्सा मुफ़्त श्रम पर चलता है। एक अनुमान के मुताबिक अगर Google को यही काम पेशेवर सर्वेयर्स से कराना पड़ता, तो लागत अरबों डॉलर सालाना होती। लोकल गाइड्स को मिलने वाले 'इनाम' की कुल कीमत इसके मुकाबले नगण्य है — यह गिग इकॉनमी का वो संस्करण है जहाँ 'गिग वर्कर' को पता ही नहीं कि वो काम कर रहा है।

चौथी परत: थर्ड-पार्टी डेटा प्रोवाइडर्स — अदृश्य खिलाड़ी

इन तीन परतों के अलावा Google कई थर्ड-पार्टी कंपनियों से भी डेटा ख़रीदता या लाइसेंस लेता है। भारत में MapmyIndia (अब CE Info Systems के नाम से BSE-लिस्टेड) जैसी कंपनियाँ दशकों से ऑन-ग्राउंड सर्वे करके सड़कों, गलियों और पतों का डेटा बनाती रही हैं। Google Maps ने अतीत में कई ऐसी कंपनियों से डेटा लाइसेंस लिया है, हालाँकि Google सार्वजनिक रूप से अपने सभी डेटा स्रोतों का नाम नहीं बताता। CE Info Systems की वार्षिक रिपोर्ट 2025 के अनुसार, कंपनी के पास भारत के 7.5 लाख से ज़्यादा गाँवों और शहरों का मैप डेटा है।

इनसाइड टॉक

मैपिंग इंडस्ट्री के जानकारों में एक पुरानी चर्चा है कि Google Maps का असली 'प्रोडक्ट' नक्शा नहीं, बल्कि उस नक्शे से निकलने वाला लोकेशन डेटा है — जो विज्ञापनदाताओं को बेचा जाता है। जब कोई यूज़र किसी गली में 'नज़दीकी मेडिकल स्टोर' सर्च करता है, तो Google को पता चलता है कि उस पिनकोड में किस चीज़ की माँग है। ट्रेड हलकों में कहा जाता है कि Google Maps की रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा अब 'हाइपर-लोकल ऐड टारगेटिंग' से आता है — और इसके लिए गली-स्तर की सटीकता ज़रूरी है। यही कारण है कि Google इतना निवेश करता है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट आँकड़ा नहीं।)

तो गलतियाँ क्यों होती हैं?

अगर इतनी मज़बूत मशीनरी है तो फिर आए दिन Google Maps पर हास्यास्पद गलतियाँ क्यों दिखती हैं — किसी मंदिर की जगह मस्जिद का नाम, किसी सरकारी स्कूल का नाम 'ढाबा' दिखना, या किसी गाँव का नाम ही गायब हो जाना? इसकी जड़ उसी क्राउडसोर्सिंग मॉडल में है। कोई भी लोकल गाइड या सामान्य यूज़र 'Suggest an Edit' बटन दबाकर किसी जगह का नाम बदलने का सुझाव दे सकता है। Google का ऑटोमेटेड सिस्टम इन सुझावों की समीक्षा करता है, लेकिन हर बदलाव की मैन्युअल जाँच संभव नहीं — ख़ासकर भारत जैसे देश में जहाँ लाखों बदलाव रोज़ सबमिट होते हैं।

इंडिया हेराल्ड का आकलन यह है कि यह मॉडल अपनी ताकत और कमज़ोरी दोनों एक ही जगह से खींचता है: अगर ताकत यह है कि करोड़ों लोग मुफ़्त में डेटा जोड़ते हैं, तो कमज़ोरी यह है कि उनमें से कोई भी — जान-बूझकर या अनजाने में — ग़लत जानकारी भी जोड़ सकता है। Google ने 2024 में अपनी पॉलिसी ब्लॉग में माना था कि भारत में 'map vandalism' (जानबूझकर गलत एडिट) के मामले बढ़ रहे हैं और कंपनी ने AI-बेस्ड स्पैम डिटेक्शन को मज़बूत किया है।

आगे क्या देखें

भारत सरकार का GeM (Geospatial Energy Map) प्रोजेक्ट और ONDC जैसे ओपन-डेटा प्लेटफ़ॉर्म आगे चलकर Google Maps के एकाधिकार को चुनौती दे सकते हैं — अगर सरकारी मैप डेटा ओपन और अपडेटेड रहे, तो भारतीय विकल्पों जैसे MapmyIndia के लिए बराबरी का मौक़ा बनेगा। लेकिन जब तक 30 करोड़ लोकल गाइड्स Google के लिए मुफ़्त में काम करते रहेंगे, इस 'ख़ज़ाने' से मुकाबला आसान नहीं। असली सवाल यह नहीं कि Google Maps को नाम कहाँ से मिलते हैं — असली सवाल यह है कि जब आप अगली बार 'Suggest an Edit' दबाएँ, तो क्या आपको पता है कि आप अरबों डॉलर की कंपनी के लिए मुफ़्त काम कर रहे हैं?

इस रिपोर्ट को AI सहायता से इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत तैयार किया गया है; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • Google Maps चार मुख्य स्रोतों से नाम लेता है: सैटेलाइट/Street View AI, सरकारी डेटाबेस, 30 करोड़+ लोकल गाइड्स, और थर्ड-पार्टी डेटा प्रोवाइडर्स
  • Local Guides प्रोग्राम दुनिया का सबसे बड़ा 'अनपेड मैपिंग वर्कफ़ोर्स' है — भारत इसमें सबसे बड़ा योगदानकर्ता
  • Street View का OCR AI साइनबोर्ड और दीवारों पर लिखे नाम 100+ भाषाओं में पढ़ सकता है
  • गलतियों की जड़ वही क्राउडसोर्सिंग है जो ताकत है — कोई भी 'Suggest an Edit' से नाम बदल सकता है
  • Google Maps का असली बिज़नेस मैप नहीं, हाइपर-लोकल ऐड टारगेटिंग डेटा है — गली-स्तर सटीकता इसीलिए ज़रूरी

आँकड़ों में

  • Google Street View: 100+ देशों में 36 ट्रिलियन+ पिक्सल कवरेज (Google AI Blog, 2023)
  • Local Guides प्रोग्राम: 30 करोड़+ सदस्य वैश्विक, भारत सबसे बड़ा योगदानकर्ता (ABP News रिपोर्ट)
  • CE Info Systems (MapmyIndia): भारत के 7.5 लाख+ गाँवों-शहरों का मैप डेटा (वार्षिक रिपोर्ट 2025)

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: Google Maps और इसका Local Guides प्रोग्राम, Survey of India, नगरपालिका डेटाबेस, थर्ड-पार्टी डेटा कंपनियां और करोड़ों आम यूज़र्स
  • क्या: गूगल मैप्स सैटेलाइट इमेजरी, Street View AI, सरकारी डेटा, लोकल गाइड्स क्राउडसोर्सिंग और थर्ड-पार्टी प्रोवाइडर्स से गलियों-मोहल्लों के नाम जुटाता और अपडेट करता है
  • कब: यह प्रक्रिया 2005 में Google Maps लॉन्च के बाद से लगातार जारी है, भारत में Local Guides प्रोग्राम 2015 से सक्रिय — ABP News रिपोर्ट 2026
  • कहाँ: पूरे भारत सहित दुनियाभर में, ख़ासतौर पर भारत की जटिल शहरी और ग्रामीण बस्तियों में
  • क्यों: भारत में आधिकारिक पता प्रणाली असंगठित है, लाखों गलियों के कोई रजिस्टर्ड नाम नहीं — इसलिए गूगल को मल्टी-लेयर डेटा सोर्सिंग ज़रूरी है
  • कैसे: Street View कैमरे से AI साइनबोर्ड पढ़ता है (OCR), सरकारी रिकॉर्ड से क्रॉस-वेरिफ़ाई करता है, लोकल गाइड्स नाम/फ़ोटो/रिव्यू जोड़ते हैं, थर्ड-पार्टी कंपनियां फ़ील्ड सर्वे डेटा देती हैं — फिर एल्गोरिदम इन सबको मर्ज करता है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Google Maps को गलियों के नाम कहाँ से मिलते हैं?

मुख्यतः चार स्रोतों से: सैटेलाइट और Street View कैमरों के AI (OCR) से साइनबोर्ड पढ़कर, Survey of India व नगरपालिका जैसे सरकारी डेटाबेस से, 30 करोड़+ लोकल गाइड्स के क्राउडसोर्स्ड योगदान से, और MapmyIndia जैसी थर्ड-पार्टी डेटा कंपनियों से।

Google Local Guides प्रोग्राम क्या है और इसमें कितने लोग हैं?

यह Google का क्राउडसोर्सिंग प्रोग्राम है जिसमें आम लोग जगहों के नाम, फ़ोटो, रिव्यू और करेक्शन जोड़ते हैं। ABP News के अनुसार वैश्विक स्तर पर 30 करोड़+ सदस्य हैं और भारत सबसे बड़ा योगदानकर्ता देश है।

Google Maps पर गलत नाम क्यों दिखते हैं?

क्राउडसोर्सिंग मॉडल में कोई भी यूज़र 'Suggest an Edit' से नाम बदलने का सुझाव दे सकता है। लाखों रोज़ाना सबमिशन की मैन्युअल जाँच संभव नहीं होती, जिससे जानबूझकर या अनजाने में गलत जानकारी चली आती है।

क्या भारत में Google Maps का कोई विकल्प है?

MapmyIndia (CE Info Systems) भारत की प्रमुख स्वदेशी मैपिंग कंपनी है जिसके पास 7.5 लाख+ गाँवों-शहरों का डेटा है। सरकार के GeM और ONDC जैसे ओपन-डेटा प्रोजेक्ट भी आगे चलकर विकल्प बन सकते हैं।

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